स्वतंत्रता आंदोलन में उत्तराखंड की महिलाओं की भूमिका
परिचय
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड की महिलाओं ने साहस, त्याग और समर्पण के साथ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने नमक सत्याग्रह, जंगलात आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। अनेक महिलाओं ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, तिरंगा फहराने, जनजागरण और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया तथा जेल की यातनाएँ सहीं। विशनी देवी शाह, कुंती वर्मा, पद्मा जोशी और सरला बहन जैसी महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ सामाजिक सुधार, महिला जागृति और आत्मनिर्भरता को भी प्रोत्साहित किया।
प्रमुख तथ्य
- स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उत्तराखंड की महिलाएँ सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। इस दौरान कुंती वर्मा, पद्मा जोशी, कुंती देवी रावत, दुर्गावती पंत, भागीरथी देवी वर्मा, तुलसी देवी रावत, भिवेडी देवी, भक्ति देवी, भागुली देवी, जानकी देवी, मंगला देवी, रेवती देवी और शकुंतला देवी आदि ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- नमक सत्याग्रह के दौरान नैनीताल में विमला, जानकी, भागीरथी, शकुंतला, सावित्री तथा पद्मा जोशी आदि महिलाएँ सक्रिय रहीं।
- नमक सत्याग्रह के दौरान अल्मोड़ा नगरपालिका भवन पर विशनी देवी शाह के नेतृत्व में कुंती वर्मा, जीवन्ती, मंगला और रेवती आदि महिलाओं ने तिरंगा फहराया। दिसंबर, 1930 में विशनी देवी शाह को गिरफ्तार करके अल्मोड़ा जेल में रखा गया। उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल जाने वाली उत्तराखंड की पहली महिला माना जाता है।
- दुर्गा देवी वर्ष 1921 में जंगलात आंदोलन के दौरान जेल जाने वाली क्षेत्र की पहली महिलाओं में से एक थीं।
- स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं के बढ़ते योगदान को दबाने के लिए फरवरी, 1932 में आठ महिलाओं को फतेहगढ़ जेल तथा पद्मा जोशी को लखनऊ जेल भेजा गया। कुंती वर्मा को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश भी जारी किया गया।
- भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मालती देवी के नेतृत्व में ‘देश सेवक संगठन’ से जुड़ी विद्या देवी, कुंती देवी, सरस्वती और भागीरथी आदि महिलाओं ने रेल संपत्ति को काफी क्षति पहुँचाई। इसके लिए उन्हें 15-15 वर्ष की सजा सुनाई गई।
- वर्ष 1941 में गांधीजी ने अपनी विदेशी शिष्या सरला बहन (कैथरीन हिलमन) को अल्मोड़ा भेजा। उन्होंने कौसानी में लक्ष्मी आश्रम की स्थापना की। आश्रम में कताई-बुनाई के साथ महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए तैयार करने का कार्य भी किया जाता था।
- पिथौरागढ़ की तुलसी देवी ने सरला बहन की प्रेरणा से कताई-बुनाई केंद्र और ऊन गृह उद्योग समिति के माध्यम से निराश्रित महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया। उनका संदेश था— “रोओ नहीं, आगे बढ़ो।”
- लक्ष्मी आश्रम से जुड़ी कमला और बसंती बहनों ने सर्वोदय के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- गांधीजी की दूसरी विदेशी शिष्या मीरा बहन ने ऋषिकेश में पशुलोक की स्थापना की और महिला जागृति के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
निष्कर्ष
उत्तराखंड की महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आंदोलन बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध करने के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों को चुनौती दी और महिला शिक्षा, स्वावलंबन तथा जनजागरण को बढ़ावा दिया। विशनी देवी शाह, कुंती वर्मा, पद्मा जोशी, सरला बहन और मीरा बहन जैसी महिलाओं का योगदान उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम तथा सामाजिक परिवर्तन के इतिहास में उल्लेखनीय है।