राजा जयकृत शाह/जयकीर्ति शाह (1780–1786 ई.) |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा जयकृत शाह अथवा जयकीर्ति शाह पंवार/परमार वंश के 53वें शासक थे। उनका शासनकाल 1780 से 1786 ई. तक माना जाता है। उनके समय गढ़वाल की आंतरिक राजनीति अत्यंत अशांत रही और राजदरबार में विभिन्न मंत्री-गुटों के बीच संघर्ष बढ़ गया। खण्डूरी और डोभाल दल के बीच प्रतिस्पर्धा तथा कृपाराम डोभाल के प्रभाव ने राजा की स्थिति को कमजोर किया। दूसरी ओर, दून क्षेत्र में सिख और रोहेला आक्रमणों ने भी राज्य की कठिनाइयाँ बढ़ाईं। जयकृत शाह ने संकट से निकलने के लिए सिरमौर के राजा जगत प्रकाश से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया, जिसमें मौलाराम की भूमिका भी उल्लेखित है। उनके शासनकाल में जोशियाणी कांड (1785) जैसी महत्वपूर्ण घटना हुई। अंततः लगातार राजनीतिक षड्यंत्रों और विश्वासघात से परेशान होकर 1786 ई. में उन्होंने श्री रघुनाथ मंदिर में अपना जीवन समाप्त कर लिया।

