राजा ज्ञान चंद द्वितीय |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा ज्ञान चंद द्वितीय चंद वंश के उन शासकों में थे जिनके शासनकाल में कुमाऊँ राज्य की सैन्य शक्ति और राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चलाए गए। वे राजा उद्योत चंद के उत्तराधिकारी थे और उपलब्ध ताम्रपत्र के आधार पर उनका शासनकाल 1698 से 1708 ई. माना जाता है। पूर्ववर्ती चंद शासकों की तरह उन्होंने भी सत्ता संभालते ही गढ़वाल और डोटी के विरुद्ध सैन्य अभियान प्रारंभ किए। उनके समय में चंद-पंवार संघर्ष विशेष रूप से तीव्र हुआ और 1703 तथा 1707 ई. के अभियानों में चंद सेना ने पंवार क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त कीं। धार्मिक दृष्टि से भी वे सक्रिय थे तथा मंदिरों, बावड़ियों और उद्यानों के निर्माण एवं जीर्णोद्धार से जुड़े रहे। उनके काल में चंद राज्य की समृद्धि और राजनीतिक प्रतिष्ठा में वृद्धि का उल्लेख मिलता है।

प्रमुख बिंदु

  • उद्योत चंद की मृत्यु के बाद ज्ञान चंद द्वितीय चंद राज्य की गद्दी पर बैठे।
  • ज्ञान चंद का प्रथम ताम्रपत्र 1698 ई. का प्राप्त हुआ है। इसी आधार पर उनका राज्यारोहण 1698 ई. माना जाता है। उन्होंने लगभग 1698 से 1708 ई. तक शासन किया।
  • पूर्ववर्ती चंद शासकों की परंपरा का अनुसरण करते हुए ज्ञान चंद ने भी गद्दी पर बैठते ही गढ़वाल की ओर सैन्य अभियान प्रारंभ किया। उनके शासनकाल का अधिकांश समय गढ़वाल और डोटी के साथ संघर्षों में बीता।
  • उनका पहला प्रमुख गढ़वाल अभियान पिंडर घाटी की ओर हुआ। चंद सेना ने वहाँ से थराली तक के उपजाऊ क्षेत्र में अभियान चलाया और उसे अपने आक्रमण से प्रभावित किया।
  • 1699 ई. में ज्ञान चंद ने बधानगढ़ पर आक्रमण कर उसे लूटा और विजित किया। यहाँ से वे नंदा देवी की स्वर्ण-प्रतिमा अपने साथ अल्मोड़ा ले गए और उसे वहाँ स्थित नंदा देवी मंदिर में स्थापित कराया।
  • 1700 ई. में ज्ञान चंद ने रामगंगा नदी पार करके मल्ला सलाण के साबली, खाटली और सैंजधार क्षेत्रों में लूटपाट की।
  • चंद सेना के इन आक्रमणों से क्रोधित होकर पंवार राजा फतेहशाह ने 1701 ई. में पाली परगने के गिवाड़ और चौकोट क्षेत्रों पर आक्रमण किया तथा उन्हें लूटा और नष्ट किया।
  • 1703 ई. में चंद सेना ने पुनः पंवार राज्य पर आक्रमण किया। दूधौली के युद्ध में चंद सेना ने पंवार सेना को पराजित किया और इसके बाद पंवार क्षेत्रों में व्यापक लूट की।
  • 1707 ई. में चंद सेना ने एक और बड़ा गढ़वाल अभियान चलाया। पाण्डुवा खाल और दिवाली खाल होते हुए चंद सेना चांदपुर तक पहुँच गई।
  • इस अभियान में चंद सेना ने चांदपुर के गढ़ और जुनियारगढ़ पर अधिकार किया तथा उन्हें नष्ट कर दिया।
  • लगातार सैन्य पराजयों के कारण पंवार राजा फतेहशाह को श्रीनगर छोड़कर भागना पड़ा। चंद सेना ने श्रीनगर में प्रवेश कर उसे लूटा।
  • श्रीनगर की लूट से प्राप्त संपत्ति का कुछ भाग ज्ञान चंद ने एक ब्राह्मण को दान कर दिया तथा लूट का कुछ हिस्सा मुगल बादशाह को दिल्ली भेजे जाने का उल्लेख मिलता है।
