कत्यूरी कालीन राजस्व व्यवस्था |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

कत्यूरी काल में राज्य की प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था में राजस्व का महत्वपूर्ण स्थान था। कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के कारण भूमि से प्राप्त आय राज्य के राजस्व का प्रमुख आधार रही होगी। इसके अतिरिक्त वन, खनिज, पशु, व्यापार तथा विभिन्न कर एवं शुल्क भी राज्य की आय के स्रोत थे। कत्यूरी ताम्रपत्रों में भूमि, कर, मापन, दान तथा राजस्व अधिकारियों से संबंधित महत्वपूर्ण विवरण मिलते हैं। भूमि के मापन के लिए बीज की मात्रा पर आधारित इकाइयों का प्रयोग इस व्यवस्था की विशिष्ट विशेषता थी। इससे कत्यूरी काल में भूमि-मापन, कर-संग्रह, भू-अभिलेख एवं प्राकृतिक संसाधनों के प्रशासन की विकसित व्यवस्था का संकेत मिलता है।

प्रमुख तथ्य

  • कत्यूरी काल में भूराजस्व राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। इसका संबंध मुख्यतः कृषि भूमि से प्राप्त राजस्व से था।
  • कृषि उस समय की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार थी। इसलिए भूमि एवं कृषि से संबंधित राजस्व व्यवस्था को विशेष महत्व प्राप्त था।
  • भूराजस्व के अतिरिक्त वन एवं खनिज संपदा राज्य की आय के महत्वपूर्ण स्रोत थे। पर्वतीय क्षेत्र में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का आर्थिक महत्व था।
  • राज्य की ओर से ‘क्षेत्रफल’ नामक पदाधिकारी कृषि उन्नति से संबंधित कार्य करता था।
  • ‘प्रमावातार’ नामक अधिकारी भूमि की विधिवत नाप-जोख से संबंधित था।
  • भूमि से संबंधित पट्टों एवं अभिलेखों को सुरक्षित रखने के लिए ‘उपचारिक’ अथवा ‘पट्टकोषचारिक’ नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता है।
  • कत्यूरी काल में भूमि का मापन सामान्यतः भूमि में बोए जाने वाले बीज की मात्रा के आधार पर किया जाता था। यह तत्कालीन भूमि-मापन प्रणाली की विशिष्ट विशेषता थी।
  • भूमि-मापन में द्रोणवाप, कुल्यवाप एवं खारिवाप जैसी इकाइयों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त कुछ अभिलेखीय संदर्भों में नाली आधारित मापन का भी उल्लेख मिलता है।
  • द्रोणवाप से आशय सामान्यतः इतनी भूमि से था, जिसमें निर्धारित मात्रा में बीज बोया जा सके। ‘वाप’ शब्द का संबंध बीज की मात्रा से माना जाता है।
  • एक द्रोण को प्रायः 32 सेर के बराबर माना गया है। इसी आधार पर द्रोणवाप भूमि की अवधारणा को समझा जाता है।
  • कुल्यवाप द्रोणवाप से बड़ी भूमि-मापन इकाई थी। इसे सामान्यतः 8 द्रोण के बराबर माना जाता है।
  • खारिवाप भी बड़ी भूमि-मापन इकाई थी। इसे सामान्यतः 20 द्रोण के बराबर माना जाता है।
  • Lकत्यूरी कालीन भूमि-मापन की ये इकाइयाँ यह दर्शाती हैं कि भूमि का निर्धारण एवं राजस्व व्यवस्था आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई थी।
  • वन एवं खनिज संपदा पर राज्य का नियंत्रण था। इनके संरक्षण एवं संबंधित कार्यों के लिए विशेष अधिकारियों की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
  • खण्डपति तथा खण्ड रक्षा स्थानाधिपति जैसे पदाधिकारियों का संबंध वन एवं संसाधन व्यवस्था से माना जाता है।
  • कत्यूरी क्षेत्र के लौह, ताम्र, स्वर्णचूर्ण, भोजपत्र, रिंगाल एवं बाँस जैसे प्राकृतिक संसाधनों का आर्थिक महत्व रहा होगा।
  • ऊन एवं ऊनी वस्त्र, पशु-पक्षी, मधु तथा वन-औषधियों के व्यापार से भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ प्राप्त होता था तथा राज्य को अप्रत्यक्ष रूप से आय मिलती रही होगी।
  • कत्यूरी अभिलेखों में विभिन्न करों एवं शुल्कों का उल्लेख मिलता है। कृषि एवं पशु-उत्पादों से भी निर्धारित अंश के रूप में राजस्व लिया जाता था।
  • भोगपति एवं शौल्किक जैसे अधिकारियों का संबंध कर एवं शुल्क के संग्रह से था।
  • भोग एवं शुल्क जैसे विभिन्न राजस्व स्रोतों का उल्लेख कत्यूरी अभिलेखों में मिलता है।
  • भट्ट एवं चार-प्रचार नामक पदाधिकारियों द्वारा जनता से बेगार (बिष्टि) लिए जाने का उल्लेख मिलता है। हालांकि मंदिरों को दान में प्राप्त भूमि से संबंधित लोगों को कुछ विशेष परिस्थितियों में बेगार से छूट प्राप्त थी।
  • कत्यूरी शासकों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दान में दी गई अग्रहार भूमि सामान्यतः कर-मुक्त होती थी।
  • राज्य की आय के संदर्भ में पशुधन एवं पशु-आधारित संसाधनों का भी महत्व था। इनके प्रबंधन एवं संरक्षण के लिए अधिकारियों की व्यवस्था के संकेत मिलते हैं।
  • भोटान्तिक व्यापार भी कत्यूरी राज्य की आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा होगा और इससे राज्य को राजस्व प्राप्त होने की संभावना थी।
  • इस प्रकार कत्यूरी कालीन राजस्व व्यवस्था में भूराजस्व, वन एवं खनिज संसाधन, कर एवं शुल्क, पशुधन तथा व्यापार जैसे अनेक आय-स्रोत सम्मिलित थे।

निष्कर्ष

कत्यूरी कालीन राजस्व व्यवस्था तत्कालीन कृषि प्रधान एवं पर्वतीय अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित व्यवस्था का परिचायक थी। भूराजस्व राज्य की आय का प्रमुख आधार था, जबकि वन, खनिज, पशुधन, व्यापार तथा विभिन्न कर एवं शुल्क इसके अन्य महत्वपूर्ण स्रोत थे। भूमि की नाप-जोख, भू-अभिलेखों का संरक्षण तथा कर-संग्रह के लिए अलग-अलग अधिकारियों की व्यवस्था प्रशासनिक संगठन को दर्शाती है। द्रोणवाप, कुल्यवाप एवं खारिवाप जैसी बीज-आधारित भूमि-मापन इकाइयाँ इस काल की राजस्व व्यवस्था की विशिष्ट विशेषता थीं। प्राकृतिक संसाधनों पर राजकीय नियंत्रण तथा अग्रहार भूमि को कर-मुक्त रखने की परंपरा भी आर्थिक एवं धार्मिक नीतियों के संबंध को दर्शाती है। इस प्रकार कत्यूरी राजस्व व्यवस्था में कृषि, भूमि-मापन, कर-संग्रह, प्राकृतिक संसाधन एवं व्यापार पर आधारित बहुआयामी आर्थिक ढाँचा दिखाई देता है।

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