प्रमुख बिंदु

  • मालीदेवल अभिलेख से पता चलता है कि जयकृत शाह ने 1780 से 1786 ई. तक गढ़वाल में शासन किया। वे पंवार/परमार वंश के 53वें शासक थे।
  • जयकृत शाह के शासनकाल में उनका दरबार मुख्यतः दो गुटों—खण्डूरी दल और डोभाल दल में विभाजित हो गया था। दोनों गुटों के बीच राजनीतिक प्रभाव को लेकर संघर्ष चलता रहा।
  • इस समय कृपाराम डोभाल मुख्तार, नित्यानंद खण्डूरी फौजदार तथा जयदेव डंगवाल वजीर था।
  • कृपाराम डोभाल को तानाशाही प्रवृत्ति का व्यक्ति बताया गया है। उसके प्रभाव के कारण गढ़वाल के राजदरबार और प्रशासन में तनावपूर्ण वातावरण उत्पन्न हुआ।
  • नेगी जाति के कुछ सदस्यों ने दून के फौजदार घमण्ड सिंह मियाँ को श्रीनगर बुलाया। घमण्ड सिंह ने कृपाराम डोभाल की हत्या कर स्वयं मुख्तार का पद प्राप्त कर लिया।
  • इसके बाद जयकृत शाह की स्थिति कमजोर होती गई और वह घमण्ड सिंह के प्रभाव में आ गया। उपलब्ध परंपरा में उसे घमण्ड सिंह के हाथों की कठपुतली के रूप में वर्णित किया गया है।
  • राज्य में चल रहे षड्यंत्रों और विद्रोहों से परेशान होकर जयकृत शाह ने मौलाराम से परामर्श लिया। मौलाराम ने उसे सिरमौर के राजा जगत प्रकाश से सहायता लेने की सलाह दी।
  • मौलाराम ने सिरमौर के राजा से सहायता माँगने के लिए एक कविता/संदेश तैयार किया। इसे संदेशवाहक धनीराम के माध्यम से सिरमौर के राजा जगत प्रकाश तक पहुँचाया गया।
  • जयकृत शाह ने धनीराम को राजदूत के रूप में सिरमौर के राजा जगत प्रकाश के पास भेजा। इसके बाद सिरमौर की सहायता से गढ़वाल की राजनीतिक स्थिति में हस्तक्षेप हुआ।
  • कपरौली के युद्ध, जो श्रीनगर के निकट हुआ था, में जगत प्रकाश की सेना ने प्रद्युम्न शाह, पराक्रम शाह और विजयराम नेगी की संयुक्त सेना को पराजित किया।
  • इसके बाद जगत प्रकाश की सेना श्रीनगर पहुँची और घमण्ड सिंह का वध कर दिया। इस प्रकार जयकृत शाह ने अपने ऊपर प्रभाव रखने वाले शक्तिशाली व्यक्ति से मुक्ति प्राप्त की।
  • जयकृत शाह के शासनकाल में 1783 ई. में सिखों ने पुनः दून क्षेत्र पर आक्रमण किया और वहाँ लूटपाट की।
  • सिख आक्रमणों से दून क्षेत्र को बचाने के लिए जयकृत शाह द्वारा सिखों को ‘राखी’ कर देने का उल्लेख मिलता है।
  • राखी कर लूटमार न करने के बदले में दिया जाने वाला कर था। इसे सामान्यतः उपज के पाँचवें भाग के रूप में बताया गया है।
  • जयकृत शाह को अपने भाइयों की राज्य के प्रति महत्वाकांक्षा, मंत्रियों के षड्यंत्र और अंततः विश्वासपात्र मंत्री धनीराम के विश्वासघात जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
  • इन परिस्थितियों से मानसिक रूप से अत्यंत परेशान होकर जयकृत शाह ने 1786 ई. में श्री रघुनाथ मंदिर में अपने जीवन का अंत कर लिया।
  • जयकृत शाह की मृत्यु के बाद उनकी कुछ रानियों के सती होने का उल्लेख मिलता है। लोक-परंपरा के अनुसार उन्होंने प्रद्युम्न शाह और पराक्रम शाह को श्राप भी दिया था।
  • मौलाराम के अनुसार, मृत्यु के समय जयकृत शाह ने अपने भाइयों प्रद्युम्न शाह और पराक्रम शाह को श्राप दिया था।
  • जयकृत शाह के समय 1785 ई. में जोशियाणी कांड हुआ। इस घटना में प्रद्युम्न शाह ने अपनी पैतृक संपत्ति श्रीनगर में कुमाऊँ के जोशियों द्वारा लुटवाई थी।
  • जयकृत शाह के शासनकाल में दून क्षेत्र को एक और बाहरी आक्रमण का सामना करना पड़ा। 1786 ई. में रोहेला सरदार नजीब जंग के पौत्र गुलाम कादिर ने दून पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया।
  • गुलाम कादिर ने दून पर अधिकार करने के बाद वहाँ का प्रशासक उम्मेद सिंह को बनाया।
  • जयकृत शाह के संबंध में कला के क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मौलाराम को 60 गाँव जागीर में देने वाले पंवार शासक जयकीर्ति शाह थे। यह उनके द्वारा कलाकारों को दिए गए संरक्षण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

निष्कर्ष

राजा जयकृत शाह का शासनकाल पंवार वंश के इतिहास में आंतरिक राजनीतिक संघर्ष और बाहरी आक्रमणों से घिरा हुआ काल था। राजदरबार में खण्डूरी और डोभाल गुटों की प्रतिस्पर्धा, कृपाराम डोभाल तथा घमण्ड सिंह जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों का हस्तक्षेप और राजपरिवार के भीतर सत्ता की महत्वाकांक्षा ने राजा की स्थिति को कमजोर किया। दूसरी ओर सिखों और रोहिलों के आक्रमणों ने राज्य की समस्याओं को और बढ़ाया। मौलाराम की सलाह से सिरमौर की सहायता प्राप्त करना तथा घमण्ड सिंह का अंत इस काल की महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ थीं। 1785 का जोशियाणी कांड भी इसी काल की उल्लेखनीय घटना है। अंततः राजनीतिक षड्यंत्रों और विश्वासघात से निराश होकर जयकृत शाह ने 1786 ई. में अपना जीवन समाप्त कर लिया। इसके बावजूद मौलाराम को 60 गाँवों की जागीर देना उनके कला-प्रेम और सांस्कृतिक संरक्षण को दर्शाता है।

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