कालसी शिलालेख
परिचय
कालसी शिलालेख उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है। यह मौर्य सम्राट अशोक के 14 प्रमुख शिलालेखों में शामिल है और अशोक की धम्म नीति, अहिंसा तथा मानव एवं पशु कल्याण से संबंधित जानकारी प्रदान करता है। देहरादून जिले में यमुना और टोंस नदियों के संगम के निकट स्थित यह शिलालेख उत्तराखंड के मौर्यकालीन इतिहास पर भी महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है। इसमें तत्कालीन क्षेत्र के पुलिंद, अपरांत तथा पाँच यूनानी राजाओं से संबंधित उल्लेख मिलते हैं। इसलिए कालसी शिलालेख उत्तराखंड के राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को समझने के लिए विशेष महत्व रखता है।
कालसी शिलालेख प्रमुख तथ्य
- कालसी शिलालेख की खोज जॉन फॉरेस्ट ने 1860 ई. में की थी।
- इसका निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने लगभग 257 ई.पू. में करवाया था।
- कालसी शिलालेख देहरादून जिले में यमुना एवं टोंस नदी के संगम के पास स्थित है। यहाँ अमलावा गाड़ भी बहती है।
- कालसी शिलालेख को स्थानीय भाषा में ‘चित्रशिला’ कहा जाता है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसे ‘सुधनगर’ कहा है, जबकि पाणिनि ने इसे ‘कुलुन’ कहा है।
- कालसी को जौनसार-बावर का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।
- वॉल्टन ने कालसी को ‘शांत तालाब’ कहा है।
- कालसी शिलालेख में अशोक ने हाथी की आकृति उत्कीर्ण करवाई है। उसके पैरों के बीच ‘गजतमे’ अर्थात् ‘श्रेष्ठतम हाथी’ शब्द अंकित है।
- कालसी शिलालेख अशोक के 14 प्रमुख शिलालेखों में 13वाँ शिलालेख है। यह प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। उस समय पाली जनसाधारण की भाषा थी।
- कालसी लेख में अशोक ने घोषणा की है कि उसके राज्य के विभिन्न स्थानों पर मनुष्यों एवं पशुओं के लिए चिकित्सा की व्यवस्था की गई है। साथ ही, लोगों को हिंसा का त्याग कर अहिंसा अपनाने का संदेश दिया गया है।
- कालसी अभिलेख में यहाँ के निवासियों के लिए ‘पुलिंद’ तथा इस क्षेत्र के लिए ‘अपरांत’ शब्द का प्रयोग हुआ है।
- कालसी का प्राचीन नाम सुधनगर एवं कालकूट बताया जाता है। यह कुणिंदों की राजधानी भी रही थी।
- कालसी अभिलेख से पता चलता है कि उस समय उत्तराखंड का यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य के अधीन रहा होगा।
- सिंहली बौद्ध ग्रंथ महावंश के अनुसार, अशोक काल में तृतीय बौद्ध संगीति के अध्यक्ष मोग्गालिपुत्त तिस्स ने हिमवत प्रदेश में धर्म-विजय के लिए मज्झिम तथा उसके चार साथियों को भेजा था।
- कालसी अभिलेख में पाँच यूनानी राजाओं के नाम मिलते हैं।
- सिरमौर इतिहास के अनुसार, कालसी एक समय सिरमौर साम्राज्य की राजधानी रही थी।
- सिरमौर के शासक करम प्रकाश ने लगभग 1621 ई. में अपनी राजधानी कालसी से नाहन स्थानांतरित की थी।
- 1254 ई. में सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद द्वारा कालसी के स्तूपों एवं मंदिरों का विनाश किए जाने का उल्लेख मिलता है।
निष्कर्ष
कालसी शिलालेख उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास को समझने का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक स्रोत है। यह न केवल अशोक की धम्म नीति, अहिंसा और मानव-पशु कल्याण की भावना को स्पष्ट करता है, बल्कि तत्कालीन उत्तराखंड क्षेत्र के मौर्य साम्राज्य से संबंध का भी महत्वपूर्ण संकेत देता है। अभिलेख में पुलिंद, अपरांत और गजतमे जैसे शब्दों का उल्लेख तथा कालसी में हाथी की आकृति इसकी विशिष्ट विशेषताएँ हैं। इसके अतिरिक्त, कालसी का संबंध कुणिंदों और बाद में सिरमौर की राजनीतिक परंपरा से भी रहा। इस प्रकार, कालसी शिलालेख उत्तराखंड के प्राचीन राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक इतिहास के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।