राजा जगत चंद|Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा जगत चंद चंद वंश के इतिहास में अत्यंत लोकप्रिय, प्रभावशाली और प्रजाहितैषी शासक के रूप में स्मरण किए जाते हैं। यद्यपि उनका शासनकाल लगभग बारह वर्षों का ही रहा, फिर भी इस अल्प अवधि में उन्होंने अपनी प्रजा के बीच ऐसा सम्मान और विश्वास अर्जित किया जो चंद वंश के अनेक शासकों को प्राप्त नहीं हुआ। वे मिलनसार स्वभाव के थे और प्रजा के कार्यों में विशेष रुचि लेते थे। उनके समय में राज्य धन-धान्य से संपन्न बताया जाता है। अनेक विद्वानों ने उनके शासनकाल को ‘कुमाऊँ का स्वर्ण काल’ कहा है। उनके शासन में गढ़वाल के साथ संघर्ष, मुगल दरबार से संबंध तथा प्रशासनिक एवं आर्थिक गतिविधियाँ भी महत्वपूर्ण रहीं।

प्रमुख तथ्य

  • जगत चंद का शासनकाल लगभग बारह वर्षों का था, किंतु अल्प अवधि में ही उन्होंने प्रजा के बीच अत्यधिक यश और लोकप्रियता प्राप्त की।
  • वे स्वभाव से मिलनसार और प्रजाहितैषी थे। वे अपनी प्रजा की समस्याओं और कार्यों में विशेष रुचि लेते थे।
  • उनके शासनकाल में कुमाऊँ को धन-धान्य से परिपूर्ण और समृद्ध बताया गया है।
  • अनेक विद्वानों ने जगत चंद के काल को ‘कुमाऊँ का स्वर्ण काल’ कहा है। यह उनके शासनकाल की समृद्धि और लोकप्रियता का संकेत माना जाता है।
  • बरम (मुवानी) ताम्रपत्र से ज्ञान चंद के समय की एक महत्वपूर्ण घटना का पता चलता है। वीरेश्वर जोशी वैद्यकुड़ी ने बधानगढ़ के युद्ध में जासूसी की थी, जिससे ज्ञान चंद को बधानगढ़ विजय में सहायता मिली।
  • इस सेवा के बदले ज्ञान चंद ने वीरेश्वर जोशी को ‘रौत’ के रूप में भूमि प्रदान की थी। उस भूमि से संबंधित मूल ताम्रपत्र किसी अग्निकांड में जल गए थे।
  • इसलिए जगत चंद ने अपने पिता ज्ञान चंद की मृत्यु के बाद वीरेश्वर जोशी के पुत्रों को पुनः ताम्रपत्र प्रदान किया। इससे जगत चंद के प्रशासन में पुराने भूमि-अधिकारों की पुष्टि की परंपरा का पता चलता है।
  • उद्योत चंद और ज्ञान चंद की तरह जगत चंद को भी गढ़वाल राज्य से लगातार चुनौती मिलती रही।
  • राज्याभिषेक के प्रथम वर्ष ही जगत चंद ने लोहबागढ़ और बधानगढ़ पर आक्रमण किया। ज्ञान चंद की मृत्यु के बाद गढ़वाल के राजा ने बधानगढ़ पर अधिकार कर लिया था, इसलिए जगत चंद ने दोनों गढ़ों से गढ़वाली सेना को खदेड़ दिया।
  • दोनों गढ़ों पर विजय प्राप्त करने के बाद जगत चंद श्रीनगर की ओर बढ़े और वहाँ गढ़वाल के राजा फतेहशाह के साथ भीषण युद्ध हुआ।
  • इस युद्ध में फतेहशाह को पराजय का सामना करना पड़ा और वह देहरादून की ओर चला गया। एक अन्य परंपरा के अनुसार वह देहरादून के बजाय रानीहाट की ओर गया था।
  • जगत चंद ने श्रीनगर पर अधिकार कर लिया और वहाँ व्यापक लूट-खसोट की, जिसके कारण श्रीनगर लगभग वीरान हो गया।
  • श्रीनगर में अपना प्रतिनिधि नियुक्त करके जगत चंद कुमाऊँ लौटे, लेकिन उनके लौटते ही फतेहशाह ने आक्रमण कर उस प्रतिनिधि को वहाँ से मार भगाया।
  • इसके बाद फतेहशाह ने एक बड़ी सेना के साथ कुमाऊँ की कत्यूर घाटी पर आक्रमण किया।
  • गढ़वाली सेना ने गरुड़ ग्राम और बैजनाथ घाटी को प्रभावित किया तथा गरसार/गड़सार ग्राम को बद्रीनाथ मंदिर को अर्पित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • जगत चंद ने अपने पूर्वजों की तरह मुगल सम्राट बहादुरशाह के साथ भी राजनीतिक संबंध बनाए रखे।
  • उन्होंने बहादुरशाह को अनेक बहुमूल्य पहाड़ी वस्तुएँ भेंट कीं। इनमें घोड़े, चंवर, खाँड़े, खुकरी, कस्तूरी, निखीसी, गजगाह तथा सोने-चाँदी के बर्तन आदि प्रमुख थे।
  • इन उपहारों के बदले मुगल सम्राट ने जगत चंद को अभयदान प्रदान किया। इससे चंद राजा के मुगल दरबार के साथ कूटनीतिक संबंधों का पता चलता है।
  • जगत चंद ने अपने शासनकाल में जुआरियों पर कर भी लगाया था। यह उनके प्रशासन की आर्थिक नीतियों से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य है।
  • जगत चंद की मृत्यु के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद मिलता है। कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु का कारण चेंचक (चेचक) बताते हैं, जबकि कुछ इसे शीतला देवी के प्रकोप से जोड़ते हैं।

निष्कर्ष

राजा जगत चंद चंद वंश के इतिहास में अपनी लोकप्रियता, प्रजाहितैषी स्वभाव, सैन्य क्षमता और समृद्ध शासन के लिए विशेष स्थान रखते हैं। केवल बारह वर्षों के शासनकाल में उन्होंने प्रजा का इतना विश्वास अर्जित किया कि उनका काल बाद के इतिहासकारों द्वारा ‘कुमाऊँ का स्वर्ण काल’ तक कहा गया। गढ़वाल के साथ उनके संघर्ष में लोहबागढ़, बधानगढ़ और श्रीनगर अभियान प्रमुख रहे। यद्यपि श्रीनगर पर उनका अधिकार स्थायी नहीं रह सका, फिर भी इससे उनकी सैन्य सक्रियता स्पष्ट होती है। उन्होंने मुगल सम्राट बहादुरशाह के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए और बहुमूल्य पर्वतीय उपहार देकर अपने राज्य के लिए अभय प्राप्त किया। उनके शासनकाल में समृद्धि, प्रशासनिक गतिविधियों और धार्मिक-सामाजिक जीवन का विकास हुआ। उनकी मृत्यु चेंचक अथवा शीतला देवी के प्रकोप से हुई मानी जाती है। इस प्रकार जगत चंद का काल चंद इतिहास में लोकप्रिय और समृद्ध शासन की महत्वपूर्ण अवधि के रूप में याद किया जाता है।

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