इच्छटदेव|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
सलोणादित्य के पश्चात उसका पुत्र इच्छटदेव कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा। बालेेश्वर एवं पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्रों के आधार पर इच्छटदेव को सलोणादित्य वंश का संस्थापक माना गया है। इस मत के अनुसार उसके पिता सलोणादित्य के पश्चात इच्छटदेव ने न केवल राजसत्ता को आगे बढ़ाया, बल्कि नए राजपरिवार की राजनीतिक स्थिति को भी सुदृढ़ किया। उसकी उपाधियों से उसकी उच्च राजकीय स्थिति तथा धार्मिक आस्था का पता चलता है। उपलब्ध अभिलेखीय जानकारी उसके शासन एवं वंश परंपरा के अध्ययन में महत्वपूर्ण है।
इच्छटदेव मुख्य तथ्य
- सलोणादित्य के पश्चात उसका पुत्र इच्छटदेव कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा।
- बालेेश्वर एवं पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्रों के अनुसार इच्छटदेव को सलोणादित्य वंश का संस्थापक माना गया है। यह मत यशवंत सिंह कठोच के मत से भिन्न है, जिन्होंने सलोणादित्य को संस्थापक माना है।
- इच्छटदेव ने ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी, जो उसकी उच्च राजकीय प्रतिष्ठा को दर्शाती है।
- उसे ‘परम ब्राह्मण’ की उपाधि भी प्राप्त थी, जिससे ब्राह्मण धर्म के प्रति उसकी आस्था का संकेत मिलता है।
- इच्छटदेव की एक अन्य उपाधि ‘परम माहेश्वर’ थी, जो उसके शैव धर्म के प्रति समर्पण को दर्शाती है।
- उसकी विभिन्न उपाधियों से उसके व्यक्तित्व में राजकीय प्रभुत्व तथा धार्मिक प्रतिष्ठा दोनों का समन्वय दिखाई देता है।
- इच्छटदेव की रानी का नाम सिन्धु देवी था।
- इच्छटदेव के संबंध में प्राप्त ताम्रपत्र सलोणादित्य वंश की वंशावली एवं उत्तराधिकार परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
- इच्छटदेव के शासनकाल से यह स्पष्ट होता है कि सलोणादित्य के पश्चात इस राजपरिवार की सत्ता निरंतर बनी रही और आगे की कत्यूरी परंपरा को आधार मिला।
- इच्छटदेव के पश्चात उसका उत्तराधिकारी देशटदेव हुआ, जिसने इस राजवंश की राजनीतिक एवं धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाया।
निष्कर्ष
इच्छटदेव कार्तिकेयपुर राज्य के तृतीय राजपरिवार के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला शासक था। बालेेश्वर एवं पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्रों के आधार पर उसे सलोणादित्य वंश का संस्थापक माना जाना विशेष महत्व रखता है। उसकी ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’, ‘परम ब्राह्मण’ तथा ‘परम माहेश्वर’ जैसी उपाधियाँ उसके राजनीतिक प्रभुत्व और धार्मिक आस्था को स्पष्ट करती हैं। उसकी रानी का नाम सिन्धु देवी था। इस प्रकार इच्छटदेव ने सलोणादित्य की उत्तराधिकार परंपरा को आगे बढ़ाते हुए तृतीय राजपरिवार को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।