रत्न चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

रत्न चंद चंद वंश के एक योग्य, शक्तिशाली एवं विस्तारवादी शासक थे। उन्होंने अपने पिता भारती चंद की सैन्य एवं राजनीतिक नीति को आगे बढ़ाते हुए चंद राज्य की शक्ति को सुदृढ़ किया। उनके शासनकाल में डोटी के साथ पुनः संघर्ष हुआ, जिसमें उन्होंने नागमल्ल को पराजित कर डोटी के शाही वंश को पुनः स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने जुमला, बजांग, थल तथा सोर आदि क्षेत्रों में अपनी प्रभुता स्थापित की। रत्न चंद केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि धार्मिक प्रवृत्ति वाले शासक और भूमि बंदोबस्त कराने वाले चंद वंश के प्रथम शासक के रूप में भी उल्लेखनीय हैं।

प्रमुख तथ्य

  • रत्न चंद एक योग्य एवं शक्तिशाली राजा थे। उन्होंने अपने पिता भारती चंद की तरह चंद राज्य को मजबूत करने में योगदान दिया तथा राज्य का विस्तार किया।
  • उनके शासनकाल की प्रमुख घटनाओं में डोटी राज्य के साथ युद्ध महत्वपूर्ण है। भारती चंद के समय भी डोटी और चंदों के बीच युद्ध हुआ था, जिसमें चंदों की विजय हुई और चंद राज्य डोटी से स्वतंत्र हुआ।
  • कुछ समय बाद डोटी में नागमल्ल ने विद्रोह कर शाही वंश के राजा को हटाकर स्वयं सत्ता पर अधिकार कर लिया।
  • डोटी के अपदस्थ शाही वंश के राजा ने चंद राज्य में शरण ली।
  • महत्वाकांक्षी नागमल्ल ने चंद राज्य को अपना अधीनस्थ बनाने का प्रयास किया, लेकिन रत्न चंद ने उसके प्रयास को विफल कर दिया।
  • रत्न चंद ने नागमल्ल को पराजित कर डोटी के शाही वंश के राजा को पुनः डोटी की गद्दी पर स्थापित किया।
  • डोटी में शाही वंश की पुनर्स्थापना से चंदों की शक्ति और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।
  • डोटी विजय से उत्साहित होकर रत्न चंद ने जुमला, बजांग और थल पर आक्रमण किया।
  • जुमला में जगन्नाथ भट्ट, बजांग में खड़कू सिंह महरा तथा थल में सूर सिंह महरा का शासन था।
  • रत्न चंद ने इन तीनों राज्यों को पराजित कर उन्हें कर देने के लिए बाध्य किया।
  • जुमला, बजांग और थल के शासक प्रतिवर्ष रत्न चंद को कर के रूप में एक मृगनाभि (कस्तूरी), एक धनुष, एक बाणों से भरा तरकश, एक बाज और एक घोड़ा देते थे।
  • इन राज्यों के अतिरिक्त रत्न चंद ने सोर के बम राजा को भी पराजित किया।
  • रत्न चंद के समय रोहेलों और चंद राज्य के बीच संबंध मधुर थे।
  • रत्न चंद धार्मिक प्रवृत्ति के शासक थे और उन्होंने जागेश्वर तीर्थ की यात्रा की।
  • जागेश्वर में उन्होंने धर्मशाला का निर्माण करवाया तथा मंदिर को कई गाँव दान में प्रदान किए।
  • रत्न चंद का उल्लेख लोहाघाट तथा हुड़ेती ताम्रपत्रों में मिलता है।
  • रत्न चंद को चंद वंश का प्रथम शासक माना जाता है जिसने भूमि बंदोबस्त अथवा भूमि की पैमाइश करवायी।
  • भूमि बंदोबस्त/पैमाइश का कार्य उन्होंने श्री जैदा किरालकि की सहायता से करवाया।
  • चंपावत के खेतीखान ताम्रपत्र में रत्न चंद की अनेक युद्धों में विजय का वर्णन मिलता है।
  • लोहाघाट ताम्रपत्र में रत्न चंद के भाई कुँवर रतन तथा सूजन कुँवर का उल्लेख मिलता है।

निष्कर्ष

रत्न चंद का शासन चंद राज्य के सैन्य विस्तार, राजनीतिक प्रतिष्ठा और प्रशासनिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। उन्होंने डोटी में नागमल्ल के विद्रोह को दबाकर शाही वंश की पुनर्स्थापना की और चंदों की शक्ति को प्रभावशाली बनाया। इसके बाद जुमला, बजांग, थल तथा सोर पर विजय अथवा प्रभुता स्थापित कर उन्होंने चंद राज्य के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया। उनकी उपलब्धियाँ केवल युद्धों तक सीमित नहीं थीं। जागेश्वर में धर्मशाला निर्माण और मंदिरों को ग्रामदान उनके धार्मिक एवं दानशील व्यक्तित्व को दर्शाता है। विशेष रूप से भूमि की पैमाइश एवं बंदोबस्त करवाना उनके प्रशासनिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। खेतीखान, लोहाघाट और हुड़ेती ताम्रपत्र उनके शासनकाल के प्रमुख अभिलेखीय स्रोत हैं। इस प्रकार रत्न चंद को चंद वंश के शक्तिशाली योद्धा, विस्तारवादी शासक और प्रारंभिक भूमि-बंदोबस्त कराने वाले महत्वपूर्ण राजा के रूप में देखा जाता है।

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