पृथ्वीपति शाह (1640–1664 ई.) भाग -1 |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा पृथ्वीपति शाह (1640–1664 ई.) पंवार/परमार वंश का 47वाँ शासक था। वह राजा महिपति का पुत्र था और महिपति की मृत्यु के समय अवयस्क होने के कारण प्रारंभ में राज्य की वास्तविक सत्ता उसकी संरक्षिका रानी कर्णावती के हाथों में रही। पृथ्वीपति शाह के शासनकाल में गढ़वाल के संबंध मुगल साम्राज्य, कुमाऊँ और सिरमौर से जुड़े रहे। इस काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना मुगल उत्तराधिकार संघर्ष के दौरान दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह को गढ़वाल में शरण देना थी। पृथ्वीपति शाह से संबंधित जानकारी अभिलेखों, गढ़राजवंश काव्य, जहाँगीरनामा, शाहजहाँनामा, मआसिर-उल-उमरा, बादशाहनामा तथा यूरोपीय यात्रियों के विवरणों से प्राप्त होती है। उसके समय गढ़वाली चित्रकला के प्रारंभ का भी उल्लेख मिलता है।

प्रमुख बिंदु

  • राजा महिपति की मृत्यु के बाद उसका पुत्र पृथ्वीपति शाह उत्तराधिकारी बना। चूँकि वह उस समय अवयस्क था, इसलिए राज्य का शासन उसकी संरक्षिका रानी कर्णावती ने संभाला।
  • रानी कर्णावती ने लगभग 1635 से 1640 ई. तक पंवार राज्य की बागडोर संभाली। उसे एक चतुर, साहसी और दूरदर्शी महिला के रूप में वर्णित किया जाता है।
  • पृथ्वीपति शाह का राज्याभिषेक 1640 ई. में हुआ और उसने पंवार वंश की गद्दी संभाली।
  • पृथ्वीपति शाह को परमार/पंवार वंश का 47वाँ शासक माना जाता है और उसका शासनकाल 1640–1664 ई. माना जाता है।
  • उसके शासनकाल के संबंध में जानकारी उसके समय के अभिलेखों, समकालीन मुस्लिम इतिहासकारों तथा पंवार दरबार के कवियों की रचनाओं से प्राप्त होती है। प्रमुख स्रोतों में गढ़राजवंश काव्य, जहाँगीरनामा, शाहजहाँनामा और मआसिर-उल-उमरा शामिल हैं।
  • पृथ्वीपति शाह के समय मुगल बादशाह शाहजहाँ था। गढ़वाल के विरुद्ध शाहजहाँ के अभियानों की जानकारी अब्दुल हमीद लाहौरी के बादशाहनामा, शम्सुद्दीन की मआसिर-उल-उमरा तथा निकोलस मनूची के विवरण से मिलती है।
  • सर रिचर्ड बर्न ने गढ़ नरेश के विरुद्ध शाहजहाँ के तीन अभियानों का उल्लेख किया है। इनमें पहला अभियान पृथ्वीपति शाह के राज्यारोहण से पहले, रानी कर्णावती के संरक्षक शासन के समय हुआ था।
  • 1635 ई. में शाहजहाँ ने नवाजत खान के नेतृत्व में गढ़वाल पर पहला मुगल अभियान भेजा। इस अभियान में सिरमौर के राजा मांधाता प्रकाश की सेना ने भी मुगलों की सहायता की।
  • रानी कर्णावती की सूझबूझ और रणनीति के कारण मुगल अभियान असफल रहा और मुगल सेना को अपमानजनक पराजय का सामना करना पड़ा।
  • परंपरागत विवरण के अनुसार, बेग मुगल के सुझाव पर रानी कर्णावती ने पकड़े गए मुगल सैनिकों के नाक-कान कटवाकर उन्हें छोड़ दिया। इसी घटना के कारण उन्हें ‘नाक-काटने वाली रानी’ या ‘नाक कटी रानी’ के नाम से प्रसिद्धि मिली।
  • पृथ्वीपति शाह के शासनकाल में शाहजहाँ ने पुनः गढ़वाल के विरुद्ध अभियान किया। इसका एक कारण मुगल दूत खलीलुल्ला खाँ को पंवार दरबार में अपेक्षित सम्मान न मिलना बताया जाता है। इसके बाद मुगल सेना को गढ़वाल के विरुद्ध भेजा गया।
