बैजनाथ के परवर्ती कात्यूरी राजा :राजा प्रीतमदेव (पिथौराशाही, पृथ्वीपाल, पृथ्वीशाही)|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
प्रीतमदेव बैजनाथ की रणचूलीहाट स्थित मूल कात्यूरी शाखा के प्रमुख एवं अंतिम शक्तिशाली शासकों में माना जाता है। विभिन्न राजावलियों और लोकगाथाओं में उसके नाम के अलग-अलग रूप मिलते हैं, जिससे उसकी लोकप्रियता और ऐतिहासिक महत्त्व स्पष्ट होता है। उसके शासनकाल की सबसे प्रसिद्ध घटना चित्रशिला (रानीबाग) का युद्ध मानी जाती है, जिसमें उसने तुर्कों को पराजित किया था। उसकी पत्नी मौला देवी (जियारानी) भी लोकपरंपरा में अपने साहस और वीरता के लिए प्रसिद्ध है।
प्रमुख तथ्य
- प्रीतमदेव को विभिन्न स्रोतों में पिथौराशाही, पृथ्वीपाल और पृथ्वीशाही आदि नामों से भी जाना जाता है।
- राजावलियों में उसका नाम प्रीतमदेव मिलता है, जबकि जागर गाथाओं में उसे पृथ्वीपाल अथवा पिथौरा तथा नारसिंहजागर में पिथौरा-पीथमदेव कहा गया है।
- प्रीतमदेव रणचूलीहाट (बैजनाथ) की मूल कात्यूरी शाखा के अंतिम शक्तिशाली राजाओं में से एक था।
- उसके शासनकाल की प्रमुख उपलब्धि चित्रशिला (वर्तमान रानीबाग क्षेत्र) में तुर्कों के विरुद्ध युद्ध में विजय मानी जाती है।
- चित्रशिला/रानीबाग युद्ध की तिथि लगभग 1418 ई. अनुमानित की जाती है।
- इस विजय से प्रीतमदेव की सैन्य क्षमता तथा कात्यूरी सत्ता की तत्कालीन राजनीतिक-सैनिक शक्ति का पता चलता है।
- प्रीतमदेव की पत्नी का नाम मौला देवी था, जिन्हें लोकगाथाओं में जियारानी के नाम से भी प्रसिद्धि मिली है।
- परंपरा के अनुसार जियारानी हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की पुत्री थीं। उन्हें कुमाऊँ की ‘लक्ष्मीबाई’ के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
- लोकपरंपराओं में जियारानी के अन्य नाम पिगला/प्योला भी मिलते हैं। चित्रशिला के युद्ध में उन्होंने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया था।
- प्रीतमदेव को पिथौरागढ़ बसाने का श्रेय भी दिया जाता है। इसी कारण लोकपरंपरा में उसका नाम पिथौरागढ़ के इतिहास से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है।
- प्रीतमदेव के व्यक्तित्व में राजनीतिक नेतृत्व, सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय विस्तार के गुण दिखाई देते हैं, जिसके कारण वह परवर्ती कात्यूरी इतिहास का प्रमुख शासक माना जाता है।
निष्कर्ष
प्रीतमदेव बैजनाथ की मूल कात्यूरी शाखा के अंतिम शक्तिशाली शासकों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। राजावलियों में प्रीतमदेव तथा लोकगाथाओं में पृथ्वीपाल, पिथौरा और पिथौरा-पीथमदेव जैसे नामों से उसका उल्लेख उसकी व्यापक लोकस्मृति को दर्शाता है। उसके शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना 1418 ई. के आसपास चित्रशिला (रानीबाग) में तुर्कों पर विजय मानी जाती है। उसकी पत्नी जियारानी भी अपनी वीरता के कारण कुमाऊँ की लोकपरंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध हैं। प्रीतमदेव को पिथौरागढ़ बसाने का श्रेय भी दिया जाता है। इस प्रकार वह केवल बैजनाथ कात्यूरी शाखा का शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि कुमाऊँ की राजनीतिक और लोक-सांस्कृतिक स्मृति में स्थायी स्थान रखने वाला ऐतिहासिक व्यक्तित्व है।