बैजनाथ के परवर्ती कात्यूरी राजा ब्रह्मदेव / वीरदेव |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
ब्रह्मदेव, जिसे लोकगाथाओं में वीरदेव, वीरसिंह या बिरमदेव के नाम से भी जाना जाता है, बैजनाथ की परवर्ती कात्यूरी शाखा के अंतिम चरण का महत्वपूर्ण शासक माना जाता है। राजावलियों में धामदेव के बाद ब्रह्मदेव का उल्लेख मिलता है, जबकि पाली-पछाऊँ वंशावली में उसके संबंध में अलग वंशक्रम प्रस्तुत किया गया है। उसे सामान्यतः लखनपुर का राजा तथा अंतिम प्रमुख कात्यूरी शासक माना जाता है। उसके बाद कात्यूरी राज्य के विखंडन और विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों के उदय की प्रक्रिया तेज हुई।
प्रमुख बिंदु
- धामदेव के पश्चात् राजावलियों में ब्रह्मदेव का नाम मिलता है। उसकी पहचान जागर गाथाओं के वीरसिंह या बिरमदेव से की जाती है।
- ब्रह्मदेव को वीरदेव के नाम से भी जाना जाता था। उसके वीर एवं साहसी व्यक्तित्व के कारण यह नाम प्रचलित हुआ माना जाता है।
- ब्रह्मदेव को लखनपुर का राजा बताया गया है। वह बैजनाथ की परवर्ती कात्यूरी शाखा के अंतिम चरण का प्रमुख शासक था।
- एटकिंसन की पाली-पछाऊँ वंशावली में आसन्तिदेव के दसवें वंशज के रूप में सारंगदेव का उल्लेख मिलता है।
- इसी वंशावली के अनुसार वीरमदेव सारंगदेव का पुत्र तथा सुजानदेव का पौत्र था। इस प्रकार ब्रह्मदेव/वीरदेव की वंशगत स्थिति को समझने में पाली-पछाऊँ वंशावली महत्वपूर्ण है।
- ब्रह्मदेव का समकालीन चम्पावती का चन्द राजा विक्रमचन्द माना जाता है। इससे उस समय कात्यूरी और चन्द शक्तियों के बीच राजनीतिक संपर्क एवं प्रतिस्पर्धा का संकेत मिलता है।
- जागर गाथाओं में वीरमदेव के संबंध में प्रजा-उत्पीड़न और चरित्रहीनता से जुड़ी अनेक लोमहर्षक कथाएँ मिलती हैं। इन कथाओं को लोकपरंपरा के रूप में देखते हुए इनके ऐतिहासिक विवरणों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है।
- राहुल सांकृत्यायन के अनुसार वीरदेव के बाद कात्यूरी राज्य छिन्न-भिन्न हो गया और उसका क्षेत्र उसके वंशजों तथा अन्य स्थानीय शक्तियों के बीच बँट गया। यह परवर्ती कात्यूरी सत्ता के विखंडन की महत्वपूर्ण व्याख्या है।
- वीरदेव के बाद त्रिलोकपाल का नाम बैजनाथ के अंतिम कात्यूरी राजा के रूप में मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि ब्रह्मदेव/वीरदेव के बाद भी बैजनाथ शाखा का राजनीतिक अस्तित्व कुछ समय तक बना रहा।
- जियारानी की लोकगाथा के अनुसार तैमूर लंग ने ब्रह्मदेव के शासनकाल में हरिद्वार पर आक्रमण किया था। यह विवरण लोकगाथा पर आधारित है, इसलिए इसे ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में सावधानी से प्रयोग किया जाना चाहिए।
- कत्यूर-बैजनाथ की परवर्ती शाखा ने दानपुर मंडल में चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक अपनी वंशानुगत राजधानी रणचूलाहाट से शासन किया।
- इस शाखा पर पहला महत्वपूर्ण राजनीतिक आघात परमार राजा अजयपाल के समय पड़ा। रामायणप्रदीप में उल्लेख है कि अजयपाल कूर्मांचल के कैंतुरा से कात्यूरी शासक का स्वर्ण सिंहासन छीनकर श्रीनगर ले गया था।
- अजयपाल की इस विजय के परिणामस्वरूप कत्यूर की यह उपत्यका संभवतः कुछ समय के लिए परमार राज्य का हिस्सा बन गई थी। इससे बैजनाथ की कात्यूरी शाखा की राजनीतिक शक्ति को गंभीर चुनौती मिली।
- कालांतर में चन्दों के विस्तार के साथ बैजनाथ की इस परवर्ती कात्यूरी शाखा का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया और कुमाऊँ में चन्द शक्ति का प्रभाव स्थापित हुआ।
निष्कर्ष
ब्रह्मदेव अथवा वीरदेव बैजनाथ की परवर्ती कात्यूरी शाखा के अंतिम प्रमुख शासकों में से एक था। राजावलियों में ब्रह्मदेव तथा जागर गाथाओं में वीरसिंह या बिरमदेव के रूप में उसका उल्लेख मिलता है। एटकिंसन की पाली-पछाऊँ वंशावली उसके वंशक्रम को समझने में महत्वपूर्ण है, जबकि लोकगाथाएँ उसके व्यक्तित्व और शासन से संबंधित अनेक कथाएँ प्रस्तुत करती हैं। उसके समय चम्पावती के चन्द राजा विक्रमचन्द का समकालीन होना बदलते राजनीतिक समीकरणों को दर्शाता है। ब्रह्मदेव के बाद कात्यूरी सत्ता का विखंडन तेज हुआ और विभिन्न शाखाएँ अलग-अलग क्षेत्रों में सीमित हो गईं। बैजनाथ शाखा पर परमार राजा अजयपाल के आक्रमण ने उसकी शक्ति को कमजोर किया और बाद में चन्दों ने इस शाखा का उच्छेद कर दिया। अतः ब्रह्मदेव का काल बैजनाथ की कात्यूरी सत्ता के पतन और उसके राजनीतिक विखंडन का संक्रमणकाल माना जा सकता है।