भारती चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

भारती चंद चंद वंश के अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली शासकों में माने जाते हैं। कुमाऊँ के इतिहास में उनकी पहचान एक साहसी, लोकप्रिय, स्वाभिमानी और कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में होती है। उनके समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना डोटी के मल्ल शासकों के विरुद्ध संघर्ष और विजय थी। लगभग 12 वर्षों तक चले इस संघर्ष के परिणामस्वरूप चंद राज्य डोटी के आधिपत्य से मुक्त हुआ। उनके शासनकाल से संबंधित हुड़ेती, कोटमारा-सुई-बिसुंग तथा अन्य ताम्रपत्र भी उनके प्रशासन, भूमिदान और सैन्य गतिविधियों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

प्रमुख तथ्य

  • भारती चंद के पवाड़े कुमाऊँ के इतिहास में प्रसिद्ध हैं। इनमें उनके वीरतापूर्ण कार्यों और युद्धों का वर्णन मिलता है।
  • भारती चंद के पवाड़ों में कुमाऊँ की वीरांगना भागाधौन्यान के साथ उनके द्वंद्व-युद्ध का वर्णन मिलता है।
  • भारती चंद एक लोकप्रिय, साहसी, बहादुर एवं कुशल राजनीतिज्ञ गुणों से युक्त शासक थे।
  • भारती चंद ने डोटी की अधीनता से मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से डोटी राज्य पर आक्रमण किया।
  • भारती चंद जैसे स्वाभिमानी शासक के लिए नेपाल की अधीनता स्वीकार करना अस्वीकार्य था।
  • मड़ुवा गुड़ौल में प्राप्त ‘भारती चंद का कटकु’ परंपरा से ज्ञात होता है कि उन्होंने समाज की विभिन्न जातियों के लोगों को सम्मिलित करके एक विशाल ‘कटक’ अर्थात सेना का निर्माण किया था।
  • भारती चंद की सेना में समस्त जातियों के लोग सम्मिलित थे। अतः समस्त जातियों की सेना का निर्माण करने वाला शासक भारती चंद माना जाता है।
  • भारती चंद ने अपनी सेना के साथ सोर की ओर प्रस्थान किया तथा पिथौरागढ़ के मुख्यालय में पड़ाव बनाया।
  • देवसिंह मैदान के पास स्थित ‘कटकु नौला’ को इस सैन्य पड़ाव से संबंधित माना जाता है।
  • उन्होंने दूसरा सैन्य पड़ाव काली नदी के आसपास बड़ालू से गौड़ीहाट तक के क्षेत्र में बनाया। शिविर वाले स्थान को ‘बाली-चौड़’ कहा गया, जो काली नदी के किनारे स्थित था।
  • डोटी के मल्ल शासक के विरुद्ध लगभग 12 वर्षों तक संघर्ष चला। अंततः मल्ल राजा पराजित हुआ और चंद राज्य डोटी के आधिपत्य से मुक्त हो गया।
  • डोटी पर विजय के बाद भारती चंद को चंद वंश का पहला स्वतंत्र शासक माना जाता है।
  • इस युद्ध में कटेहर के राजा ने भारती चंद की सहायता की थी।
  • डोटी विजय में भारती चंद के पुत्र रत्न चंद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • बद्रीदत्त पांडे ने रत्न चंद की सहायता को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए उनकी नई सेना की तुलना उस नई सेना से की है, जिसने अमेरिका से आकर फ्रांस में मित्र राष्ट्रों की विजय में महत्वपूर्ण योगदान दिया था
  • डोटी विजय के बाद भारती चंद ने अपने पुत्र रत्न चंद की सहायता से सोर, सीरा, थल आदि क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया।
  • सीरा में भारती चंद ने डुंगरा बसेड़ा को अपना सामंत नियुक्त किया।
  • डुंगरा बसेड़ा के बाद मदन सिंह और रायसिंह बसेड़ा सीरा के सामंत बने।
  • बसेड़ा शासक सीरा में अधिक समय तक शासन नहीं कर सके और बाद में मल्लों ने सीरा पर पुनः अधिकार कर लिया।
  • सीरा में बसेड़ा शासकों का शासन 1452 ई. से 1539 ई. तक माना जाता है। 1539 ई. में राई मल्ल सीरा का राजा था।
  • राई मल्ल के बाद शोभा मल्ल और हरिमल्ल सीरा के शासक बने।
  • शोभा मल्ल ने चंदों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए और अपनी पुत्री का विवाह बालो कल्याण चंद के साथ किया।
  • बालो कल्याण चंद के पुत्र रुद्रचंद ने हरिमल्ल को पराजित कर सीरा को चंद राज्य में मिला लिया।
  • सीरा विजय के उपलक्ष्य में रुद्रचंद ने थल में एक शिव मंदिर स्थापित करवाया।
  • भारती चंद के बाद उनके युवराज पुत्र रत्न चंद गद्दी पर बैठे। वे अपने पिता के साथ अनेक युद्धों में भाग लेकर पहले ही प्रसिद्धि अर्जित कर चुके थे।
  • संभवतः सुजान कुँवर भी भारती चंद के पुत्र थे, जिनका उल्लेख खेतिखान ताम्रपत्र में मिलता है।
  • लोहाघाट और हुड़ेती ताम्रपत्रों में कुँवर रत्न चंद का नाम मिलता है।
  • सोर, सीरा, थल, जुमला और बजांग आदि की विजय में रत्न चंद ने अपने पिता भारती चंद की सहायता की थी।
  • नायक जाति की उत्पत्ति के संबंध में एक लोक-परंपरा के अनुसार डोटी के साथ 12 वर्षीय युद्ध के दौरान भारती चंद के सैनिकों के आसपास के गाँवों की स्त्रियों से संबंध स्थापित हुए।
  • इन स्त्रियों को ‘कटकाली’ कहा गया तथा उनसे उत्पन्न संतानों को ‘नायक’ कहा गया। यह नायक जाति की उत्पत्ति से संबंधित लोक-मान्यता है।
  • 1451 ई. के हुड़ेती ताम्रपत्र में भारती चंद द्वारा एक गाँव दान दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इसमें उनके पुत्र रत्न चंद का भी उल्लेख है।
  • हुड़ेती ताम्रपत्र सोर पर भारती चंद के शासन की पुष्टि करने वाला महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है।
  • भारती चंद के समय का एक ताम्रपत्र श्री रामकंठ कुलेठा के नाम से संबंधित है, जिसमें उन्हें कुछ भूमि प्रदान किए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • कोटमारा-सुई-बिसुंग, चंपावत ताम्रपत्र में भारती चंद द्वारा जोग महरा को मरणोपरांत ‘रौत’ भूमि प्रदान करने का उल्लेख है।
  • इस ताम्रपत्र में भारती चंद के पुत्र रत्न चंद का भी उल्लेख मिलता है।

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