अशांतिदेव (लगभग 1040–1050 ई.) |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
अशांतिदेव को बैजनाथ अथवा कत्यूर घाटी में स्थापित कातियूर (कत्यूरी) वंश का प्रमुख संस्थापक माना जाता है। उसके संबंध में जानकारी मुख्यतः पाली-पछाऊ की वंशावली, नारसिंहजाप हस्तपोती, गुरु पादुका की पांडुलिपि तथा कुमाऊँ की लोककथाओं से प्राप्त होती है। परंपराओं के अनुसार अशांतिदेव नाथपंथी साधु नारसिंह जोगी से प्रभावित था और उसके परामर्श से उसने अपनी राजधानी जोशीमठ से हटाकर कत्यूर घाटी के रणचूलाकोट (बैजनाथ) में स्थापित की। इस प्रकार अशांतिदेव के समय कत्यूर क्षेत्र में कत्यूरी सत्ता के नए केंद्र का विकास हुआ।
प्रमुख तथ्य
- अशांतिदेव ने लगभग 1040–1050 ई. के आसपास कत्यूर घाटी के रणचूलाकोट (बैजनाथ) में कातियूर (कत्यूरी) वंश की स्थापना की मानी जाती है।
- पाली-पछाऊ की वंशावली में अशांतिदेव को कातियूर (कत्यूरी) वंश का संस्थापक माना गया है।
- नारसिंहजाप हस्तपोती में भी कातियूर वंश की वंशावली का प्रारंभ अशांतिदेव से होता है, जिससे उसके संस्थापक होने के मत को समर्थन मिलता है।
- कुमाऊँ की लोककथाओं में अशांतिदेव के वंश को कत्युरी अथवा कंथापुरी नाम से संबोधित किया गया है।
- लोककथाओं एवं गुरु पादुका की पांडुलिपि के अनुसार अशांतिदेव ने अपनी राजधानी जोशीमठ से कत्यूर घाटी के रणचूलाकोट में स्थानांतरित की थी।
- राजधानी परिवर्तन में नाथपंथी नारसिंह जोगी की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। परंपरा के अनुसार अशांतिदेव ने उसके परामर्श पर राजधानी को कत्यूर घाटी में स्थापित किया।
- अशांतिदेव स्वयं भी नारसिंह जोगी से प्रभावित माना जाता है। इससे उसके समय नाथपंथ के प्रभाव का संकेत मिलता है।
- रणचूलाकोट में सत्ता का केंद्र स्थापित होने के बाद कत्यूर घाटी कत्यूरी राजनीतिक शक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र बन गई और आगे चलकर बैजनाथ क्षेत्र का विशेष महत्व स्थापित हुआ।
- अशांतिदेव से संबंधित स्रोतों में अभिलेखीय प्रमाणों की अपेक्षा वंशावलियों, पांडुलिपियों और लोकपरंपराओं की भूमिका अधिक दिखाई देती है। इसलिए इन स्रोतों से प्राप्त विवरणों का ऐतिहासिक मूल्यांकन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।
- कत्यूरी वंश के संस्थापक के संबंध में शालिवाहन और अशांतिदेव से संबंधित विभिन्न मत मिलते हैं, किंतु पाली-पछाऊ वंशावली और नारसिंहजाप हस्तपोती में वंशावली का प्रारंभ अशांतिदेव से होने के कारण उसका मत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
अशांतिदेव को कत्यूर घाटी में कत्यूरी सत्ता के पुनर्संगठन एवं स्थापना का प्रमुख शासक माना जाता है। लगभग 1040–1050 ई. के आसपास रणचूलाकोट (बैजनाथ) को सत्ता का केंद्र बनाने की परंपरा उसके राजनीतिक महत्व को स्पष्ट करती है। पाली-पछाऊ की वंशावली और नारसिंहजाप हस्तपोती में वंशावली का आरंभ अशांतिदेव से होना उसके संस्थापक होने के मत को महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। वहीं गुरु पादुका की पांडुलिपि और कुमाऊँ की लोककथाएँ उसके नाथपंथी नारसिंह जोगी से संबंध तथा राजधानी परिवर्तन की जानकारी देती हैं। हालांकि इन स्रोतों में लोकपरंपरा और ऐतिहासिक तथ्य दोनों मिश्रित हैं, इसलिए इनके आधार पर प्राप्त जानकारी की आलोचनात्मक जाँच आवश्यक है। फिर भी कत्यूर घाटी में कत्यूरी राजनीतिक केंद्र की स्थापना के संदर्भ में अशांतिदेव का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है।