गढ़वाल के पंवार/परमार वंश के स्रोत|Parmar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कत्यूरी सत्ता के विघटन के बाद गढ़वाल में पंवार/परमार वंश का उदय हुआ, जिसने इस क्षेत्र में लंबे समय तक शासन किया। इस दीर्घकालीन राजवंश के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए विभिन्न प्रकार के स्रोत उपलब्ध हैं। पंवार/परमार वंश की राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति को समझने में वंशावलियों, अभिलेखों, साहित्यिक ग्रंथों, मुस्लिम साहित्य, समकालीन राज्यों के इतिहास, पवाड़ों, विदेशी यात्रियों के विवरण तथा मंदिरों, महलों, किलों और सिक्कों का महत्वपूर्ण योगदान है। इन स्रोतों की प्रकृति अलग-अलग होने के कारण प्रत्येक स्रोत पंवार इतिहास के किसी विशेष पक्ष पर प्रकाश डालता है। अतः पंवार/परमार वंश के इतिहास के अध्ययन में साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है
गढ़वाल के पंवार/परमार वंश के स्रोत
- साहित्यिक स्रोत
- पुरातात्त्विक स्रोत
1. साहित्यिक स्रोत
- पंवार/परमार वंशावलियाँ — अभिलेखों एवं साहित्यिक ग्रंथों के अतिरिक्त पंवार वंश से संबंधित विभिन्न वंशावलियाँ भी इस वंश का इतिहास जानने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इन वंशावलियों की खोज हाडविक, मौलाराम, बैकेट तथा विलियम्स आदि ने की। इसके अतिरिक्त एटकिंसन को अल्मोड़ा में एक पंडित के घर से एक वंशावली-सूची प्राप्त हुई थी। अल्मोड़ा से प्राप्त होने के कारण इसे ‘अल्मोड़ा सूची’ या ‘एटकिंसन की सूची’ कहा जाता है। उपलब्ध वंशावलियों में बैकेट की सूची को अपेक्षाकृत अधिक सटीक एवं प्रामाणिक माना जाता है।
- मुस्लिम साहित्य — तत्कालीन एवं परवर्ती मुस्लिम साहित्य में भी पंवार/परमार शासकों तथा गढ़वाल के संबंध में महत्वपूर्ण उल्लेख मिलते हैं। प्रमुख ग्रंथों में जहाँगीरनामा, शाहजहाँनामा, तारीख-ए-बदायूँनी तथा मआसिर-उल-उमरा आदि शामिल हैं। इनसे पंवार शासन की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति तथा बाहरी शक्तियों के साथ संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त गुरु गोविंद सिंह की रचना ‘विचित्र नाटक’ में राजा फतेहपति के संबंध में जानकारी मिलती है।
- चंद वंश का इतिहास — कुमाऊँ के चंद शासकों और गढ़वाल के पंवार शासकों के बीच विभिन्न समयों में युद्ध, सैन्य अभियान तथा राजनीतिक संबंध रहे। इसलिए चंद वंश से संबंधित ऐतिहासिक सामग्री से पंवार वंश के युद्धों, सैन्य गतिविधियों एवं राजनीतिक संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है।
- सिरमौर एवं तिब्बत का इतिहास — गढ़वाल के पंवार शासकों के पड़ोसी राज्यों एवं क्षेत्रों से भी संबंध रहे। सिरमौर तथा तिब्बत के इतिहास से पंवार शासकों के युद्धों, अभियानों और राजनीतिक संबंधों के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
- परमार का दरबारी साहित्य — पंवार शासकों के दरबार से संबंधित साहित्य भी इस वंश के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है। दरबारी कवियों द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथों में ‘मनोदय काव्य’, ‘गढ़ राजवंश काव्य’, ‘रामायण प्रदीप’, ‘सभासार’ तथा ‘फतेहप्रकाश’ आदि का उल्लेख किया जाता है। इनसे राजवंश, शासकों तथा तत्कालीन सांस्कृतिक वातावरण के संबंध में जानकारी मिलती है।
