राजा नरेंद्रशाह भाग -1 |Tehri Risayat of Garhwal|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा नरेंद्रशाह पंवार/परमार वंश के 59वें तथा टिहरी गढ़वाल रियासत के पाँचवें राजा थे। उनका जन्म 1898 ई. में प्रतापनगर में हुआ था और 1913 ई. में अल्पवयस्क अवस्था में वे राजगद्दी पर बैठे। प्रारंभ में उनकी संरक्षिका राजमाता नेपोलिया थीं और संरक्षण समिति के माध्यम से राज्य का शासन संचालित हुआ। 4 अक्टूबर 1919 ई. को विजयदशमी के अवसर पर नरेंद्रशाह को पूर्ण राजाधिकार प्राप्त हुआ। उनके शासनकाल में भूमि-बंदोबस्त, न्याय, पंचायत, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन तथा प्रशासनिक संस्थाओं का विकास हुआ। उन्होंने 1921 ई. में नरेंद्रनगर की स्थापना की और 1925 ई. में राजधानी वहां स्थानांतरित की। हालांकि उनके शासनकाल में तिलाड़ी कांड (1930) और श्रीदेव सुमन की जेल में मृत्यु (1944) जैसी घटनाएँ टिहरी के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रहीं।
1. जन्म, राज्यारोहण एवं संरक्षण शासन
- नरेंद्रशाह का जन्म 1898 ई. में प्रतापनगर में हुआ था।
- वे 1913 ई. में अल्पवयस्क अवस्था में टिहरी की गद्दी पर बैठे।
- वे पंवार/परमार वंश के 59वें तथा टिहरी रियासत के पाँचवें राजा थे।
- अल्पायु होने के कारण उनके शासन के लिए संरक्षण समिति (Council of Regency) का गठन किया गया।
- उनकी संरक्षिका राजमाता नेपोलिया थीं, जिन्होंने संरक्षण समिति की अध्यक्ष के रूप में राज्य का शासन संभाला।
- संरक्षण समिति में अंग्रेज अधिकारी शेमियर तथा हरिकृष्ण रतूड़ी भी सदस्य थे।
- राजमाता नेपोलिया के अस्वस्थ होने पर क्रमशः शेमियर तथा म्योर ने संरक्षण समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
- नरेंद्रशाह को 4 अक्टूबर 1919 ई. को विजयदशमी के अवसर पर पूर्ण राजाधिकार प्राप्त हुआ।
- इस प्रकार यद्यपि वे 1913 ई. में राजा बने, लेकिन 1919 ई. से उन्होंने पूर्ण राजकीय अधिकारों के साथ शासन करना प्रारंभ किया।
- उनका शासनकाल 1913 से 1946 ई. तक रहा।
2. भूमि-बंदोबस्त एवं सीमा निर्धारण
- 1916 ई. से नरेंद्रशाह के राज्य में भूमि व्यवस्था प्रारंभ की गई, जिसे ‘डोरी पैमाइश’ कहा गया।
- इस भूमि व्यवस्था में जोध सिंह नेगी का महत्वपूर्ण योगदान था।
- इसी अवधि में टिहरी गढ़वाल राज्य एवं हूणदेश के मध्य सीमा-विवाद समाप्त किया गया।
- हिमाचल के बुशहर राज्य के साथ भी सीमा विवाद का समाधान किया गया।
- राज्य की दक्षिणी सीमा मुनि की रेती तक निर्धारित की गई।
- टिहरी राज्य एवं देहरादून के मध्य सीमा निर्धारण में चंद्रभागा नदी को सीमा माना गया।
- 1924 ई. में नरेंद्रशाह के समय पांचवां भूमि-बंदोबस्त किया गया।
- यह टिहरी पंवार राजवंश का अंतिम भूमि-बंदोबस्त था।
3. न्याय एवं विधि व्यवस्था
- नरेंद्रशाह के प्रारंभिक शासनकाल में राज्य में एक समान न्याय-संहिता का अभाव था, जिसके कारण निर्णयों में एकरूपता नहीं थी।
