राजा सुदर्शन शाह भाग -1 |Tihari Risayat of Garhwal|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा सुदर्शन शाह गढ़वाल के पंवार/परमार राजवंश के 55वें राजा तथा टिहरी गढ़वाल रियासत के प्रथम राजा थे। उनका जीवन गढ़वाल के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके शासनकाल में 1815 ई. में गढ़वाल का पहली बार विभाजन हुआ और टिहरी रियासत का गठन हुआ। सुदर्शन शाह ने लगभग 11 वर्षों तक अपने पैतृक राज्य की पुनर्प्राप्ति के लिए संघर्ष किया। अंग्रेज-गोरखा युद्ध के बाद उन्हें गढ़वाल का एक भाग प्राप्त हुआ और उन्होंने टिहरी को अपनी राजधानी बनाया। वे एक शासक होने के साथ-साथ साहित्य, कला एवं धर्म के संरक्षक भी थे। उनके शासनकाल में प्रशासनिक, न्यायिक तथा राजस्व व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
1. सुदर्शन शाह का परिचय एवं राज्य की पुनर्प्राप्ति का संघर्ष
- सुदर्शन शाह पंवार/परमार राजवंश के 55वें राजा तथा टिहरी गढ़वाल रियासत के प्रथम राजा थे।
- उन्हें लगभग 11 वर्षों तक खोए हुए राज्य की पुनर्प्राप्ति के लिए संघर्षरत राजा के रूप में जाना जाता है।
- 1804 से 1814 ई. तक के निर्वासन काल में उन्होंने हरिद्वार के कनखल एवं ज्वालापुर में निवास किया।
- बरेली प्रवास के दौरान सुदर्शन शाह की मुलाकात कैप्टन हियरसी (Hearsey) से हुई थी।
- एटकिंसन के अनुसार, सुदर्शन शाह ने हियरसी को दो परगने देने का वचन दिया था, यदि वह गोरखों के अधिकार में चले गए उनके राज्य की पुनर्प्राप्ति में सहायता कर सके।
- राज्य की पुनर्प्राप्ति के लिए सुदर्शन शाह ने अंग्रेजों से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया और कंपनी सरकार से सहायता लेने के लिए फतेहगढ़ भी गए।
- अंग्रेज-गोरखा युद्ध की घोषणा होने पर उन्हें फतेहगढ़ से देहरादून भेजा गया, ताकि उनकी उपस्थिति से गढ़वाल की जनता ब्रिटिश सेनाओं की सहायता के लिए प्रेरित हो।
- ब्रिटिश कंपनी ने सुदर्शन शाह पर राज्य के संबंध में 7 लाख रुपये न देने का आरोप लगाकर श्रीनगर पर अधिकार कर लिया था। यशवंत कटोच के अनुसार युद्ध-व्यय के रूप में 5 लाख रुपये की मांग की गई थी।
- बरेली प्रवास तथा हियरसी से संबंधित 3005 रुपये में दून एवं चंडी परगनों को देने की कथा का उल्लेख ए. आर. गिल की Valley of Doon में मिलता है, किंतु इसमें पूर्वजों के नामों में अशुद्धियाँ होने के कारण इसे कुछ इतिहासकार विश्वसनीय नहीं मानते।
2. गढ़वाल का विभाजन एवं टिहरी रियासत की स्थापना
- 1815 ई. में गढ़वाल का पहली बार विभाजन हुआ। इसे मुख्यतः ब्रिटिश गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल रियासत में विभाजित किया गया।
- 1815 ई. में कंपनी सरकार ने अस्थायी सनद की शर्तों के अनुसार गढ़वाल का विभाजन किया।
- रवाई तथा दून परगनों को छोड़कर, अलकनंदा तथा मंदाकिनी के पश्चिम का अपेक्षाकृत छोटा, दुर्गम एवं वनाच्छादित क्षेत्र सुदर्शन शाह को प्रदान किया गया।
- सुदर्शन शाह ने ब्रिटिश सरकार की ओर से विलियम फ्रेजर से अस्थायी सनद प्राप्त की।
- इसके बाद भिलंगना नदी के तट पर सेमल के तप्पड़ मैदान में सुदर्शन शाह का राजतिलक किया गया।
- सुदर्शन शाह का राजतिलक राजगुरु नौटियाल द्वारा किया गया था।
- सुदर्शन शाह का शासनकाल 1815 ई. से 1859 ई. तक रहा।
- 28 दिसंबर 1815 ई. को सुदर्शन शाह ने टिहरी को अपनी राजधानी बनाया।
