राजा प्रद्युम्न शाह उर्फ प्रद्युम्न चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा प्रद्युम्न शाह, जिन्हें कुमाऊँ में प्रद्युम्न चंद के नाम से भी जाना जाता है, चंद वंश के अंतिम चरण के सबसे महत्वपूर्ण शासकों में थे। 1779 ई. में ललितशाह ने उन्हें कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया और वे 1786 ई. तक कुमाऊँ के शासक रहे। उन्होंने स्वयं को दीपचंद का दत्तक पुत्र घोषित किया। उनकी ऐतिहासिक महत्ता इसलिए असाधारण है क्योंकि कुछ समय के लिए गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों उनके अधीन आ गए थे। इस प्रकार वे कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों पर शासन करने वाले एकमात्र शासक माने जाते हैं। कुमाऊँ में उनके प्रतिनिधि के रूप में हर्षदेव जोशी ने शासन संचालन किया।
प्रमुख तथ्य
- 1779 से 1786 ई. तक प्रद्युम्न शाह कुमाऊँ की गद्दी पर रहे और वहाँ प्रद्युम्न चंद के नाम से शासन किया।
- उन्होंने स्वयं को राजा दीपचंद का दत्तक पुत्र घोषित किया।
- जयकृत शाह की मृत्यु के बाद प्रद्युम्न शाह श्रीनगर आए और गढ़वाल की राजनीति में सक्रिय हुए।
- 1786 ई. में गढ़वाल और कुमाऊँ कुछ समय के लिए प्रद्युम्न शाह के अधीन आ गए।
- कुमाऊँ में प्रद्युम्न शाह के प्रतिनिधि के रूप में हर्षदेव जोशी ने शासन का संचालन किया।
- प्रद्युम्न शाह की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि वे गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों के राजा बने।
- इसलिए परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न है—गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों का राजा बनने वाला एकमात्र शासक कौन था? — प्रद्युम्न शाह।
निष्कर्ष
राजा प्रद्युम्न शाह उर्फ प्रद्युम्न चंद चंद वंश के अंतिम चरण की राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वे मूलतः गढ़वाल की राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़े थे, किंतु 1779 ई. में ललितशाह की सहायता से कुमाऊँ की गद्दी पर बैठे। उन्होंने स्वयं को दीपचंद का दत्तक पुत्र घोषित करके अपने शासन को वैधता देने का प्रयास किया। उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह रही कि 1786 ई. में कुछ समय के लिए गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों उनके अधीन रहे। कुमाऊँ में उनका प्रतिनिधित्व हर्षदेव जोशी ने किया। इस कारण प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों का राजा बनने वाला एकमात्र शासक माना जाता है। उनका शासन चंद सत्ता के अंतिम राजनीतिक संघर्षों तथा गढ़वाल-कुमाऊँ की बदलती शक्ति-समीकरणों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।