राजा उद्योत चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा उद्योत चंद, चंद वंश के शक्तिशाली एवं दीर्घकालीन शासक बाज बहादुर चंद के पुत्र थे। उनके शासनकाल की सबसे प्रमुख विशेषता डोटी और गढ़वाल के साथ निरंतर सैन्य संघर्ष तथा बाद के वर्षों में धार्मिक एवं विद्वत्परक जीवन की ओर झुकाव रही। सत्ता संभालते ही उन्होंने पंवार राज्य के विरुद्ध अभियान चलाए और बधाणगढ़ तथा चांदपुरगढ़ी पर विजय प्राप्त की। डोटी के रैका राजा देवपाल के साथ भी उनका लंबे समय तक संघर्ष चला, जिसका महत्वपूर्ण परिणाम 1688 ई. की खैरागढ़ संधि थी। जीवन के अंतिम चरण में युद्धों से विरक्त होकर उन्होंने धर्म-कर्म, विद्वानों के संरक्षण, मंदिर निर्माण, दान तथा उद्यानों के विकास पर ध्यान दिया। इसी कारण इतिहासकार रुद्रदत्त पंत ने उन्हें ‘तपस्वी शासक’ कहा है।

प्रमुख तथ्य

  • उद्योत चंद, बाज बहादुर चंद के पुत्र थे। बाज बहादुर की मृत्यु के समय उद्योत चंद गंगोली में थे।
  • सत्ता संभालते ही उद्योत चंद ने 1678 ई. में पंवार राज्य के बधाणगढ़ पर आक्रमण किया और उस पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में विजय तो मिली, लेकिन उनके वीर सेनापति मैसी शाह की मृत्यु हो गई।
  • 1679 ई. में उद्योत चंद ने पुनः पंवार राज्य पर आक्रमण किया और चांदपुरगढ़ी पर अधिकार करके उसे लूट लिया।
  • 1680 ई. में पंवार शासक फतेहपति शाह और डोटी के रैका राजा देवपाल ने आपस में संधि कर चंद राज्य के विरुद्ध एक-दूसरे की सहायता करने का वचन दिया।
  • संधि के बाद डोटी के राजा देवपाल ने चंपावत पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया, जबकि दूसरी ओर पंवार राजा ने दूनागिरि और द्वाराहाट पर अधिकार कर लिया। किंतु वे इन क्षेत्रों पर लंबे समय तक अधिकार नहीं रख सके और उद्योत चंद ने शीघ्र ही अपने क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया।
  • इन घटनाओं के बाद उद्योत चंद ने राज्य की सुरक्षा मजबूत करने के उद्देश्य से कई स्थानों पर स्थायी सैनिक छावनियाँ स्थापित कीं।
  • अपनी विजयों को देवताओं की कृपा मानते हुए उद्योत चंद 1682 ई. में प्रयागराज में गंगा स्नान के लिए गए और रघुनाथपुर घाट पर स्नान किया।
  • उद्योत चंद की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर डोटी के रैका राजा देवपाल ने काली कुमाऊँ पर आक्रमण कर दिया। सूचना मिलते ही उद्योत चंद वापस लौटे और डोटी की सेना को पराजित किया।
  • पराजित होकर देवपाल ने अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी अजमेरगढ़ के किले में शरण ली। चंद सेना ने अजमेरगढ़ पर भी अधिकार कर लिया और उसे लूटकर ध्वस्त कर दिया।
  • इस अभियान में उद्योत चंद के सेनापति हिरू देउबा मारे गए। उनकी वीरता के सम्मान में उनके वंशजों को आठ गाँव ‘रौत’ के रूप में प्रदान किए गए। ‘रौत’ बहादुरी के पुरस्कारस्वरूप दी जाने वाली भूमि से संबंधित था।
  • डोटी का राजा चंदों से इसलिए भी शत्रुता रखता था क्योंकि चंदों ने सीरा और सोर से डोटी का आधिपत्य समाप्त कर वहाँ अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।
  • अजमेरगढ़ अभियान के बाद डोटी द्वारा पुनः सीमा पर उपद्रव किए जाने के कारण उद्योत चंद ने डोटी पर फिर आक्रमण किया।
  • इस अभियान में कुमाऊँनी सेना ने डोटी के राजा को जुराइल-दिपाइल कोट से भी पीछे हटने के लिए विवश कर दिया। इसके बाद देवपाल ने खैरागढ़/खैरीगढ़ के किले में शरण ली।
  • 1688 ई. में उद्योत चंद ने खैरागढ़/खैरीगढ़ पर अधिकार कर लिया। यहीं उद्योत चंद और देवपाल के बीच खैरागढ़ की संधि हुई।
  • 1688 ई. की खैरागढ़ संधि के बाद डोटी के राजा ने कुमाऊँ के चंद राजा को कर देना स्वीकार किया।
  • इस सफलता से प्रसन्न होकर उद्योत चंद अल्मोड़ा लौटे और एक महल का निर्माण कराया। उन्होंने त्रिपुरा सुंदरी, पार्वतीश्वर तथा उद्योत चंदेश्वर जैसे मंदिर भी बनवाए।
  • 1696 ई. में डोटी के राजा ने पुनः कर देना बंद कर दिया। इसके बाद उद्योत चंद ने तीसरी बार डोटी पर आक्रमण किया।
  • इस बार जुराइल-दिपाइल कोट में भीषण युद्ध हुआ, जिसमें कुमाऊँनी सेना को पराजय का सामना करना पड़ा। शिरोमणि जोशी इस युद्ध में मारे गए और उद्योत चंद को अल्मोड़ा लौटना पड़ा।
  • इस पराजय से उद्योत चंद अत्यंत निराश हुए और उन्होंने युद्ध नीति से विरक्ति ले ली। इसके बाद उन्होंने अपना जीवन शांति, धर्म-कर्म और विद्या की ओर लगा दिया।
  • अपने अंतिम वर्षों में उद्योत चंद ने दरबार में विद्वानों एवं विद्याव्यसनी लोगों को संरक्षण दिया। राजधानी में पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियाँ बढ़ीं तथा उन्होंने अनेक धार्मिक कार्य करवाए।
  • 1698 ई. में उद्योत चंद ने स्वयं अपने पुत्र ज्ञानचंद को राजपाट सौंप दिया और इसके बाद उनका निधन हो गया।
  • उद्योत चंद स्वयं भी विद्वान एवं विद्याप्रेमी थे और विद्वानों का सम्मान करते थे। उनके दरबार में मतिराम आए, जो सतारा के शाहू महाराज के राजकवि और शिवाजी के पौत्र से संबंधित विद्वान बताए जाते हैं। उद्योत चंद ने सम्मानस्वरूप उन्हें एक हाथी और दस हजार रुपये प्रदान किए।
  • उद्योत चंद ने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया। इनमें उद्योत चंद्रेश्वर, पार्वतीश्वर, त्रिपुरा देवी, विष्णु मंदिर, शुकेश्वर महादेव और सोमेश्वर महादेव प्रमुख हैं।
  • उन्होंने मंदिरों के अतिरिक्त अनेक नौलों का निर्माण भी कराया तथा धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण दिया
  • उद्योत चंद ने कोटा भाबर में आम के बगीचे लगवाए और विभिन्न स्थानों पर फलदार वृक्ष लगवाए।

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