युगशैल (कालसी) का गोत्रीय वंश|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
युगशैल (कालसी) का गोत्रीय वंश उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास में कालसी एवं उसके आसपास के यमुना-टौंस क्षेत्र से संबंधित एक महत्वपूर्ण स्थानीय राजनीतिक सत्ता के रूप में जाना जाता है। इस वंश के इतिहास की जानकारी मुख्यतः जगतग्राम-बाड़वाला (कालसी) से प्राप्त पुरातात्विक एवं अभिलेखीय साक्ष्यों से मिलती है। इसका सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक शीलवर्मन था, जिसने यमुना तट पर चार अश्वमेघ यज्ञ कराए। इन यज्ञों से संबंधित वेदियाँ इस वंश की राजनीतिक शक्ति, धार्मिक गतिविधियों तथा वैदिक परंपरा के संरक्षण को दर्शाती हैं।
युगशैल (कालसी) का गोत्रीय वंश — प्रमुख बिंदु
- युगशैल (कालसी) का गोत्रीय वंश कालसी प्रदेश एवं उसके आसपास के क्षेत्र में स्थापित एक स्थानीय राजनीतिक सत्ता थी।
- इस गोत्रीय वंश का संस्थापक संभवतः पोण को माना जाता है।
- इसका सर्वाधिक प्रतापी शासक शीलवर्मन था, जो पोण की छठी पीढ़ी में उत्पन्न हुआ था।
- शीलवर्मन ने यमुना नदी के तट पर चार अश्वमेघ यज्ञ करवाए। इसकी पुष्टि जगतग्राम-बाड़वाला (कालसी, देहरादून) से प्राप्त अश्वमेघ-यज्ञ की वेदियों से होती है
- शीलवर्मन की पहचान को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ इतिहासकार उसे कुणिन्द, जबकि कुछ यौधेय परंपरा से संबंधित मानते हैं।
- इतिहासकार हरिदत्त विद्यालंकार ने संभावना व्यक्त की है कि इस राज्य का संस्थापक कोई कुषाण या शक मूल का विदेशी व्यक्ति रहा हो तथा बाद की पीढ़ियाँ पूर्णतः भारतीय संस्कृति में समाहित हो गई हों।
- शीलवर्मन के अश्वमेघ यज्ञ उसकी सैन्य एवं राजनीतिक प्रतिष्ठा तथा स्वतंत्र शासकीय स्थिति के संकेतक माने जाते हैं।
- जगतग्राम-बाड़वाला की यज्ञ-वेदियाँ इस क्षेत्र में वैदिक धार्मिक परंपराओं के प्रभाव का महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण हैं
- युगशैल की सत्ता का अध्ययन उत्तराखंड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास एवं बाहरी शक्तियों के स्थानीय समाज में समावेश को समझने में महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
युगशैल (कालसी) का गोत्रीय वंश उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास में स्थानीय राजनीतिक शक्ति और वैदिक धार्मिक परंपरा के समन्वय का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। शीलवर्मन द्वारा चार अश्वमेघ यज्ञों का आयोजन इस वंश की राजनीतिक प्रतिष्ठा और धार्मिक सक्रियता को स्पष्ट करता है। जगतग्राम-बाड़वाला से प्राप्त यज्ञ-वेदियाँ इस वंश के इतिहास का प्रमुख पुरातात्विक आधार हैं। यद्यपि शीलवर्मन की जातीय एवं राजनीतिक पहचान को लेकर कुणिन्द और यौधेय संबंधी मतभेद हैं, फिर भी उसके शासन से कालसी क्षेत्र की प्राचीन राजनीतिक महत्ता स्पष्ट होती है।