राजा कीर्तिशाह भाग -2 |Tehri Risayat of Garhwal|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
8. राजभवन एवं नगर विकास
- 1880–81 ई. में टिहरी में नए राजभवन का निर्माण कीर्तिशाह द्वारा कराया गया।
- इसे ‘नया दरबार’ कहा जाता था।
- 1897 ई. में महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती के अवसर पर टिहरी में लगभग 110 फीट ऊँचा घंटाघर बनवाया गया।
- कीर्तिशाह ने कीर्तिनगर की स्थापना की।
- कीर्तिनगर अलकनंदा नदी के किनारे स्थित था।
9. मुद्रण एवं पत्रकारिता
- कीर्तिशाह ने टिहरी में मुद्रण व्यवस्था को आगे बढ़ाया।
- प्रताप प्रिंटिंग प्रेस से पाक्षिक पत्र ‘टिहरी गढ़वाल दरबार गजट’ प्रकाशित कराया गया।
- इससे राज्य में सरकारी सूचनाओं एवं समाचारों के प्रकाशन को संस्थागत आधार मिला।
- टिहरी में एक प्रेस की स्थापना का भी उनके शासनकाल से संबंध बताया जाता है।
10. धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्य
- कीर्तिशाह धार्मिक सहिष्णुता के समर्थक थे।
- 1902 ई. में स्वामी रामतीर्थ टिहरी गढ़वाल आए।
- कीर्तिशाह ने स्वामी रामतीर्थ को जापान में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
- उन्होंने स्वामी रामतीर्थ की जापान यात्रा के लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान की।
- स्वामी रामतीर्थ के लिए कीर्तिशाह द्वारा बनवाए गए भवन को ‘गोल कोठी’ कहा जाता है।
- कीर्तिशाह ने विभिन्न धर्मों के बीच संवाद के उद्देश्य से सर्वधर्म सम्मेलन के लिए सभा आयोजित की।
- इस कारण उनके शासनकाल में धार्मिक सहिष्णुता एवं अंतरधार्मिक संवाद को प्रोत्साहन मिला।
11. सामाजिक सुधार
- कीर्तिशाह ने समाज में प्रचलित कुछ कुप्रथाओं को समाप्त करने का प्रयास किया।
- उन्होंने ‘झोटा मारने’ तथा ‘वेडवार्ता’ जैसी कुप्रथाओं के अंत की दिशा में कार्य किया।
- निर्धन परिवारों की कन्याओं के विवाह/कन्यादान में आर्थिक सहायता प्रदान की।
- धन के लालच में भोली-भाली लड़कियों को प्रदेश ले जाने से रोकने के प्रयास किए गए।
12. सकलाना के मुआफीदारों के अत्याचार पर नियंत्रण
- कीर्तिशाह के समय सकलाना के मुआफीदारों के अत्याचारों से प्रजा परेशान थी।
- वहां ‘बरा-बेगार’ जैसी प्रथा के कारण प्रजा पर अतिरिक्त दबाव एवं उत्पीड़न बढ़ गया था।
- मजगांव के रूप सिंह कंडारी ने प्रजा के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- राजा कीर्तिशाह के हस्तक्षेप तथा कुमाऊँ कमिश्नर की सहायता से सकलाना के मुआफीदारों के दंडाधिकार समाप्त किए गए।
- इसके बाद क्षेत्र में शांति-व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया गया।
13. ब्रिटिश सरकार द्वारा सम्मान
- 31 दिसंबर 1898 ई. को ब्रिटिश सरकार ने कीर्तिशाह को ‘कम्पेनियन ऑफ द इंडियन एम्पायर’ (CIE) की उपाधि प्रदान की।
- 1900 ई. में इंग्लैंड में उन्हें 11 तोपों की सलामी दी गई।
- 9 नवंबर 1901 ई. को नाइट कमांडर की उपाधि दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
- 1903 ई. के दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें KCSI की उपाधि से सम्मानित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
- इस प्रकार कीर्तिशाह को ब्रिटिश सरकार द्वारा विशेष रूप से सम्मानित टिहरी नरेशों में गिना जाता है।
- 1892 ई. के आगरा दरबार में वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन ने अन्य भारतीय नरेशों के समक्ष कीर्तिशाह की प्रशंसा की और उन्हें आदर्श मानने की बात कही।
- 1907 ई. में लॉर्ड कैम्पबेल के टिहरी आगमन के संदर्भ में कीर्तिशाह की प्रशंसा में यह कथन उद्धृत किया जाता है— “कीर्तिशाह सदृश राजा मैंने भारतवर्ष के किसी भी भाग में नहीं पाया।”
14. राजनीतिक सलाहकार एवं विधि परामर्शदाता
- कीर्तिशाह ने तारादत्त गैरोला को अपना विधि परामर्शदाता नियुक्त किया।
- राज्य में प्रशासन एवं कानून संबंधी निर्णयों को व्यवस्थित करने में विधि विशेषज्ञों की भूमिका को महत्व दिया गया।
15. प्रताप शाह एवं कीर्तिशाह के सुधारों की निरंतरता
- 1. कीर्तिशाह ने प्रताप शाह के समय प्रारंभ किए गए शिक्षा, प्रशासन, न्याय एवं संस्थागत विकास के कार्यों को आगे बढ़ाया।
- उनके समय इन सुधारों का विस्तार करते हुए विद्यालय, नगरपालिका, कृषि बैंक, वेधशाला, विद्युत एवं जलापूर्ति जैसी आधुनिक व्यवस्थाओं का विकास हुआ।
- इसी कारण कीर्तिशाह का शासन टिहरी रियासत के आधुनिकीकरण के महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जाता है।
16. मृत्यु एवं उपाधि
- राजा कीर्तिशाह की मृत्यु 25 अप्रैल 1913 ई. को हुई।
- भक्तदर्शन ने अपनी पुस्तक में कीर्तिशाह को ‘राजर्षि’ नाम से संबोधित किया है।
- उनके शासनकाल में टिहरी रियासत ने शिक्षा, प्रशासन, कृषि, विज्ञान, नगर विकास तथा सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे।
निष्कर्ष
राजा कीर्तिशाह का शासनकाल टिहरी रियासत के आधुनिकीकरण एवं संस्थागत विकास का महत्वपूर्ण दौर था। अल्पायु में गद्दी संभालने के बाद प्रारंभ में राजमाता गुलेरिया ने संरक्षण समिति के माध्यम से शासन चलाया, जबकि बाद में कीर्तिशाह ने स्वयं प्रशासन को नई दिशा दी। उनके समय शिक्षा का व्यापक विस्तार, प्रताप हाई स्कूल का विकास, कैंपबेल बोर्डिंग हाउस तथा हीवेट संस्कृत पाठशाला की स्थापना हुई। कृषि बैंक, नगरपालिका, वेधशाला, विद्युत, वाटर वर्क्स, न्यायिक व्यवस्था और सैन्य पुनर्गठन उनके प्रमुख कार्यों में शामिल थे। उन्होंने स्थानीय ठेकेदारों को प्रोत्साहित किया और सामाजिक कुप्रथाओं को समाप्त करने का प्रयास किया। स्वामी रामतीर्थ जैसे विद्वानों को संरक्षण देने से उनकी धार्मिक एवं बौद्धिक रुचि भी स्पष्ट होती है। ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें अनेक सम्मान एवं उपाधियाँ प्रदान की गईं। 25 अप्रैल 1913 ई. को उनकी मृत्यु हुई, लेकिन उनके शासनकाल में किए गए संस्थागत सुधारों का टिहरी के प्रशासनिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रहा।