कत्यूरी काल में धार्मिक स्थिति |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कत्यूरी काल उत्तराखंड के धार्मिक इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस काल से प्राप्त पुरातात्विक एवं अभिलेखीय सामग्री का एक बड़ा भाग धार्मिक गतिविधियों से संबंधित है। उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक शैव और वैष्णव मंदिरों का निर्माण हुआ, जिससे दोनों सम्प्रदायों की व्यापक लोकप्रियता का पता चलता है। इसके साथ ही बौद्ध धर्म की उपस्थिति के भी संकेत मिलते हैं। शासकों द्वारा विभिन्न धार्मिक परंपराओं एवं मंदिरों को संरक्षण और दान दिए जाने से तत्कालीन धार्मिक सहिष्णुता तथा बहुधार्मिक वातावरण की झलक मिलती है।
प्रमुख बिंदु
- कत्यूरी काल की प्राप्त पुरातात्विक सामग्री में सर्वाधिक सामग्री धार्मिक प्रकृति की है। मंदिर, मूर्तियाँ, अभिलेख तथा अन्य धार्मिक अवशेष इस काल की धार्मिक गतिविधियों की जानकारी देते हैं।
- इस काल में उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक शैव एवं वैष्णव मंदिरों का निर्माण एवं स्थापना हुई, जिससे दोनों सम्प्रदायों के व्यापक प्रभाव का पता चलता है।
- कत्यूरी शासकों में शैव धर्म का प्रभाव दिखाई देता है, किंतु इसके साथ ही वैष्णव धर्म को भी संरक्षण प्राप्त था। इससे तत्कालीन धार्मिक जीवन में दोनों परंपराओं के सह-अस्तित्व का संकेत मिलता है
- शासकों द्वारा स्वयं शैव मत का अनुयायी होने के बावजूद वैष्णव मंदिरों को भूमि दान दिया जाना उनकी धार्मिक सहिष्णुता को प्रदर्शित करता है।
- ललित सूर देव की पत्नी सामादेवी द्वारा भगवान नारायण के मंदिर की स्थापना किए जाने का उल्लेख मिलता है, जो कत्यूरी शासक परिवार में वैष्णव परंपरा के प्रभाव को दर्शाता है।
- स्वयं ललित सूर देव द्वारा वैष्णव मंदिरों को भूमि दान दिया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि राजकीय संरक्षण किसी एक धार्मिक सम्प्रदाय तक सीमित नहीं था।
- कत्यूरी काल में बौद्ध धर्म की भी उत्तराखंड में उपस्थिति थी। यद्यपि इस काल में बौद्ध धर्म को व्यापक राजकीय संरक्षण प्राप्त होने के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलते, फिर भी उसके प्रभाव और अस्तित्व से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता।
- भूदेव द्वारा ‘बुद्ध श्रमण शत्रु’ उपाधि धारण किए जाने से संकेत मिलता है कि तत्कालीन शासन में बौद्ध धर्म के प्रति विशेष संरक्षण की स्थिति नहीं रही होगी। हालांकि, इस एक उपाधि के आधार पर बौद्ध धर्म के पूर्ण विरोध का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
- कत्यूरी काल में मंदिर केवल धार्मिक उपासना के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन के भी महत्वपूर्ण केंद्र रहे होंगे। मंदिरों को भूमि दान दिए जाने से उनकी आर्थिक भूमिका का भी संकेत मिलता है।
- धार्मिक सहिष्णुता के कारण शैव, वैष्णव और बौद्ध परंपराओं के तत्व इस क्षेत्र के धार्मिक जीवन में किसी न किसी रूप में विद्यमान रहे। इससे उत्तराखंड की धार्मिक संस्कृति में विविधता बनी रही।
- परवर्ती कत्यूरी काल में शासकों को देवतुल्य मानने की प्रवृत्ति विकसित होने लगी। उनके व्यक्तित्व और आत्मा से संबंधित लोकविश्वासों ने बाद में धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं का रूप ग्रहण किया।
- परवर्ती कत्यूरी शासकों की आत्माओं की पूजा से संबंधित परंपरा आगे चलकर लोकदेवता एवं देवपरंपरा से जुड़ गई। उत्तराखंड के अनेक क्षेत्रों में पूर्वजों और ऐतिहासिक व्यक्तियों से संबंधित ऐसी लोक-आस्थाएँ आज भी देखने को मिलती हैं।
निष्कर्ष
कत्यूरी कालीन उत्तराखंड की धार्मिक स्थिति को धार्मिक विविधता, शैव-वैष्णव समन्वय और सहिष्णुता की दृष्टि से समझा जा सकता है। इस काल में शैव और वैष्णव सम्प्रदाय विशेष रूप से प्रभावशाली थे तथा दोनों से संबंधित अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। शासकों द्वारा वैष्णव मंदिरों को भूमि दान देना, स्वयं शैव परंपरा से जुड़े होने के बावजूद अन्य धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण प्रदान करना धार्मिक सहिष्णुता का महत्वपूर्ण प्रमाण है। बौद्ध धर्म की उपस्थिति के संकेत भी मिलते हैं, हालांकि उसे व्यापक राजकीय संरक्षण प्राप्त होने के प्रमाण सीमित हैं। परवर्ती काल में शासकों के देवतुल्यकरण और उनकी आत्माओं की पूजा ने उत्तराखंड की विशिष्ट लोकदेवता परंपरा को भी प्रभावित किया। इस प्रकार कत्यूरी काल ने उत्तराखंड की मंदिर-परंपरा, धार्मिक सह-अस्तित्व और लोक आस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।