एकचक्रा का बाहुबाण राजवंश |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

कार्तिकेयपुरवंशीय सत्ता के पतन के बाद उत्तराखण्ड में बहुराजकता का दौर प्रारम्भ हुआ। पूर्ववर्ती विशाल राज्य के कमजोर पड़ने पर अनेक सामन्तों, स्थानीय गढ़पतियों तथा क्षेत्रीय कुलों ने स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली। इसी राजनीतिक विखंडन की पृष्ठभूमि में पश्चिमी गढ़देश की यमुना घाटी में एकचक्रा के बाहुबाण राजवंश का उदय हुआ। इस वंश की जानकारी मुख्यतः अल्लाटनाथ सूरि के ‘निर्णयामृत’ से प्राप्त होती है, जिसमें बाहुबाणवंशीय सात राजाओं का उल्लेख मिलता है।

प्रमुख बिंदु

  • अल्लाटनाथ सूरि के ‘निर्णयामृत’ में एकचक्रापुरी के बाहुबाणवंशीय सात राजाओं के नाम प्राप्त होते हैं।
  • एकचक्रा की पहचान वर्तमान चकरौता से की जाती है, जो यमुना के पर्वतीय प्रदेश में स्थित है।
  • निर्णयामृत में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि यमुना एकचक्रा के उपकण्ठ में बहती थी। यह विवरण एकचक्रा की भौगोलिक स्थिति निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है।
  • अल्लाटनाथ बाहुबाण वंश के पाँचवें राजा सूर्यसेन के आश्रित कवि थे।
  • अल्लाटनाथ का सूर्यसेन के समकालीन होना महत्वपूर्ण है। इसी कारण निर्णयामृत में बाहुबाण राजवंश से संबंधित सूचनाओं को विशेष ऐतिहासिक महत्व प्राप्त होता है।
  • निर्णयामृत के अनुसार, बाहुबाण वंश के तीसरे राजा उद्धरण ने “दिल्ली नगरी पहुँचकर शक (मुसलमान) राजा के हस्तियों को आहत किया था।”
  • उद्धरण की इस विजय-वर्णना को अत्युक्तिपूर्ण मानने पर भी यह संकेत मिलता है कि उसके राज्य की सीमा दिल्ली सल्तनत की उत्तरी सीमा से बहुत दूर नहीं थी।
  • ग्रंथ में ‘दिल्ली’ का उल्लेख इसके रचनाकाल के निर्धारण में भी सहायक माना जाता है।
  • उपलब्ध अभिलेखीय संदर्भों के आधार पर निर्णयामृत का रचनाकाल चौदहवीं शती के उत्तरार्द्ध में माना जा सकता है।
  • डॉ. भाण्डारकर ने ‘बाहुबाण’ शब्द को ‘चाहुवाण’ के लिए प्रयुक्त माना है। हालांकि, मूल पाण्डुलिपियों के पुनरीक्षण के बिना इस पहचान को निश्चित रूप से स्वीकार करना उचित नहीं है।
  • इतना स्पष्ट है कि पँवारों द्वारा गढ़देश के एकीकरण से पूर्व, पश्चिमी गढ़देश की यमुना घाटी में बाहुबाण वंश ने एक शती से अधिक समय तक शासन किया।
  • बाहुबाण राजवंश के संबंध में वर्तमान में उपलब्ध जानकारी मुख्यतः निर्णयामृत तक ही सीमित है। अन्य स्रोतों से इस वंश के विषय में इससे अधिक विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हुई है।

निष्कर्ष

एकचक्रा का बाहुबाण राजवंश उत्तराखण्ड में कार्तिकेयपुरवंशीय सत्ता के पतन के बाद उत्पन्न क्षेत्रीय एवं स्वतंत्र राजसत्ताओं की महत्वपूर्ण कड़ी था। इसकी विशेषता यह है कि इसका इतिहास मुख्यतः साहित्यिक स्रोत निर्णयामृत के आधार पर पुनर्निर्मित किया जाता है। अल्लाटनाथ द्वारा सूर्यसेन के आश्रय में रचित इस ग्रंथ में बाहुबाण वंश के सात राजाओं का उल्लेख मिलता है, जिससे यमुना घाटी में इस वंश की राजनीतिक उपस्थिति प्रमाणित होती है। राजा उद्धरण का दिल्ली तक अभियान इस वंश की संभावित राजनीतिक शक्ति का संकेत देता है, यद्यपि उसकी विजय-वर्णना में अतिशयोक्ति हो सकती है। चौदहवीं शती के उत्तरार्द्ध में इसकी उपस्थिति तथा पँवारों द्वारा गढ़देश के एकीकरण से पूर्व एक शती से अधिक समय तक यमुना घाटी में शासन करना इसे उत्तराखण्ड की मध्यकालीन बहुराजकता के अध्ययन में महत्वपूर्ण बनाता है।

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