- टिहरी की स्थापना को Restoration Day (रेस्टोरेशन डे) के रूप में स्मरण किया जाता है।
- टिहरी को ‘त्रिहरी’ भी कहा जाता है। यह क्षेत्र भागीरथी, भिलंगना तथा घृतगंगा के संगम से संबंधित है।
- प्रारंभ में टिहरी क्षेत्र को धुनारों/मछुवारों की बस्ती बताया जाता है।
- टिहरी नगर की सिंह राशि मानी गई थी। ज्योतिषियों ने नगर के अल्पायु होने की भविष्यवाणी की थी, जिसे बाद की घटनाओं से जोड़ा गया।
- सुदर्शन शाह ने टिहरी में लगभग 700 रुपये की लागत से 30 छोटे-छोटे घर बनवाए तथा प्रत्येक घर पर 3 रुपये वार्षिक किराया निर्धारित किया।
3. कुंवर प्रीतम शाह की टिहरी वापसी
- कुंवर प्रीतम शाह, सुदर्शन शाह के चाचा थे और प्रद्युम्न शाह के शासनकाल में रवाई के फौजदार थे।
- 1804 ई. में गोरखा विजय के बाद उन्हें नेपाल ले जाया गया और वे लंबे समय तक नेपाल में राजबंदी रहे।
- नेपाल प्रवास के दौरान उनका विवाह नेपाल नरेश गीर्वाणयुद्ध विक्रम शाह के चाचा एवं मंत्री बमशाह की पुत्री से हुआ था।
- 1817 ई. में नेपाल दरबार ने कुंवर प्रीतम शाह को टिहरी जाने की अनुमति दे दी।
- टिहरी पहुंचने पर सुदर्शन शाह ने उनके निर्वाह के लिए 5,000 रुपये वार्षिक आय की जागीर प्रदान की और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की।
- सुदर्शन शाह ने कुंवर प्रीतम शाह को पिता तुल्य सम्मान दिया।
- कुंवर प्रीतम शाह की 1836 ई. में निःसंतान मृत्यु हुई।
4. सुदर्शन शाह और ब्रिटिश सरकार की संधि
- 4 मार्च 1820 ई. को सुदर्शन शाह और ब्रिटिश सरकार के बीच महत्वपूर्ण संधि हुई।
- इस संधि में टिहरी गढ़वाल पर सुदर्शन शाह के वंशजों के अधिकार को स्वीकार किया गया।
- इसके बदले गढ़नरेश ने आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेज सरकार को सहायता देने का वचन दिया।
- राज्य में अंग्रेजों को व्यापार करने की अनुमति भी प्रदान की गई।
5. टिहरी रियासत का विस्तार एवं ब्रिटिश प्रतिनिधित्व
- 1824 ई. में रवाई परगना को टिहरी रियासत में शामिल किया गया।
- 1816 ई. में ट्रेल की रिपोर्ट के आधार पर नागपुर परगने में टिहरी गढ़वाल और ब्रिटिश गढ़वाल की सीमा निर्धारित की गई थी।
- दिसंबर 1842 ई. में टिहरी रियासत में ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दायित्व कुमाऊँ कमिश्नर को सौंपा गया।
- इसके बाद देहरादून में नियुक्त ब्रिटिश अधिकारी टिहरी राज्य में भी ब्रिटिश प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने लगा।
6. सुदर्शन शाह का प्रशासन एवं राजस्व व्यवस्था
- सुदर्शन शाह ने ग्राम प्रशासन को व्यवस्थित करने के लिए कमीण एवं सयाणा की नियुक्ति की।
- राजस्व एवं धन एकत्र करने के लिए कामदार नामक अधिकारियों की नियुक्ति की गई।
- कामदारों की नियुक्ति राजा अथवा सयाणों द्वारा की जाती थी।
- सुदर्शन शाह ने भूमिकर की पुरानी व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए आदेश दिया कि 1/8 भाग अन्न के रूप में तथा 7/8 भाग नकद धनराशि के रूप में लिया जाए।
- राजा को राज्य की भूमि का संपूर्ण स्वामी माना जाता था।
- राज्यकर्मियों को दी जाने वाली जागीरें मुख्यतः दो प्रकार की थीं— (i) वंशागत जागीर (ii) जीवनपर्यंत प्राप्त होने वाली जागीर।
- सुदर्शन शाह ने शिवराम सकलानी को खास पट्टी के छह गांव, गोविंद सिंह बिष्ट को नंदगांव, बरसाली आदि कुछ गांव तथा महंत हरस्वरूप को गुरु रामराय मंदिर के लिए छह गांव जागीर में दिए।