- पवाड़े/वीरगाथाएँ — गढ़राज्य में भाटों द्वारा रचित वीरगाथात्मक गीतों को पवाड़ा या पैवाड़ा कहा जाता है। इनमें स्थानीय वीरों, युद्धों और महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन मिलता है। कफ्फू चौहान, जीतू बगड़वाल, लोधी रिखोला, तीलू रौतेली तथा माधो सिंह भंडारी के पवाड़े प्रसिद्ध हैं। ये तत्कालीन लोक-स्मृति, वीर परंपरा एवं सामाजिक जीवन को समझने में सहायक हैं।
- विदेशी यात्रियों का विवरण — परमार काल में हिमालयी क्षेत्र की यात्रा करने वाले यूरोपीय यात्रियों ने अपने यात्रा-वृत्तांतों में गढ़वाल एवं उसके शासकों का उल्लेख किया है। विलियम फिंच, मनूची, बर्नियर, फोस्टर, हार्डविक, हियरसी, रैपर, फ्रेजर तथा मूरक्राफ्ट आदि के विवरण महत्वपूर्ण हैं। इनसे तत्कालीन गढ़वाल की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है।
2. पुरातात्त्विक स्रोत
- पंवार/परमार कालीन अभिलेख — पंवार/परमार शासकों तथा परवर्ती पंवार राजाओं के समय के अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इनमें दानपत्र एवं ताम्रपत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इन अभिलेखों से शासकों, भूमि-दान, प्रशासन, धार्मिक संस्थाओं तथा तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के संबंध में प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है।
- स्मारक — पंवार/परमार काल से संबंधित अनेक मंदिर, महल, किले तथा अन्य स्थापत्य अवशेष उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त हुए हैं। इनके माध्यम से तत्कालीन स्थापत्य कला, धार्मिक गतिविधियों, राजकीय संरक्षण एवं सांस्कृतिक विकास का अध्ययन किया जा सकता है।
- सिक्के — विभिन्न स्थानों से प्राप्त सिक्के भी पंवार काल के अध्ययन में उपयोगी हैं। इनके माध्यम से तत्कालीन मुद्रा-प्रचलन, आर्थिक गतिविधियों और राजसत्ता के संबंध में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
- उत्तरकाशी की मंदिर-वंशावलियाँ — परशुराम मंदिर तथा विश्वनाथ मंदिर, उत्तरकाशी में उपलब्ध दो अन्य सूचियाँ भी महत्वपूर्ण हैं। इनमें प्रदीप शाह से लेकर सुदर्शन शाह तक के नरेशों के नाम अंकित हैं। इसलिए ये सूचियाँ पंवार/परमार वंश के उत्तरवर्ती शासकों के क्रम एवं इतिहास के अध्ययन में सहायक हैं।
निष्कर्ष
गढ़वाल के पंवार/परमार वंश के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक स्रोतों का संयुक्त अध्ययन आवश्यक है। साहित्यिक स्रोतों में वंशावलियाँ, मुस्लिम ग्रंथ, चंद तथा सिरमौर-तिब्बत के ऐतिहासिक विवरण, दरबारी साहित्य, पवाड़े और विदेशी यात्रियों के वृत्तांत प्रमुख हैं। वहीं अभिलेख, ताम्रपत्र, मंदिर, महल, किले तथा सिक्के पुरातात्त्विक प्रमाण के रूप में महत्वपूर्ण हैं। बैकेट की वंशावली, पंवार कालीन अभिलेख तथा विभिन्न समकालीन स्रोत पंवार शासकों के इतिहास को समझने में विशेष उपयोगी हैं। हालांकि वंशावलियों और लोक-साहित्य में परंपरा एवं किंवदंतियों के तत्व मिल सकते हैं, इसलिए इनका परीक्षण अभिलेखीय एवं पुरातात्त्विक प्रमाणों के साथ करना आवश्यक है। इस प्रकार विभिन्न स्रोतों के तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक अध्ययन से ही गढ़वाल के पंवार/परमार वंश का अधिक विश्वसनीय इतिहास निर्मित किया जा सकता है।