  • 1704 ई. में ज्ञान चंद ने डोटी पर आक्रमण किया। इसका उद्देश्य डोटी के हाथों अपने पिता उद्योत चंद की पूर्व पराजय का बदला लेना भी माना जाता है।
  • डोटी अभियान में युद्ध कुमाऊँ की सीमा के मलेरियाग्रस्त भाबर क्षेत्र में हुआ। डोटी का राजा पराजित होकर भाग गया, किंतु कुमाऊँनी सेना भी मलेरिया से बुरी तरह प्रभावित हुई।
  • ज्ञान चंद धार्मिक प्रवृत्ति के शासक थे। अपने पिता की तरह उन्होंने मंदिरों और बावड़ियों का निर्माण कराया तथा धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण दिया।
  • ज्ञान चंद और उनके पिता उद्योत चंद के डोटी अभियानों के दौरान सोर और सीरा क्षेत्रों में भी अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया। इन मंदिरों को स्थानीय रूप से ‘देवल’ अथवा ‘द्यौल’ कहा जाता था।
  • देवस्थल (पिथौरागढ़) के चौपाता, नकुलेश्वर, कासनी और मर्सोली आदि स्थानों के मंदिरों को चंदकालीन स्थापत्य से जोड़ा जाता है।
  • ज्ञान चंद ने कत्यूर घाटी में बद्रीनाथ का एक मंदिर स्थापित कराया।
  • उन्होंने बैजनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया।
  • ज्ञान चंद ने तराई-भाबर क्षेत्र में आम के बाग लगवाए। इससे उनके शासन के कृषि एवं उद्यान विकास संबंधी कार्यों का भी संकेत मिलता है।
  • उन्होंने दिल्ली के मुगल दरबार से राजनीतिक संबंध बनाए रखे और पूर्ववर्ती चंद शासकों की तरह मुगल सत्ता के साथ संबंधों को बनाए रखा।
  • ज्ञान चंद के शासनकाल में चंद राज्य के खजाने में वृद्धि हुई। सैन्य अभियानों और प्राप्त संसाधनों के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।
  • इस प्रकार ज्ञान चंद के काल में चंद राज्य की समृद्धि और राजनीतिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई तथा कुमाऊँ का बाहरी क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ा।
  • ज्ञान चंद के समय चंद-पंवार संघर्ष निरंतर जारी रहा। इसी संघर्ष की दीर्घ परंपरा में आगे चलकर 12 वर्षीय युद्ध का उल्लेख मिलता है।

निष्कर्ष

राजा ज्ञान चंद द्वितीय का शासन चंद वंश की सैन्य एवं राजनीतिक गतिविधियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। 1698 से 1708 ई. के अपने शासनकाल में उन्होंने गढ़वाल और डोटी के विरुद्ध लगातार अभियान चलाए तथा विशेष रूप से पंवार राज्य पर कई आक्रमण किए। 1699 में बधानगढ़, 1703 में दूधौली और 1707 में चांदपुर तथा जुनियारगढ़ के अभियान उनके सैन्य इतिहास की प्रमुख घटनाएँ हैं। डोटी के विरुद्ध 1704 ई. का अभियान भी उल्लेखनीय रहा। धार्मिक क्षेत्र में उन्होंने मंदिर, बावड़ियाँ और आम के बाग बनवाए तथा बैजनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। उन्होंने दिल्ली के मुगल दरबार से संबंध बनाए रखे और चंद राज्य के खजाने तथा प्रतिष्ठा को बढ़ाया। इस प्रकार ज्ञान चंद द्वितीय के शासन में सैन्य विस्तार, आर्थिक समृद्धि, राजनीतिक प्रतिष्ठा और धार्मिक संरक्षण—चारों पक्ष स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

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