परवर्ती कात्यूरी (प्रायः 1279–प्रायः 1520 ई.) |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
तेरहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में बैजनाथ के रणचूलीहाट में स्थापित मूल कातियूर सत्ता का क्रमशः विखंडन हुआ। इसके परिणामस्वरूप कातियूर राजवंश की अनेक शाखाएँ कुमाऊँ तथा वर्तमान पश्चिमी नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हो गईं। यद्यपि इन शाखाओं में राजनीतिक रूप से एकता नहीं रही, फिर भी वे अपने को कातियूर परंपरा से जोड़ती थीं। इस काल को इसलिए परवर्ती कात्यूरी काल कहा जाता है। इन शाखाओं ने मध्यकालीन कुमाऊँ की राजनीतिक संरचना को प्रभावित किया और आगे चलकर चन्द तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की।
प्रमुख तथ्य
- परवर्ती कात्यूरी काल का समय सामान्यतः प्रायः 1279 ई. से प्रायः 1520 ई. तक माना जाता है।
- तेरहवीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में रणचूलीहाट (बैजनाथ) में स्थापित मूल कातियूर वंश का बिखराव हुआ और उसकी विभिन्न शाखाएँ अलग-अलग क्षेत्रों में स्थापित हो गईं।
- मूल शाखा कत्यूर-बैजनाथ में बनी रही। यह शाखा रणचूलीहाट को अपनी वंशानुगत राजधानी के रूप में बनाए रखती रही।
- कातियूर वंश की एक प्रमुख शाखा डोटी में स्थापित हुई, जो वर्तमान में पश्चिमी नेपाल का हिस्सा है। आगे चलकर डोटी की कातियूर शाखा अत्यंत शक्तिशाली बनी।
- सुई शाखा काली कुमाऊँ में स्थापित हुई। इसका केंद्र वर्तमान लोहाघाट के निकट सुई क्षेत्र में था।
- अस्कोट में भी कातियूर वंश की एक शाखा स्थापित हुई। यहाँ के शासक आगे चलकर रजबार के नाम से प्रसिद्ध हुए।
- बारामण्डल में भी कातियूर वंश की एक शाखा के स्थापित होने का उल्लेख मिलता है।
- पाली-द्वाराहाट-लखनपुर शाखा रामगंगा क्षेत्र में प्रभावशाली रही। द्वाराहाट तथा लखनपुर इसके प्रमुख राजनीतिक केंद्रों में रहे।
- सीरा की शाखा डोटी के कातियूर राजवंश से संबंधित थी। इसके शासक रैका उपाधि धारण करते थे और सीराकोट इसका प्रमुख केंद्र था।
- सोर के बम/ब्रह्म राजा भी डोटी की कातियूर शाखा से संबंधित माने जाते हैं। इनका प्रमुख केंद्र पिथौरागढ़ के निकट उदयपुर था।
- इस प्रकार परवर्ती कात्यूरी सत्ता एकीकृत राज्य न रहकर अनेक क्षेत्रीय शाखाओं में विभाजित हो गई। प्रत्येक शाखा ने अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र या अर्द्ध-स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व विकसित किया।
- इन शाखाओं में डोटी-सीरा की रैका शाखा विशेष रूप से शक्तिशाली हुई, जबकि बैजनाथ की मूल शाखा का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया।
- बाद के समय में परमार और चन्द शक्तियों के विस्तार ने विभिन्न कात्यूरी शाखाओं के राजनीतिक अस्तित्व को चुनौती दी और धीरे-धीरे उनके क्षेत्रों पर बाहरी शक्तियों का नियंत्रण स्थापित होने लगा।
निष्कर्ष
परवर्ती कात्यूरी काल कुमाऊँ के इतिहास में एकीकृत कातियूर सत्ता के विखंडन और क्षेत्रीय राजवंशीय शाखाओं के उदय का काल था। मूल कातियूर सत्ता के कमजोर पड़ने के बाद बैजनाथ, डोटी, सुई, अस्कोट, बारामण्डल, पाली-द्वाराहाट-लखनपुर, सीरा और सोर जैसे विभिन्न केंद्रों में इसकी शाखाएँ स्थापित हुईं। इन शाखाओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में लंबे समय तक राजनीतिक प्रभाव बनाए रखा और स्थानीय सत्ता-संरचना को प्रभावित किया। इनमें डोटी-सीरा की रैका शाखा विशेष रूप से शक्तिशाली बनी। दूसरी ओर, बैजनाथ की मूल शाखा धीरे-धीरे कमजोर हुई और अंततः परमार तथा चन्द जैसी उभरती शक्तियों के सामने उसका राजनीतिक प्रभाव समाप्त होता गया। इस प्रकार परवर्ती कात्यूरी काल को कत्यूरी साम्राज्य के विघटन से क्षेत्रीय राज्यों के विकास की संक्रमणकालीन अवस्था के रूप में समझा जा सकता है।