राजा विक्रम चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा विक्रम चंद चंद वंश के महत्वपूर्ण शासकों में गिने जाते हैं। उनके शासनकाल से संबंधित जानकारी मुख्यतः अभिलेखीय स्रोतों, विशेषकर चंपावत के बालेश्वर मंदिर से प्राप्त ताम्रपत्र से मिलती है। 1423 ई. का बालेश्वर ताम्रपत्र उनके शासनकाल की धार्मिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक गतिविधियों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है। इस ताम्रपत्र से बालेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार, ब्राह्मण को भूमिदान तथा तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था से संबंधित जानकारी प्राप्त होती है।
प्रमुख तथ्य
- राजा विक्रम चंद से संबंधित 1423 ई. का बालेश्वर मंदिर ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है।
- इस ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि विक्रम चंद ने बालेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार/मरम्मत का कार्य पूरा करवाया था।
- बालेश्वर मंदिर के निर्माण कार्य की शुरुआत उद्यान चंद द्वारा की गई थी, जिसे विक्रम चंद ने आगे बढ़ाकर पूर्ण कराया।
- इस कार्य में कुंज शर्मा तिवारी नामक ब्राह्मण का योगदान था।
- जीर्णोद्धार का कार्य पूरा होने के बाद कुंज शर्मा को भूमि प्रदान की गई थी।
- बालेश्वर ताम्रपत्र में गुजराती ब्राह्मण कुंज शर्मा तिवारी को भूमिदान किए जाने का उल्लेख मिलता है।
- ताम्रपत्र में साक्षीगण के रूप में ‘पंतनवीसी’ का उल्लेख मिलता है। वर्तमान प्रशासनिक संदर्भ में इसे कचहरी से संबंधित व्यवस्था के रूप में समझा जाता है।
- विक्रम चंद को एक विलासी शासक के रूप में भी वर्णित किया जाता है।
- उनके शासनकाल में भारती चंद ने विद्रोह किया था।
- भारती चंद के विद्रोह के परिणामस्वरूप विक्रम चंद को गद्दी छोड़नी पड़ी।
निष्कर्ष
राजा विक्रम चंद के संबंध में 1423 ई. का बालेश्वर ताम्रपत्र अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है। इससे न केवल उनके द्वारा बालेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार की जानकारी मिलती है, बल्कि तत्कालीन भूमिदान परंपरा, ब्राह्मणों की भूमिका तथा प्रशासनिक व्यवस्था की भी झलक मिलती है। उद्यान चंद द्वारा प्रारंभ किए गए मंदिर कार्य को विक्रम चंद द्वारा पूर्ण कराना चंद शासकों की धार्मिक एवं स्थापत्य गतिविधियों की निरंतरता को दर्शाता है। कुंज शर्मा तिवारी को भूमिदान तथा ‘पंतनवीसी’ जैसे पद/व्यवस्था का उल्लेख तत्कालीन सामाजिक-प्रशासनिक संरचना को समझने में सहायक है। साथ ही, भारती चंद के विद्रोह और उसके परिणामस्वरूप विक्रम चंद के सिंहासन छोड़ने की घटना उनके शासनकाल के राजनीतिक संघर्ष को स्पष्ट करती है।