राजा अजयपाल (1490–1519 ई.) |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
गढ़वाल के पंवार/परमार राजवंश के इतिहास में राजा अजयपाल का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें परमार वंश का 37वाँ शासक, गढ़वाल का वास्तविक संस्थापक, प्रथम स्वतंत्र शासक तथा गढ़पाल माना जाता है। अजयपाल ने अपने बाहुबल से गढ़वाल के विभिन्न 52 गढ़ों को एकीकृत कर एक सुदृढ़ राजनीतिक सत्ता का निर्माण किया। उन्होंने प्रशासनिक एवं सैन्य व्यवस्था को मजबूत किया, राजधानी को देवलगढ़ से श्रीनगर स्थानांतरित किया तथा राज्य की सीमाओं को संगठित किया। उनकी राजनीतिक उपलब्धियों के कारण उन्हें ‘गढ़वाल का अशोक’, ‘गढ़वाल का बिस्मार्क’ और ‘गढ़वाल का संस्थापक’ जैसे उपनामों से भी संबोधित किया जाता है। उनके शासनकाल ने गढ़वाल के इतिहास में एक नए केंद्रीकृत एवं संगठित राज्य की नींव रखी।
प्रमुख बिंदु
- अजयपाल पंवार/परमार वंश के 37वें राजा थे। उनका शासनकाल 1490 ई. से 1519 ई. तक माना जाता है।
- राहुल सांकृत्यायन ने अजयपाल को पंवार वंश का संस्थापक माना है। इसी कारण अजयपाल को पंवार वंश का वास्तविक संस्थापक भी कहा जाता है।
- अजयपाल के संबंध में जानकारी के प्रमुख साहित्यिक स्रोत ‘मनोदय काव्य’, ‘रामायण प्रदीप’ तथा पवाड़े हैं।
- ‘मनोदय काव्य’ परमार राजा मानसाह के दरबारी कवि कवि भरत द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ है। इसे पंवार/परमार वंश का प्राचीनतम ऐतिहासिक काव्य माना जाता है।
- ‘रामायण प्रदीप’ मेधाकर शास्त्री द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ है। मेधाकर शास्त्री राजा प्रदीप शाह के दरबारी कवि थे।
- रायबहादुर पातीराम ने अजयपाल को ‘गढ़पति’ के रूप में संबोधित किया है।
- अजयपाल को चाँदपुरगढ़ के गढ़पति आनन्दपाल का पुत्र बताया जाता है।
- अजयपाल ने अपने बाहुबल से गढ़वाल के 52 गढ़ों को जीतकर उन्हें एक राजनीतिक सत्ता के अंतर्गत संगठित किया।
- परंपरा के अनुसार अजयपाल ने कत्यूरी शासकों को पराजित कर उनका स्वर्ण सिंहासन प्राप्त किया था।
- 1491 ई. में कुमाऊँ के शासक कीर्तिचंद ने बघाणगढ़ के युद्ध में अजयपाल को पराजित किया था।
- अजयपाल ने 1512 ई. में देवलगढ़ की प्रासाद पहाड़ी पर राजप्रासाद का निर्माण करवाया।
- देवलगढ़ श्रीनगर से लगभग 8–9 मील की दूरी पर स्थित एक छोटी पहाड़ी पर बसा है। यह गोरखनाथ पंथ के संत सत्यनाथ का निवास स्थल माना जाता है। अजयपाल भी गोरखनाथ पंथ के अनुयायी थे।
- अजयपाल ने देवलगढ़ में अपनी कुलदेवी राजराजेश्वरी के मंदिर तथा सत्यनाथ भैरव गुफा का जीर्णोद्धार करवाया।
- देवलगढ़ में गोरखनाथ पंथ के संत सत्यनाथ का आवास था। उनके पुजारी नाथपंथी जोगी होते थे तथा उनके महंत को पीर कहा जाता था।
- जॉर्ज डब्ल्यू. ब्रिग्स ने अपनी पुस्तक Gorakhnath and the Kanphata Yogis में अजयपाल को गोरखनाथ संप्रदाय की एक शाखा का संस्थापक बताया है।
- देवलगढ़ के विष्णु मंदिर के सामने की दीवार पर अजयपाल का पद्मासन मुद्रा में चित्र बताया जाता है। इसमें उनके कानों में कुंडल तथा सिर पर पगड़ी दिखाई गई है।
- अजयपाल ने 1517 ई. में राजधानी देवलगढ़ से श्रीनगर स्थानांतरित की।
- अजयपाल का राजभवन 1803 ई. के भूकंप में क्षतिग्रस्त हुआ। इसके बचे हुए अवशेष 1894 ई. की विनाशकारी बाढ़ में नष्ट हो गए। वर्तमान श्रीनगर को 1895 ई. में पौँ द्वारा बसाया गया माना जाता है।
- श्रीनगर की तुलना दिल्ली से की जाती है, क्योंकि दोनों नगरों के इतिहास में बार-बार बसने और उजड़ने की परंपरा दिखाई देती है।
- अजयपाल ने श्रीनगर में कालिका देवी मठ का निर्माण करवाया।
- अजयपाल ने राजकीय रसोई के लिए सरोला ब्राह्मणों की नियुक्ति की।
- अजयपाल ने गढ़वाल में माप-तौल के मानकीकरण का प्रयास किया। उनके समय में ‘धूली पाथा’ नामक मापक के प्रचलन का उल्लेख मिलता है, जिसका मान लगभग 2 किलोग्राम बताया जाता है।
- देवलगढ़ शिलालेख में अजयपाल के लिए ‘धर्मपाथो’ शब्द का उल्लेख मिलता है।
- अजयपाल को उनकी राजनीतिक एवं प्रशासनिक उपलब्धियों के कारण ‘गढ़वाल का अशोक’, ‘गढ़वाल का बिस्मार्क’ तथा ‘गढ़वाल का संस्थापक’ कहा जाता है।
- डॉ. अजय सिंह रावत ने अजयपाल की तुलना मौर्य सम्राट अशोक से की है। वहीं कवि भरत ने मनोदय काव्य में अजयपाल की तुलना कृष्ण, भीम, कुबेर और इन्द्र से की है।
- अजयपाल गोरखनाथ पंथ के अनुयायी थे। गोरखनाथ परंपरा में भर्तृहरि और गोपीचंद भी प्रसिद्ध अनुयायी माने जाते हैं।
- ‘नवनाथ कथा’ तथा ‘गोरक्ष स्तवांजलि’ में अजयपाल को गोरखनाथ संप्रदाय के 84 सिद्धों में से एक सिद्ध माना गया है।
- ‘साँवरी’ डॉ. शूरवीर सिंह का हस्तलिखित ग्रंथ है, जो तांत्रिक विद्या से संबंधित बताया जाता है।
- ‘साँवरी’ ग्रंथ में अजयपाल को ‘आदिनाथ’ कहा गया है।
- अजयपाल की मृत्यु 1519 ई. में हुई।
- उनके बाद उनके उत्तराधिकारी कल्याणपाल बने।
- अजयपाल के 52 गढ़ों को एकीकृत करने तथा एक संगठित गढ़वाल राज्य की स्थापना के कारण उन्हें पंवार वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।