ललितशूरदेव|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
इष्टगणदेव के पश्चात उसका पुत्र ललितशूरदेव कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा। उसे कत्यूरी वंश के सर्वाधिक प्रतापी एवं शक्तिशाली शासकों में गिना जाता है। उसके शासनकाल से सर्वाधिक संख्या में ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं, जिनसे तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक स्थिति की जानकारी मिलती है। ललितशूरदेव एक दानी, धर्मपरायण एवं कुशल शासक था। उसने शैव धर्म का पालन करते हुए वैष्णव धर्म के प्रति भी सम्मान प्रदर्शित किया। उसके समय पालों के साथ संघर्ष और राजनीतिक संबंधों का भी उल्लेख मिलता है।
ललितशूरदेव प्रमुख तथ्य
- इष्टगणदेव के पश्चात ललितशूरदेव कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा।
- ललितशूरदेव ने अपने पिता की भाँति ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की। इसके अतिरिक्त उसे ‘परममाहेश्वर’ तथा ‘परम ब्राह्मण’ जैसी उपाधियों से भी विभूषित किया गया है।
- वह एक शक्तिशाली एवं दानी शासक था। उसने अनेक मंदिरों को भूमि दान में दी। उसके शासनकाल के 21वें और 22वें वर्ष के दो ताम्रपत्र पाण्डुकेश्वर से प्राप्त हुए हैं।
- ललितशूरदेव की दो रानियाँ थीं—लया देवी तथा सामा देवी।
- लया देवी से उत्पन्न पुत्र भूदेव था, जो ललितशूरदेव के पश्चात कत्यूरी राजगद्दी पर बैठा।
- कत्यूरी शासकों में सर्वाधिक ताम्रपत्र ललितशूरदेव के शासनकाल से प्राप्त हुए हैं। ये उसके शासन तथा तत्कालीन प्रशासनिक एवं धार्मिक गतिविधियों के अध्ययन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
- ललितशूरदेव को कत्यूरी वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा माना जाता है। उसके शासन में राज्य की राजनीतिक शक्ति एवं प्रतिष्ठा मजबूत हुई।
- पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र में ललितशूरदेव की तुलना कालिकलंक-पंक में मग्न धरती के उद्धार के लिए वराहावतार से की गई है। यह उसके गौरव एवं शासकीय उपलब्धियों की प्रशस्तिपरक अभिव्यक्ति है
- उसके समय पाल शासक देवपाल ने उत्तराखंड पर आक्रमण किया, किंतु ललितशूरदेव की शक्ति के कारण देवपाल को अंततः उसके साथ संधि करनी पड़ी।
- ललितशूरदेव ने पाल-प्रतिहारों के प्रभाव से मुक्त होकर अपने शासन के शेष काल को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से व्यतीत किया।
- ललितशूरदेव स्वयं शैव मत का अनुयायी था, किंतु वह वैष्णव धर्म का भी सम्मान करता था। उसकी रानी सामादेवी ने भगवान नारायण के मंदिर की स्थापना की, जबकि स्वयं ललितशूरदेव ने वैष्णव मंदिर को भूमि दान दिया।
- ललितशूरदेव के पुत्र सुजानदेव ने लगभग विक्रम संवत् 400 के आसपास गंगोलीहाट नगर बसाया था।
निष्कर्ष
ललितशूरदेव का शासन कत्यूरी इतिहास में राजनीतिक शक्ति, धार्मिक सहिष्णुता, दानशीलता तथा सांस्कृतिक विकास के लिए विशेष महत्व रखता है। उसे कत्यूरी वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक माना जाता है। उसके समय पाल शासक देवपाल के आक्रमण का सामना किया गया और संधि के माध्यम से राज्य की राजनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखने का प्रयास किया गया। पाण्डुकेश्वर से प्राप्त ताम्रपत्र उसके शासन की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। शैव मतावलंबी होने के बावजूद उसने वैष्णव धर्म को भी संरक्षण दिया। अतः ललितशूरदेव कत्यूरी सत्ता के उत्कर्ष और सुदृढ़ीकरण का प्रमुख शासक था।