राजा सुदर्शन शाह भाग -2 |Tihari Risayat of Garhwal|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
7. न्यायिक व्यवस्था
- सुदर्शन शाह ने ब्रिटिश गढ़वाल की न्यायिक व्यवस्था से प्रेरित होकर दीवानी एवं फौजदारी न्यायालय स्थापित किए।
- उनके समय चार प्रकार की अदालतों का उल्लेख मिलता है— दीवानी, फौजदारी, कलक्टरी तथा सरसरी।
- उन्होंने छोटी दीवानी एवं बड़ी दीवानी अदालतों की व्यवस्था भी की।
- इस प्रकार सुदर्शन शाह के शासनकाल में टिहरी रियासत की दीवानी एवं फौजदारी न्याय व्यवस्था को संस्थागत रूप मिला।
8. जागीरदारों एवं जन-उत्पीड़न पर नियंत्रण
- सुदर्शन शाह के शासनकाल में सकलाना और रवाई के कुछ जागीरदारों/मुआफीदारों द्वारा प्रजा के उत्पीड़न की शिकायतें सामने आईं।
- 4 जुलाई 1835 ई. के कंपनी सरकार के निर्णय में राजा को राज्य में सर्वोपरि मानते हुए स्पष्ट किया गया कि राजा से जागीर प्राप्त करने वाले मुआफीदार यदि राजा की अवज्ञा करें तो राजा को उनकी सेवाएं समाप्त करने तथा प्रदान की गई जागीर वापस लेने का अधिकार है।
- इस निर्णय से राजा को जागीरदारों के मनमाने व्यवहार और जन-उत्पीड़न पर नियंत्रण स्थापित करने में सहायता मिली।
9. सकलाना विद्रोह, 1835
- गोरखा युद्ध की समाप्ति के बाद कंपनी सरकार ने शिवराम और काशीराम नामक मुआफीदारों को पुनर्स्थापित किया।
- सकलाना के इन जागीरदारों और उनके कर्मचारियों द्वारा प्रजा पर अत्यधिक दबाव एवं वसूली की शिकायतें सामने आईं।
- 1835 ई. में सकलाना के कमीण, सयाणा एवं प्रजा ने उनके कर्मचारियों के विरुद्ध आंदोलन किया।
- सुदर्शन शाह के हस्तक्षेप से प्रजा से राजा के आदेशानुसार उचित भूमि-कर लिया जाने लगा।
- इसे टिहरी राज्य के प्रारंभिक जन-आंदोलनों में से एक माना जाता है।
10. अठूर विद्रोह, 1851
- 1851 ई. में सकलाना के मुआफीदारों द्वारा अठूर क्षेत्र की जनता से ‘तिहाड़’ कर वसूलने का प्रयास किया गया।
- इसके विरोध में अठूर के लोगों ने विद्रोह किया।
- इस आंदोलन का नेतृत्व सुनारगांव के बद्री सिंह असवाल ने किया।
- मुआफीदार अपने सशस्त्र कर्मचारियों के साथ वसूली के लिए पहुंचे, जिससे स्थिति संघर्षपूर्ण हो गई।
- राजा सुदर्शन शाह के हस्तक्षेप से बड़े रक्तपात को टाला गया।
- बद्री सिंह असवाल के प्रयासों से अठूर के किसानों की मांगों को स्वीकार किया गया।
11. रवाई जन-उत्पीड़न
- रवाई क्षेत्र में फौजदार गोविंद सिंह बिष्ट और उसके सहायक शिवदत्त पर प्रजा के शोषण के आरोप लगाए गए।
- वे स्वयं को स्वतंत्र जागीरदार की तरह व्यवहार करने लगे थे।
- सुदर्शन शाह ने उनके विरुद्ध कठोर कदम उठाने का प्रयास किया।
- इसके विरोध में संबंधित अधिकारियों द्वारा राज्य में अव्यवस्था उत्पन्न करने का प्रयास किया गया।
- रवाई एवं सकलाना के मामलों में राजा द्वारा जागीरदारों की शक्ति को नियंत्रित करने का प्रयास केंद्रीय राजसत्ता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण था।
12. कला एवं साहित्य के संरक्षक
- सुदर्शन शाह कला एवं साहित्य के प्रमुख संरक्षक थे
- उन्होंने मौलाराम, चैतू तथा माणकू जैसे चित्रकारों को आश्रय प्रदान किया।
- उन्होंने स्वयं ‘सभासार’ नामक ग्रंथ की रचना ब्रजभाषा में की।
- सभासार सात खंडों में विभक्त था तथा इसके अनेक पदों के शीर्षक गढ़वाली भाषा में हैं।
- इस काव्य में सुदर्शन शाह ने स्वयं को ‘सूरत कवि’ के नाम से संबोधित किया।
- ऐतिहासिक दृष्टि से सभासार का विशेष महत्व इसमें दी गई प्रामाणिक पंवार/परमार राजवंशावली के कारण है।
- कवि कुमुदानन्द ने सुदर्शन शाह की प्रशंसा में ‘सुदर्शनोदय काव्यम्’ की रचना की।
- उनके राजकवि हरिदत्त शर्मा ने धर्मवल्ली तथा सभाभूषण नाटक आदि संस्कृत ग्रंथों की रचना की।
- सुदर्शन शाह के दरबार में कुमाऊँ से गुमानी पंत एवं मनोरथ तथा नेपाल से मोक्षमंडल जैसे विद्वान आए।
13. मौलाराम और ‘सुदर्शन-दर्शन’
- मौलाराम को सुदर्शन शाह से अपेक्षित सम्मान एवं संरक्षण नहीं मिला।
- इसके परिणामस्वरूप मौलाराम ने उनकी निंदा में ‘सुदर्शन-दर्शन’ नामक कविता लिखी।
- इसमें मौलाराम ने सुदर्शन शाह के लिए ‘सूम’, ‘कृपण’ तथा ‘खसिया नृप’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया।
- एक मत के अनुसार मौलाराम द्वारा गोरखा शासकों की प्रशंसा किए जाने से सुदर्शन शाह उनसे अप्रसन्न हो गए थे और उन्होंने मौलाराम को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं दिया।
- इसलिए सुदर्शन-दर्शन को मौलाराम की व्यक्तिगत खिन्नता की अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है।
14. सुदर्शन शाह के कला-प्रेम की प्रशंसा
- 6 फरवरी 1820 ई. को ब्रिटिश पर्यटक मूरक्राफ्ट (Moorcroft) टिहरी आया।
- मूरक्राफ्ट ने सुदर्शन शाह के कला-प्रेम के कारण उन्हें ‘कलाविदों का शिरोमणि’ कहा।
- मूरक्राफ्ट ने उन्हें कार्यशील एवं बुद्धिमान व्यक्ति बताया तथा श्रीनगर को पुनः प्राप्त न कर पाने के उनके दुख का भी उल्लेख किया।
- अजबराम ने सुदर्शन शाह को ‘दाता, ज्ञाता, सूरमा’ कहा।
- कवि भजन राय ने उन्हें दृढ़ वचन वाला राजा कहकर प्रशंसा की।
- भक्तदर्शन के अनुसार महाराजा सुदर्शन शाह योग्य एवं प्रजावत्सल शासक थे।
- शिव प्रसाद डबराल ने उन्हें ऐसा राजा बताया जो विपत्ति में नहीं घबराता और संपत्ति पर नहीं इतराता था।
- टिहरी की जनता उन्हें ‘बोलांद बद्रीश’ कहती थी।