  • शाहजहाँ ने इस अभियान में खलीलुल्ला खाँ को सेना का नेतृत्व सौंपा तथा चंद और सिरमौर के शासकों को भी मुगल अभियान में सहायता करने का आदेश दिया।
  • मुगल सेना ने दून क्षेत्र पर आक्रमण कर लूटपाट की। इसी बीच वर्षा ऋतु आरंभ हो गई, जिसके कारण मुगल सेना आगे बढ़ने में असफल रही। विजित क्षेत्र का प्रभार चतुर्भुज चौहान को सौंपकर मुगल सेनापति दिल्ली लौट गया।
  • मुगल सेना की वापसी के बाद पृथ्वीपति शाह ने दून क्षेत्र के खोए हुए इलाकों को पुनः प्राप्त करने के प्रयास किए। उसने कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया तथा शेष क्षेत्रों को मुक्त कराने के लिए छापामार युद्ध जारी रखा।
  • जब शाहजहाँ को पंवार राजा की गतिविधियों का पता चला, तो उसने कासिम खाँ के नेतृत्व में अतिरिक्त सेना भेजी। मुगल सेना ने पंवार सेना को पराजित किया।
  • इस समय पंवार राज्य को दूसरी ओर चंद राज्य से भी खतरा था। लंबे समय से चले आ रहे पंवार-चंद संघर्ष और मुगल शक्ति की स्थिति को देखते हुए पृथ्वीपति शाह ने राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।
  • मुगल अभियान के समय चंद राजा बाजबहादुर चंद ने भी मुगलों की सहायता की थी। उसने पंवार राज्य के लोहाबागढ़ और बधानगढ़ में लूटपाट की तथा जुनियागढ़ पर अधिकार कर लिया।
  • पृथ्वीपति शाह चंद राजा से इसका बदला लेना चाहता था। जब बाजबहादुर चंद तिब्बत के एक सैनिक अभियान में गया, तब पंवार सेना ने अवसर का लाभ उठाकर चंद सेना द्वारा कब्जाए गए अपने क्षेत्रों को पुनः अधिकृत कर लिया।
  • पृथ्वीपति शाह के शासनकाल की सबसे प्रसिद्ध घटना मुगल शहजादा सुलेमान शिकोह को शरण देने से संबंधित है। सुलेमान शिकोह दारा शिकोह का पुत्र था और मुगल उत्तराधिकार युद्ध में पराजित होने के बाद पर्वतीय क्षेत्रों में शरण लेने पहुँचा।
  • सुलेमान शिकोह पहले चंद राज्य पहुँचा। चंद राजा बाजबहादुर के लिए उसे शरण देना अत्यंत कठिन राजनीतिक स्थिति थी। उसने सुलेमान को काफी धन देकर उसे पंवार राज्य की ओर भेज दिया।
  • पृथ्वीपति शाह सुलेमान शिकोह को शरण देने के पक्ष में था, लेकिन उसका पुत्र मेदिनीशाह औरंगजेब की शक्ति और धमकियों से भयभीत था तथा वह शहजादे को शरण देने के पक्ष में नहीं था।
  • सुलेमान शिकोह ने अपने लगभग 17 साथियों के साथ गढ़वाल में शरण ली। पृथ्वीपति शाह ने शरणागत की रक्षा का निर्णय लिया और उसे औरंगजेब के हवाले करने से इनकार कर दिया।
  • सुलेमान शिकोह को पकड़ने के लिए औरंगजेब ने पहले जयसिंह को गढ़वाल की ओर भेजा और बाद में उसके पुत्र रामसिंह को भी इस अभियान में लगाया गया।
  • पृथ्वीपति शाह द्वारा सुलेमान शिकोह को शरण देने के कारण उसे ‘अभागा शाहजादा’ कहा गया। यह प्रसंग पृथ्वीपति शाह की राजनीतिक दृढ़ता और शरणागत की रक्षा की नीति के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
  • यूरोपीय यात्री बर्नियर के विवरण के अनुसार पृथ्वीपति शाह का कथित उत्तर था कि शहजादे को सौंपने के अनुचित कार्य की अपेक्षा वह अपना राज्य खोना अधिक उचित समझेगा।

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