UTTRAKHAND ALL SUBJECT MIXED MCQ HINDI MEDIUM
Part 1, Part2
Part 1, Part2
परिचय सीरा शाखा डोटी से संबंधित परवर्ती कात्यूरी शाखाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। सीरा राज्य वर्तमान पिथौरागढ़ क्षेत्र में सोर के उत्तर से काली नदी तक विस्तृत था और इसकी राजधानी दुर्गम सीराकोट थी। यहाँ के शासक रैका उपाधि धारण करते थे तथा मल्लवंशी माने जाते हैं। सीरा के इतिहास के लिए अभिलेख, वंशावलियाँ…
परिचय कुणिन्दों के इतिहास के पुनर्निर्माण में उनकी मुद्राओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। साहित्यिक स्रोतों की अपेक्षा कुणिन्द मुद्राएँ उनके राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन की अधिक प्रत्यक्ष एवं पुरातात्त्विक जानकारी प्रदान करती हैं। कुणिन्दों की प्रारम्भिक मुद्राओं पर ‘कुणिन्द’ अथवा ‘कादस’ जैसे जनपद/गणसूचक लेख मिलते हैं, जबकि परवर्ती मुद्राओं पर अमोघभूति, शिवदत्त,…
उत्तराखंड का प्राचीन इतिहास 1. प्रागैतिहासिक इतिहास – पाषाणयुगीन उपकरण (Palaeoliths)- गुहा – चित्र (Cave Painting)2.आद्य इतिहास- महापाषाणीय ऊखल -सदृश गड़ढे(Cup Marks)- ताम्र-निखात संस्कृति(Copper Hoard Culture)- महापाषाणीय शवाधान (Megalithic Burials)- चित्रित धुसर मृदभाड(PGW)3. वैदिक व पौराणिक काल मे उत्तराखंड 4. कुणिंद शासन काल 5. उत्तराखंड मे शक शासन 6. उत्तराखंड मे कुषाण शासन 7. कुषाणोंत्तर…
परिचय त्रिभुवनराज के पश्चात कार्तिकेयपुर राज्य की सत्ता निम्बर के हाथों में आई। उसे कार्तिकेयपुर राज्य के द्वितीय राजपरिवार का संस्थापक माना जाता है। निम्बर के संबंध में बागेश्वर शिलालेख तथा पाण्डुकेश्वर ताम्राभिलेख से महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। वह एक शक्तिशाली एवं युद्ध-कुशल शासक था। उसके शासनकाल में राज्य के राजनीतिक संबंधों में महत्वपूर्ण…
परिचय इच्छटदेव के पश्चात उसका उत्तराधिकारी देशटदेव कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा। वह तृतीय राजपरिवार के प्रमुख शासकों में माना जाता है। उसके शासनकाल की जानकारी मुख्यतः ताम्रपत्रों से प्राप्त होती है, जिनसे उसके प्रशासन, धार्मिक गतिविधियों तथा दानशीलता का परिचय मिलता है। देशटदेव ने उच्च राजकीय उपाधियाँ धारण कीं और मंदिरों को भूमि…
परिचय पौरव अथवा पर्वताकार वंश उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजवंश था, जिसका प्रमुख केंद्र ब्रह्मपुर माना जाता है। इस वंश के शासनकाल और राज्य-विस्तार के संबंध में प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, इसलिए इतिहासकारों ने तालेश्वर ताम्रपत्रों, समकालीन राजनीतिक घटनाओं तथा ह्वेनसांग के विवरण के आधार पर इसके काल एवं सीमा का निर्धारण…