मेदिनी शाह (1664–1684 ई.) |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
मेदिनी शाह पंवार/परमार वंश का एक महत्वाकांक्षी, साहसी तथा कुशल कूटनीतिज्ञ शासक माना जाता है। उसने अपने पिता पृथ्वीपति शाह के जीवनकाल में ही लगभग 1660 ई. में सत्ता अपने हाथ में ले ली थी, किंतु उसका औपचारिक राज्याभिषेक 1664 ई. में पृथ्वीपति शाह की मृत्यु के बाद हुआ। युवराज रहते हुए सुलेमान शिकोह को मुगल सेना के हाथों सौंपने से उसने औरंगजेब का विश्वास प्राप्त किया। बाद में इसी राजनीतिक संबंध का लाभ उठाकर उसने मुगलों द्वारा छीने गए दून क्षेत्र को पुनः पंवार राज्य में मिलाने में सफलता प्राप्त की। उसके समय चंद-पंवार संघर्ष भी जारी रहा। एटकिंसन ने उसके व्यक्तित्व और राजनीतिक गतिविधियों के कारण उसे “गढ़वाल का तुगलक” कहा है।
प्रमुख बिंदु
- मेदिनी शाह ने अपने पिता पृथ्वीपति शाह से लगभग 1660 ई. में ही पंवार राज्य की सत्ता अपने हाथ में ले ली थी, लेकिन उसका औपचारिक राज्याभिषेक 1664 ई. में पृथ्वीपति शाह की मृत्यु के बाद हुआ।
- मेदिनी शाह को एक महत्वाकांक्षी एवं अवसरवादी शासक माना जाता है। उसने युवराज रहते हुए ही सुलेमान शिकोह को मुगल सेना के हवाले करके औरंगजेब की कृपा प्राप्त कर ली थी।
- उसके राज्याभिषेक के अवसर पर औरंगजेब ने उसके लिए खिलअत भेजी, जो मेदिनी शाह और मुगल दरबार के बीच बने राजनीतिक संबंधों को दर्शाता है।
- मेदिनी शाह का प्रमुख उद्देश्य उन क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करना था जिन्हें मुगलों ने उसके पिता पृथ्वीपति शाह के समय दून क्षेत्र से छीन लिया था।
- औरंगजेब ने मेदिनी शाह को दिल्ली बुलाकर हिमाचल क्षेत्र के बुटोलगढ़ पर अधिकार करने के अभियान में भेजा। मेदिनी शाह को वहाँ सफलता प्राप्त हुई, जिससे औरंगजेब उससे अत्यंत प्रसन्न हुआ।
- मेदिनी शाह ने इस अवसर का राजनीतिक लाभ उठाते हुए औरंगजेब से दून क्षेत्र वापस देने का अनुरोध किया। औरंगजेब ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और इस प्रकार मेदिनी शाह दून क्षेत्र को पुनः पंवार राज्य में मिलाने में सफल हुआ।
- दून क्षेत्र की व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए मेदिनी शाह ने वहाँ पृथ्वी नगर बसाया तथा एक दुर्ग का निर्माण भी करवाया।
- पंवार राजाओं के लिए दून क्षेत्र का वही महत्व था जो चंद राजाओं के लिए तराई अथवा माल क्षेत्र का था। इसलिए दून की पुनः प्राप्ति मेदिनी शाह की महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि थी।
- मेदिनी शाह के समय पंवार और चंद राज्यों के बीच पुरानी शत्रुता समाप्त नहीं हुई। बाजबहादुर चंद के तिब्बत अभियान पर जाने का लाभ उठाकर पंवार सेना ने पूर्व में चंदों द्वारा जीते गए कुछ क्षेत्रों पर पुनः अधिकार कर लिया।
- बाजबहादुर चंद के तिब्बत से लौटने पर उसने क्रोधित होकर पंवार राज्य पर आक्रमण किया और उसकी सेना श्रीनगर तक पहुँच गई। बाद में दोनों राज्यों के बीच संधि हुई और मेदिनी शाह ने उपहार तथा सैनिक व्यय देकर अपने छीने गए क्षेत्र पुनः प्राप्त कर लिए
- मेदिनी शाह बाजबहादुर चंद द्वारा किए गए इस आक्रमण और अपमान को नहीं भूला। उसने बाजबहादुर चंद की शिकायत औरंगजेब से की।
- औरंगजेब ने बाजबहादुर चंद के विरुद्ध सेना भेजी। मुगल सेना ने चंद राज्य के तराई वाले भाग पर अधिकार कर लिया। हालांकि बाद में बाजबहादुर चंद नवाब अलीवर्दी खाँ की सहायता से औरंगजेब को मनाने में सफल रहा।
