कत्यूरी वंश की राजधानी एवं राजधानी परिवर्तन|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कत्यूरी वंश उत्तराखंड के प्राचीन-मध्यकालीन इतिहास का एक महत्वपूर्ण राजवंश था। इस वंश की प्रारम्भिक राजधानी कार्तिकेयपुर थी, जिसे वर्तमान जोशीमठ के आसपास स्थित माना जाता है। कालांतर में कत्यूरी सत्ता का केंद्र कार्तिकेयपुर से हटकर बैजनाथ की सरयू घाटी में स्थापित हुआ। राजधानी परिवर्तन के समय और कारणों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। सुभिक्षराज, नरसिंह देव तथा अशांतिदेव से संबंधित विभिन्न मत मिलते हैं। प्राकृतिक परिस्थितियों, राजनीतिक दबाव तथा भौगोलिक अनुकूलता को इस परिवर्तन के संभावित कारणों के रूप में देखा जाता है।
कत्यूरी वंश की राजधानी एवं राजधानी परिवर्तन
- कत्यूरी वंश की प्रारम्भिक राजधानी कार्तिकेयपुर थी, जिसे सामान्यतः वर्तमान जोशीमठ के निकट स्थित माना जाता है। ‘कार्तिकेयपुर’ से ही ‘कत्यूरी’ शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है
- कार्तिकेयपुर लंबे समय तक कत्यूरी शासकों का प्रमुख राजनीतिक एवं प्रशासनिक केंद्र रहा। पांडुकेश्वर आदि स्थानों से प्राप्त अभिलेख इस क्षेत्र में कत्यूरी सत्ता की महत्वपूर्ण उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं।
- कालांतर में कत्यूरी शासकों ने कार्तिकेयपुर का त्याग कर सरयू घाटी स्थित बैजनाथ को अपना नया राजनीतिक केंद्र बनाया। बैजनाथ आगे चलकर कत्यूरी सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया।
- राजधानी परिवर्तन के समय को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। यशवंत सिंह कठोच के अनुसार कार्तिकेयपुर से बैजनाथ राजधानी का स्थानांतरण सुभिक्षराज के समय हुआ था।
- घनश्याम जोशी के मतानुसार कार्तिकेयपुर से बैजनाथ राजधानी का स्थानांतरण नरसिंह देव के समय किया गया था।
- उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर अशांतिदेव के समय राजधानी परिवर्तन का मत अधिक प्रमाणिक माना जाता है। अतः परीक्षा की दृष्टि से इस मत को विशेष रूप से ध्यान रखना उपयोगी है।
- कुछ परंपराओं में राजधानी परिवर्तन को सुभिक्षपुर से भी जोड़ा गया है। इससे संकेत मिलता है कि राजनीतिक केंद्र का स्थानांतरण संभवतः एक क्रमिक प्रक्रिया रही हो, न कि अचानक किया गया एकमात्र परिवर्तन।
- एक प्रसिद्ध जनश्रुति के अनुसार नरसिंह देव के शिकार पर जाने के दौरान भगवान विष्णु नृसिंह रूप में ब्राह्मण वेश में राजमहल आए। राजा द्वारा उनकी बाँह पर तलवार से प्रहार करने के बाद रक्त के स्थान पर दूध निकलने और ब्राह्मण द्वारा शाप दिए जाने की कथा मिलती है। इसी शाप के कारण राजा को जोशीमठ छोड़ना पड़ा बताया जाता है, किंतु इसकी ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती।
- कुछ विद्वानों ने राजधानी परिवर्तन का कारण शैव एवं वैष्णव सम्प्रदायों के बीच विवाद को माना है। किंतु कत्यूरी शासकों द्वारा वैष्णव मंदिरों को दिए गए दान इस मत को पूर्णतः स्वीकार करने में बाधक हैं।
- इतिहासकार शिवप्रसाद डबराल के अनुसार कार्तिकेयपुर क्षेत्र में हिमस्खलन के भय के कारण कत्यूरी शासकों को राजधानी स्थानांतरित करनी पड़ी। भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए यह मत अपेक्षाकृत अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है
- कार्तिकेयपुर की ऊँचाई, दुर्गम भौगोलिक स्थिति तथा प्राकृतिक आपदाओं की आशंका ने भी राजधानी के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित एवं सुविधाजनक क्षेत्र की आवश्यकता उत्पन्न की होगी।
- बैजनाथ की सरयू घाटी कृषि, आवागमन, व्यापार तथा प्रशासन की दृष्टि से अधिक अनुकूल क्षेत्र थी। इसलिए राजधानी के रूप में बैजनाथ का चयन कत्यूरी शासन को आर्थिक एवं प्रशासनिक सुविधाएँ प्रदान कर सकता था।
- राजधानी परिवर्तन के पीछे राजनीतिक परिस्थितियों की भी भूमिका रही होगी। तत्कालीन क्षेत्रीय शक्तियों के बीच बदलते शक्ति-संतुलन ने कत्यूरी शासकों को अपने राजनीतिक केंद्र को अधिक अनुकूल स्थान पर ले जाने के लिए प्रेरित किया होगा।
- परमार शक्ति का दबाव भी राजधानी परिवर्तन का एक संभावित कारण माना जाता है। राजनीतिक दबाव से बचने तथा अपने राज्य पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए राजधानी का स्थानांतरण किया गया हो सकता है।
- इस प्रकार राजधानी परिवर्तन को केवल धार्मिक जनश्रुति से जोड़ना उचित नहीं है। उपलब्ध प्रमाणों को देखते हुए प्राकृतिक जोखिम, भौगोलिक अनुकूलता और राजनीतिक परिस्थितियों को अधिक महत्वपूर्ण संभावित कारण माना जाना चाहिए।
- अतः कार्तिकेयपुर से बैजनाथ का राजधानी परिवर्तन एक बहु-चरणीय एवं बहु-कारणीय प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। इसके समय को लेकर सुभिक्षराज, नरसिंह देव और अशांतिदेव से संबंधित मत मिलते हैं, जिनमें अशांतिदेव से संबंधित मत को अधिक प्रमाणिक माना जाता है।
निष्कर्ष
कत्यूरी वंश की राजधानी का कार्तिकेयपुर से बैजनाथ की ओर स्थानांतरण उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। कार्तिकेयपुर ने कत्यूरी सत्ता के प्रारम्भिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि बैजनाथ की सरयू घाटी ने आगे चलकर इस वंश को अधिक अनुकूल राजनीतिक, आर्थिक और भौगोलिक आधार प्रदान किया। राजधानी परिवर्तन के समय को लेकर यशवंत सिंह कठोच, घनश्याम जोशी और अन्य इतिहासकारों के मतों में अंतर दिखाई देता है—जहाँ क्रमशः सुभिक्षराज और नरसिंह देव के नाम मिलते हैं, वहीं उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर अशांतिदेव का मत अधिक प्रमाणिक माना जाता है। नरसिंह देव से जुड़ी जनश्रुति लोकपरंपरा का हिस्सा है, परंतु इसे ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जा सकता। हिमस्खलन, भौगोलिक परिस्थितियाँ, बैजनाथ की अनुकूलता तथा परमार शक्ति का दबाव राजधानी परिवर्तन को समझने के अधिक तर्कसंगत आधार हैं। अतः यह परिवर्तन कत्यूरी सत्ता की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप प्राकृतिक, राजनीतिक और भौगोलिक कारकों का संयुक्त परिणाम माना जा सकता है।