महान कुणिन्द राजा अमोघभूति व अन्य कुणिन्द राजवंश के शासक|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कुणिन्द राजवंश के शासकों के संबंध में जानकारी साहित्यिक स्रोतों, अभिलेखों तथा विशेष रूप से प्राप्त मुद्राओं से मिलती है। कुणिन्द शासकों की सूची पूर्णतः स्पष्ट एवं क्रमबद्ध नहीं है, फिर भी उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उनके विभिन्न कालों के शासकों की पहचान की गई है। प्रथम काल में महाभारत में सुबाहु का उल्लेख मिलता है, जबकि द्वितीय काल के शासकों के संबंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। तृतीय एवं अंतिम काल में अनेक शासकों के नाम मुद्राओं एवं अन्य पुरातात्विक प्रमाणों से ज्ञात होते हैं। इनमें अमोघभूति को कुणिन्दों का सर्वाधिक प्रतापी एवं शक्तिशाली शासक माना जाता है। उसके समय में कुणिन्द राज्य राजनीतिक शक्ति, क्षेत्रीय विस्तार एवं आर्थिक समृद्धि के दृष्टिकोण से अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।
प्रमुख राजा
- प्रथम काल – इस काल में जैसा कि महाभारत से ज्ञात होता है सुबाहु ही एक मात्र ऐसा शासक है जिसका उल्लेख मिलता है। सुबाहु के अतिरिक्त किसी अन्य शासक का कहीं कोई अन्य नाम नहीं मिलता।
- द्वितीय काल — जानकारी उपलब्ध नहीं
- तृतीय एवं अन्तिम काल —
- विषदेव
- अग्रराज
- धनभूति
- धनभूति द्वितीय
- बलभूति
- अमोघभूति
- मघभूत
- शिवदत्त
- हरिदत
- शिवपालित
- छत्रेश्वर
- भानु
- रावण
राजा अमोघभूति
- कुणिन्दों का सबसे प्रतापी राजा था।
- दूसरी-तीसरी सदी ई० पू० से दूसरी-तीसरी ई० के मध्य कुणिन्द जनपद के शासकों की जो मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं उनमें से सर्वाधिक मुद्राएँ अमोघभूति की हैं।
- ये मुद्राएँ रजत एवं ताम्र दोनों धातुओं द्वारा निर्मित हैं जबकि अन्य शासकों की मुद्राएँ ताम्र धातु की हैं।इससे ज्ञात होता है अमोघभूमि परवर्ती कुणिन्द शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली शासक होगा
- अमोघभूति की मुद्रायें खरोष्ठी एवं ब्राह्मी दोनों लिपियों में पायी गयी हैं। ।
- अमोघभूमि ही एक मात्र ऐसा कुणिन्द शासक था जिसकी मुद्राओं में उसकी उपाधि ‘महाराज’ उल्लिखित है।
- अमोघभूति की ताम्र एवं रजत मुद्राओं में “रज कुणिन्दस अमोघभूतिस महाराजस” उल्लिखित किया गया है।
- अमोघभूति की मुद्राओं से ज्ञात होता है उसके शासन काल में कुणिन्द जनपद अपने चरमोत्कर्ष पर था।उसने न केवल कुणिन्द राज्य को विस्तारित किया वरन् यमुना तथा व्यास की मध्यवर्ती पर्वतीय घाटियों को यवन दासता से भी मुक्त किया। वह दीर्घ काल तक जीवित रहा। उसने अपने समकालीन गणराज्यों को स्वतंत्रता प्राप्त करने में सहायता दी। उसके समकालीन गणराज्य औदुम्बर तथा यौधेय थे।
- ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उसके काल में ही कुणिन्द, औदुम्बर तथा यौधेय गणराज्यों के मध्य एक त्रिकोणीय संघ का गठन हुआ।
- कुणिन्द राजवंश के पतन के पश्चात् कुणिन्द शासन का पतन प्रारम्भ हो गया था तथा उसके अनेक भागों को शक-कुषाणों ने अधिकार कर अपने राज्य में मिला लिया।
- अमोघभूति के उत्तराधिकारी कुणिन्द जनपद की शक्ति एवं समृद्धि को अक्षुण्ण रखने में असमर्थ रहे। जिस कारण राज्य विस्तार में कमी होती गयी। प्रथम सदी के आसपास कुणिन्द जनपद कुषाणों का अधीनस्थ राज्य हो गया तथा तीसरी सदी ई० के उत्तरार्द्ध तक कुणिन्द जनपद का विलय यौधेय जनपद में हो गया
निष्कर्ष
इस प्रकार, कुणिन्द राजवंश के शासकों की परंपरा से उनके राजनीतिक विकास, शक्ति एवं क्रमिक पतन की जानकारी मिलती है। प्रारम्भिक काल के सुबाहु से लेकर अंतिम काल के विभिन्न शासकों तक कुणिन्द सत्ता में निरंतर परिवर्तन दिखाई देता है। इनमें अमोघभूति का शासन कुणिन्द इतिहास का स्वर्णिम चरण माना जा सकता है, जिसके समय राज्य की शक्ति, क्षेत्रीय प्रभाव और आर्थिक समृद्धि अपने उत्कर्ष पर पहुँची। किंतु उसके बाद के शासक इस शक्ति को बनाए रखने में सफल नहीं रहे। परिणामतः कुणिन्दों का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर हुआ और अंततः उनका राजनीतिक अस्तित्व शक-कुषाणों तथा बाद में यौधेयों के प्रभाव में विलीन हो गया।