- बाजबहादुर चंद की मृत्यु के बाद उसका पुत्र उद्योत चंद चंद राजा बना। उसने पंवार राज्य पर आक्रमण कर उसके कुछ क्षेत्रों में लूटपाट की।
- इसके बाद मेदिनी शाह ने चंदों के विरुद्ध डोटी के रैका से मित्रता कर ली। दोनों ने चंद राज्य पर अलग-अलग दिशाओं से आक्रमण किया।
- डोटी के रैका ने चम्पावत की ओर से तथा मेदिनी शाह ने दुनागिरि और द्वाराहाट की ओर से चंद राज्य पर आक्रमण किया और इन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
- लेकिन चंद राजा उद्योत चंद दोनों सेनाओं को पराजित करने में सफल रहा। इससे स्पष्ट होता है कि मेदिनी शाह के समय भी पंवार-चंद संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था।
- मेदिनी शाह ने अपनी राजनीतिक कुशलता और कूटनीति का प्रयोग करते हुए एक ओर औरंगजेब से संबंध बनाए रखे और दूसरी ओर चंदों के विरुद्ध डोटी के रैका जैसे क्षेत्रीय शासकों से सहयोग प्राप्त किया।
- दून क्षेत्र को पुनः प्राप्त करना उसकी प्रमुख उपलब्धियों में था। उसने औरंगजेब के साथ अपने संबंधों का लाभ उठाकर वह क्षेत्र वापस लिया, जिसे उसके पिता के समय मुगलों ने अपने अधिकार में कर लिया था।
- मेदिनी शाह के व्यक्तित्व में वीरता, साहस, कूटनीति और अवसरवादिता के तत्व दिखाई देते हैं। सुलेमान शिकोह प्रकरण में उसकी भूमिका तथा दून की पुनर्प्राप्ति उसके राजनीतिक व्यवहार को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
- अपने पिता के जीवनकाल में ही सत्ता अपने हाथ में लेना उसके महत्वाकांक्षी राजनीतिक चरित्र को दर्शाता है। इसे तत्कालीन भारतीय राजनीति में प्रचलित सत्ता-संघर्षों के संदर्भ में भी देखा जाता है।
- एटकिंसन ने मेदिनी शाह को “गढ़वाल का तुगलक” कहा है। यह उपमा उसके महत्वाकांक्षी और राजनीतिक रूप से सक्रिय व्यक्तित्व के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
- मेदिनी शाह के संबंध में एक प्रश्नात्मक तथ्य यह भी पूछा जाता है कि “किस परमार वंश के राजकुमार के बारे में कहा जाता है कि उसने गढ़वाल पर कभी शासन नहीं किया?” — इसका उत्तर मेदिनी शाह दिया जाता है। यह तथ्य उसके द्वारा पिता के जीवनकाल में सत्ता हथियाने और औपचारिक राज्याभिषेक के बीच के अंतर से संबंधित माना जाता है।
- समग्र रूप से मेदिनी शाह ने समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप सैन्य शक्ति के साथ कूटनीति का भी प्रभावी उपयोग किया। दून की पुनर्प्राप्ति और चंद राज्य के विरुद्ध विभिन्न शक्तियों से गठबंधन उसकी राजनीतिक चतुराई को दर्शाते हैं।
निष्कर्ष
मेदिनी शाह पंवार वंश के उन शासकों में था जिसने मुगल शक्ति, चंद-पंवार संघर्ष और क्षेत्रीय राजनीति के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया। उसके राजनीतिक जीवन में सुलेमान शिकोह प्रकरण महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि इसी के माध्यम से उसने औरंगजेब का विश्वास प्राप्त किया और बाद में दून क्षेत्र को पुनः प्राप्त करने में उस संबंध का लाभ उठाया। उसने दून में पृथ्वी नगर और दुर्ग की स्थापना कर वहाँ अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया। दूसरी ओर, चंदों के विरुद्ध उसने डोटी के रैका तथा मुगल शक्ति जैसे बाहरी सहयोगों का उपयोग किया। यद्यपि सभी सैन्य प्रयास सफल नहीं रहे, फिर भी उसकी कूटनीतिक सूझबूझ, साहस और अवसरानुकूल राजनीति उल्लेखनीय रही। इसी कारण एटकिंसन द्वारा दिया गया “गढ़वाल का तुगलक” विशेष रूप से परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य है।