- वजीर हरिकृष्ण रतूड़ी ने गढ़वाली समाज में प्रचलित परंपराओं एवं रीति-रिवाजों का अध्ययन करके ‘नरेंद्र हिंदू लॉ’ की रचना की।
- ‘नरेंद्र हिंदू लॉ’ को राज्य के न्यायालयों में संदर्भ-संहिता के रूप में प्रयोग करने का आदेश दिया गया।
- यह ग्रंथ 1918 ई. में राज्य के खर्च पर प्रकाशित हुआ।
- 1938 ई. में नरेंद्रशाह ने टिहरी हाईकोर्ट की स्थापना की।
- टिहरी हाईकोर्ट के प्रथम न्यायाधीश मुकुंदी लाल थे, जिन्होंने 1938 से 1943 ई. तक कार्य किया।
- इस प्रकार नरेंद्रशाह के शासनकाल में टिहरी की न्याय व्यवस्था को अधिक संगठित एवं संस्थागत स्वरूप मिला।
4. पंचायत, प्रतिनिधि सभा एवं प्रशासन
- 1919 ई. में नरेंद्रशाह ने राज्य में पंचायत व्यवस्था की स्थापना की।
- शासन में प्रमुख व्यक्तियों का सहयोग प्राप्त करने के लिए 1923 ई. में राज्य प्रतिनिधि सभा की स्थापना की गई।
- राज्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष स्वयं राजा नरेंद्रशाह होते थे।
- इससे राज्य प्रशासन में प्रतिनिधित्व एवं परामर्श की व्यवस्था को बढ़ावा मिला।
5. कृषि एवं बैंकिंग
- किसानों को साहूकारों के अत्यधिक ब्याज से राहत दिलाने के उद्देश्य से 1920 ई. में कृषि बैंक की स्थापना की गई।
- उच्च शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए 1920 ई. में छात्रवृत्ति निधि स्थापित की गई।
- प्रतिभावान विद्यार्थियों को विदेश में अध्ययन के लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई।
6. शिक्षा एवं स्वास्थ्य
- 1923 ई. में टिहरी में सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना की गई।
- इसी वर्ष टिहरी में आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सालय का निर्माण कराया गया।
- 1940 ई. में प्रताप हाई स्कूल को प्रताप इंटर कॉलेज में उच्चीकृत किया गया।
- राजमाता नेपोलिया ने 1942 ई. में बालिका शिक्षा के लिए कन्या पाठशाला स्थापित की।
- नरेंद्रशाह ने राज्य के युवाओं को वन प्रशिक्षण के लिए देहरादून के फॉरेस्ट ट्रेनिंग कॉलेज भेजा।
- कुछ युवाओं को प्रशिक्षण के लिए जर्मनी एवं फ्रांस भी भेजे जाने का उल्लेख मिलता है।
7. नरेंद्रनगर की स्थापना एवं राजधानी का स्थानांतरण
- 1921 ई. में नरेंद्रशाह ने नरेंद्रनगर नगर की स्थापना की।
- नरेंद्रनगर का प्राचीन नाम ओड़ाथली था।
- नरेंद्रशाह ने इसे अपने नाम पर विकसित किया।
- 1924 ई. में नरेंद्रनगर में राजभवन का निर्माण कराया गया।
- 1925 ई. में टिहरी राज्य की राजधानी टिहरी से नरेंद्रनगर स्थानांतरित की गई।
- नरेंद्रनगर के राजभवन को वर्तमान में आनंदा होटल के रूप में जाना जाता है।
8. सड़क एवं परिवहन व्यवस्था
- नरेंद्रशाह के शासनकाल में राज्य में अनेक मोटर मार्गों का निर्माण कराया गया।
- प्रमुख मार्ग थे— मुनि की रेती–नरेंद्रनगर, मुनि की रेती–कीर्तिनगर, नरेंद्रनगर–टिहरी, तथा कीर्तिनगर–टिहरी।
- इन मार्गों से यातायात एवं व्यापार को सुविधा मिली।
- सड़क निर्माण की व्यापकता के कारण नरेंद्रशाह को कभी-कभी ‘गढ़वाल का शेरशाह सूरी’ भी कहा जाता है।