नरेन्द्र शाह भाग -2 |Tehri Risayat of Garhwal|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

9. धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्य

  • 1921 ई. में नरेंद्रशाह ने रानियों के साथ देवलगढ़ की यात्रा की।
  • उन्होंने कुलदेवी श्री राजराजेश्वरी मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
  • 1933 ई. में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को कीर्तिशाह की स्मृति में ₹1 लाख का दान दिया।
  • उन्होंने विश्वविद्यालय को ₹6,000 वार्षिक वित्तीय अनुदान देने की घोषणा भी की।
  • इस सहायता से सर कीर्तिशाह चेयर ऑफ इंडस्ट्रियल केमिस्ट्री की स्थापना हुई।

10. जनगणना एवं अन्य संस्थाएँ

  • 1921 ई. में टिहरी राज्य में पहली बार जनगणना कराई गई।
  • इसके लिए उमादत्त डंगवाल को जनगणना अधिकारी नियुक्त किया गया।
  • 1934 ई. में टिहरी में रेड क्रॉस सोसायटी की स्थापना की गई।
  • 1939 ई. में टिहरी राज्य में कुष्ठ विधान पारित किया गया।
  • 1943 ई. में टीका विधान पारित किया गया।
  • 1925 ई. में चंबा में शहीद गबर सिंह नेगी स्मारक बनवाए जाने का उल्लेख मिलता है।

11. वन एवं वन-प्रशिक्षण

  • नरेंद्रशाह के शासनकाल में वन प्रशासन एवं वन-संबंधी प्रशिक्षण पर ध्यान दिया गया।
  • राज्य के युवाओं को वन प्रशिक्षण के लिए देहरादून भेजा गया।
  • कुछ युवाओं को उच्च प्रशिक्षण के लिए जर्मनी एवं फ्रांस भेजने का भी उल्लेख मिलता है।

12. विवाह

  • नरेंद्रशाह का विवाह हिमाचल प्रदेश की क्योंठल रियासत की राजकुमारियों—कमलेन्दुमति एवं इंदुमति से हुआ था।
  • दोनों को उनकी रानियों के रूप में उल्लेखित किया जाता है।

13. ब्रिटिश सरकार द्वारा सम्मान

  • ब्रिटिश सरकार ने नरेंद्रशाह को विभिन्न सम्मान एवं उपाधियों से विभूषित किया।
  • 1931 ई. में उन्हें ‘सर’ तथा KCSI की उपाधि प्रदान किए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • 1937 ई. में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें LLD की मानद उपाधि प्रदान की।
  • उन्हें गढ़वाली सैनिकों से संबंधित सैन्य पद एवं लेफ्टिनेंट कर्नल की उपाधि दिए जाने का भी उल्लेख मिलता है।

14. तिलाड़ी कांड / रवाई कांड, 1930

  • नरेंद्रशाह के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में तिलाड़ी कांड (रवाई कांड) शामिल है।
  • 30 मई 1930 ई. को रवाई क्षेत्र में वन संबंधी नीतियों के विरोध में जनता का आंदोलन हुआ।
  • नए वन कानून के अंतर्गत किसानों की भूमि को भी वन भूमि में सम्मिलित किए जाने की आशंका से जनता में असंतोष उत्पन्न हुआ।
  • रवाई की जनता ने ‘आजाद पंचायत’ की घोषणा कर रियासत के विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ किया।
  • आंदोलन के दौरान दीवान चक्रधर जुयाल के आदेश पर पुलिस द्वारा गोली चलाए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • इस गोलीकांड में बड़ी संख्या में आंदोलनकारी किसान मारे गए।
  • 30 मई को आज भी शहीद दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है।
  • इस घटना को तिलाड़ी आंदोलन/तिलाड़ी कांड तथा रवाई कांड के नाम से जाना जाता है।
  • तिलाड़ी कांड के समय महाराजा नरेंद्रशाह स्वास्थ्य-लाभ के लिए यूरोप में थे।

15. श्रीदेव सुमन एवं 1944 की घटना

  • टिहरी राज्य में जन-अधिकारों एवं राजनीतिक सुधारों से संबंधित आंदोलनों में श्रीदेव सुमन का महत्वपूर्ण स्थान है।
  • श्रीदेव सुमन को टिहरी जेल में 84 दिनों की भूख हड़ताल के बाद गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा।
  • 25 जुलाई 1944 ई. को टिहरी जेल में श्रीदेव सुमन की मृत्यु हुई।
  • उस समय नरेंद्रशाह मुंबई की यात्रा पर थे।
  • श्रीदेव सुमन ने नरेंद्रशाह के प्रति अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा था— “श्री महाराज के प्रति मैं पूर्ण सद्भावना, श्रद्धा एवं भक्ति भाव रखता हूँ। उनका संघर्ष टिहरी नौकरशाही के विरुद्ध था।”

16. टिहरी राज्य प्रजामंडल एवं अगस्त समझौता

  • 23 जनवरी 1939 ई. को देहरादून में टिहरी राज्य प्रजामंडल की स्थापना हुई।
  • प्रजामंडल ने राज्य में राजनीतिक एवं जन-अधिकारों से संबंधित मांगों को उठाया।
  • राजदरबार और प्रजामंडल के बीच अगस्त समझौता हुआ।
  • इस समझौते के बाद 1946 ई. में टिहरी राज्य प्रजामंडल को वैधानिक स्वीकृति प्रदान की गई।
  • यह घटना टिहरी रियासत में धीरे-धीरे विकसित हो रही राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं जन-अधिकार की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण थी।

17. नरेंद्रशाह का त्यागपत्र

  • नरेंद्रशाह को जीवित रहते राजपद से त्यागपत्र देने वाले टिहरी के राजा के रूप में भी उल्लेखित किया जाता है।
  • उनका शासनकाल 1913 से 1946 ई. तक रहा।
  • उनके शासनकाल के अंतिम चरण में टिहरी राज्य में प्रजामंडल आंदोलन तथा जन-अधिकारों से संबंधित राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हुईं।

निष्कर्ष

राजा नरेंद्रशाह का शासनकाल टिहरी रियासत के इतिहास में आधुनिक संस्थाओं के विकास और राजनीतिक परिवर्तन, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहा। अल्पवयस्क अवस्था में गद्दी पर बैठने के बाद प्रारंभिक शासन राजमाता नेपोलिया एवं संरक्षण समिति के माध्यम से चला और 1919 ई. में उन्हें पूर्ण राजाधिकार प्राप्त हुआ। उनके समय डोरी पैमाइश, अंतिम भूमि बंदोबस्त, नरेंद्र हिंदू लॉ, पंचायत, राज्य प्रतिनिधि सभा, कृषि बैंक, पुस्तकालय, आयुर्वेदिक चिकित्सालय तथा हाईकोर्ट जैसी संस्थाओं का विकास हुआ। 1921 में नरेंद्रनगर की स्थापना और 1925 में राजधानी का स्थानांतरण उनके शासन की प्रमुख घटनाएँ थीं। सड़क एवं शिक्षा के विकास के साथ उन्होंने उच्च शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण को भी प्रोत्साहित किया। दूसरी ओर, 1930 का तिलाड़ी कांड और 1944 में श्रीदेव सुमन की जेल में मृत्यु उनके शासनकाल की अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ रहीं। 1946 ई. में उनके शासन का अंत हुआ और इसके साथ टिहरी रियासत का राजनीतिक इतिहास एक नए चरण में प्रवेश करता है।

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