आजाद हिन्द फौज में उत्तराखंड की भूमिका

परिचय

आजाद हिन्द फौज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्त्वपूर्ण सशस्त्र संगठन था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन से भारत को मुक्त कराना था। वर्ष 1941 में कैप्टन मोहन सिंह ने इसका गठन किया और वर्ष 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसकी कमान संभाली। उत्तराखंड के अनेक सैनिकों और अधिकारियों ने आजाद हिन्द फौज में शामिल होकर स्वतंत्रता के लिए योगदान दिया। चंद्र सिंह नेगी, देव सिंह दानू, पी. पी. रतूड़ी और वीर केसरी चंद जैसे नाम इस संघर्ष में उत्तराखंड की भागीदारी को दर्शाते हैं।

प्रमुख तथ्य

  • वर्ष 1941 में आजाद हिन्द फौज का गठन कैप्टन मोहन सिंह ने किया था।
  • सुभाषचंद्र बोस ने वर्ष 1943 में सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज की बागडोर संभाली।
  • आजाद हिन्द फौज में उत्तराखंड के लगभग 12 प्रतिशत सैनिक (करीब 2,500) थे।
  • लेफ्टिनेंट चंद्र सिंह नेगी को सिंगापुर में ऑफिसर्स ट्रेनिंग स्कूल का कमांडर नियुक्त किया गया था।
  • मेजर देव सिंह दानू को नेताजी की निजी अंगरक्षक बटालियन का कमांडर नियुक्त किया गया था।
  • कर्नल पी. पी. रतूड़ी सुभाष रेजीमेंट की प्रथम बटालियन के कमांडर थे। बर्मा अभियान में अदम्य साहस दिखाने के लिए उन्हें ‘सरदार-ए-जंग’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
  • 21 सितंबर, 1942 को गढ़वाल राइफल्स की दो बटालियन—2/18 और 5/18—आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गई थीं।
  • जौनसार-बावर के वीर केसरी चंद आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए थे। उन्हें इम्फाल मोर्चे के दौरान पकड़ लिया गया था।
  • 3 मई, 1945 को वीर केसरी चंद को दिल्ली में फाँसी दी गई। उनकी स्मृति में 3 मई को चौलीथात में मेला आयोजित किया जाता है।
  • बुद्धि शरण सिंह रावत आजाद हिन्द फौज में लेफ्टिनेंट कर्नल थे। सुभाषचंद्र बोस ने उन्हें अपना निजी सहायक नियुक्त किया था।
  • पितृशरण रतूड़ी आजाद हिन्द फौज में लेफ्टिनेंट कर्नल थे।
  • पदम सिंह गोसाई को मेजर का पद देकर सुभाष रेजीमेंट की तीसरी बटालियन का कमांडर नियुक्त किया गया था।

निष्कर्ष

आजाद हिन्द फौज में उत्तराखंड के सैनिकों और अधिकारियों की भागीदारी राज्य के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इन सैनिकों ने सैन्य नेतृत्व, प्रशिक्षण और युद्ध अभियानों में योगदान दिया। वीर केसरी चंद का बलिदान तथा अन्य अधिकारियों की भूमिका स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए गए सशस्त्र संघर्ष और उत्तराखंड की राष्ट्रीय चेतना को दर्शाती है।

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