राजा लक्ष्मी चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा लक्ष्मी चंद चंद वंश के महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली शासकों में से एक थे। वे रुद्रचंद के उत्तराधिकारी थे और उन्होंने अपने पिता की विस्तारवादी तथा कूटनीतिक नीतियों को आगे बढ़ाया। उनके शासनकाल में चंद-गढ़वाल संघर्ष अपने महत्वपूर्ण चरण में पहुँचा। उन्होंने गढ़वाल के राजा मानशाह के विरुद्ध लगातार आठ अभियान किए, जिनमें प्रारंभिक प्रयास असफल रहे, किंतु अंतिम अभियान में चंद सेना को आंशिक सफलता प्राप्त हुई। मुगल सम्राट जहाँगीर से उनकी भेंट ने चंद-मुगल संबंधों को मजबूत किया। प्रशासनिक दृष्टि से उनके काल में भूमि-बंदोबस्त, कर व्यवस्था, न्यायालय तथा राज्य कर्मचारियों की व्यवस्था को अधिक संगठित रूप दिया गया। साथ ही मंदिरों, बाग-बगीचों और नगर की धार्मिक-सांस्कृतिक संरचनाओं के विकास में भी उनका योगदान रहा।

प्रमुख बिंदु

  • रुद्रचंद के पश्चात् लक्ष्मी चंद चंद राज्य के शासक बने
  • उन्होंने अपने पिता की तरह गढ़वाल पर आक्रमण की नीति जारी रखी।
  • लक्ष्मी चंद ने गढ़वाल पर सात बार आक्रमण किया, लेकिन प्रत्येक बार गढ़वाल के राजा मानशाह के हाथों पराजित हुए।
  • परंपरा के अनुसार, जिस दुर्ग से लक्ष्मी चंद गढ़वाल पर आक्रमण करते थे, उसे उनकी असफलताओं के कारण ‘गीदड़गढ़’ या ‘स्यालगढ़’ कहा गया।
  • लक्ष्मी चंद को ‘लखुली बिराली’ उपनाम से भी जाना जाता था। यह उपनाम उनके मुगलों के समक्ष अत्यधिक विनम्र/समर्पणशील व्यवहार से जोड़ा जाता है।
  • सात बार असफल होने के बावजूद लक्ष्मी चंद ने हार नहीं मानी और आठवीं बार पूरी तैयारी के साथ गढ़वाल पर आक्रमण किया।
  • इस आठवें अभियान में चंद सेना का नेतृत्व सेनापति गैंडा ने किया।
  • इस अभियान में चंद सेना को आंशिक सफलता मिली और उसने गढ़वाल क्षेत्र में लूटपाट कर पर्याप्त धन प्राप्त किया।
  • इस सफलता की प्रसन्नता में कुमाऊँ में दीपावली जैसा उत्सव मनाया गया। इससे संबंधित लोक-परंपरा को ‘खतड़वा’ उत्सव से जोड़ा जाता है।
  • खतड़वा परंपरा में घास-फूस का ‘खतड़वा’ बनाया जाता है और संध्या के समय उसे जलाया जाता है। इसे गढ़वाल के विरुद्ध विजय की स्मृति से जोड़ा जाता है।
  • लक्ष्मी चंद ने अपने पिता की तरह मुगलों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे।
  • उन्होंने मुगल सम्राट जहाँगीर से भेंट की। इस घटना का उल्लेख स्वयं जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में किया है।
  • जहाँगीर ने लक्ष्मी चंद को पहाड़ी राजाओं में सबसे धनी बताया और उनके द्वारा लाए गए उपहारों में पहाड़ी घोड़े, बाज, शिकरे, कस्तूरी तथा विभिन्न प्रकार के हथियारों का उल्लेख किया।
  • मुगल बादशाह से संबंध बनाए रखने से लक्ष्मी चंद को तराई के ‘माल’ क्षेत्र में अपनी स्थिति सुरक्षित रखने में सहायता मिली।सीरा से प्राप्त चंद वंशावली में लक्ष्मी चंद का नाम ‘लछिमीचंद’, मूनाकोट ताम्रपत्र में ‘लछिमन चंद’ तथा मानोदय-काव्य में ‘लक्ष्मण’ मिलता है।
  • लक्ष्मी चंद का बड़ा भाई शक्ति गुसाईं जन्म से नेत्रहीन था। उसे चंद वंश के ‘धृतराष्ट्र’ के रूप में भी संदर्भित किया जाता है।
  • शक्ति गुसाईं ने प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और दारमा घाटी की व्यवस्था को पुनर्गठित किया।
  • दारमा घाटी में शौकों के अधिकार एवं कर्तव्य निर्धारित किए गए तथा उनसे विभिन्न तिब्बती वस्तुएँ राजदरबार तक पहुँचाने की व्यवस्था की गई।
  • सीमाओं पर सीमा-सूचक पत्थर लगवाए गए तथा राजधानी में बंदोबस्ती कार्यालय स्थापित किया गया।
  • भूमि एवं राजस्व से संबंधित विभिन्न करों का निर्धारण किया गया। इनमें ज्यूला, सिरती, बैकर, रछया, कूत, भात, नेगी, साउ, रतगति, कनक, बखरिया और सीकदार-नेगी आदि का उल्लेख मिलता है।
  • न्याय व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए ‘न्योवाली’ और ‘बिष्टाली’ नामक कचहरियाँ स्थापित की गईं।
  • न्योवाली कचहरी सामान्य जनता के मामलों के लिए थी, जबकि बिष्टाली कचहरी मुख्यतः सैनिक मामलों से संबंधित न्याय करती थी।
  • राज्य कर्मचारियों को तीन प्रमुख श्रेणियों में व्यवस्थित किया गया—सरदार, फौजदार और नेगी।
  • सरदार परगने का शासक, फौजदार सेना का अधिकारी तथा नेगी छोटे राज्य कर्मचारी होते थे, जिन्हें अनाज के रूप में ‘नेग’ या दस्तूर मिलता था।
  • लक्ष्मी चंद एक निर्माता एवं उद्यान-प्रेमी शासक भी थे। उनके समय में अनेक बाग-बगीचे लगाए गए।

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