कुमाऊँ के चंद वंश के स्रोत|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कुमाऊँ के चंद वंश के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए साहित्यिक तथा पुरातात्त्विक दोनों प्रकार के स्रोत उपलब्ध हैं। साहित्यिक स्रोतों में चंद वंशावली, मुस्लिम लेखकों के विवरण तथा परमार एवं नेपाल के इतिहास से संबंधित सामग्री प्रमुख है। वहीं पुरातात्त्विक स्रोतों में चंदकालीन अभिलेख, मंदिर, किले, महल, नौले तथा अन्य स्थापत्य अवशेष महत्वपूर्ण हैं। इन स्रोतों से चंद शासकों की वंशपरंपरा, राजनीतिक गतिविधियों, युद्धों, प्रशासन, आर्थिक स्थिति, धार्मिक संरक्षण तथा कला-स्थापत्य के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। विभिन्न स्रोतों के तुलनात्मक अध्ययन से चंदकालीन इतिहास को अधिक व्यापक रूप में समझने में सहायता मिलती है।
कुमाऊँ के चंद वंश के स्रोत
- साहित्यिक स्रोत
- पुरातात्त्विक स्रोत
1. साहित्यिक स्रोत
- चंद वंशावली – चंद वंश के इतिहास का प्रमुख साहित्यिक स्रोत चंद वंशावली है। बद्रीदत्त पांडे, शिव प्रसाद डबराल आदि इतिहासकारों के लेखन में चंद राजाओं की वंशपरंपरा एवं उनके शासन का विवरण मिलता है। इनके आधार पर लगभग 62 चंद राजाओं का उल्लेख किया जाता है।
- मुस्लिम साहित्य – समकालीन एवं निकटवर्ती काल के मुस्लिम साहित्य से चंद शासकों तथा कुमाऊँ की राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी मिलती है। फरिश्ता, बदायूँनी तथा जहाँगीरकालीन साहित्य में उत्तराखंड के चंद शासकों का उल्लेख मिलता है। इन विवरणों से तत्कालीन राजनीतिक, सैन्य एवं आर्थिक परिस्थितियों को समझने में सहायता मिलती है।
- परमार वंश का इतिहास – कुमाऊँ के चंदों के समकालीन गढ़वाल के परमार शासकों से उनके संबंधों की जानकारी परमार वंश से संबंधित ऐतिहासिक सामग्री से मिलती है। इसमें युद्ध, सैन्य अभियान, राजनीतिक संबंध तथा परस्पर संघर्ष जैसी घटनाओं के संकेत प्राप्त होते हैं।
- नेपाल का इतिहास – नेपाल के ऐतिहासिक स्रोत भी चंद वंश के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं। चंद शासकों और नेपाल के समकालीन शासकों के बीच हुए युद्धों, सैन्य अभियानों तथा राजनीतिक संबंधों के संबंध में इन स्रोतों से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
पुरातात्त्विक स्रोत
- चंदकालीन अभिलेखशिलालेख एवं ताम्रपत्र चंद वंश के इतिहास के अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं। चंद शासकों द्वारा उत्कीर्ण इन अभिलेखों में राजाओं, भूमि-दान, धार्मिक संस्थाओं तथा प्रशासन से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।
- प्राचीन चंद अभिलेखचंद वंश का एक प्राचीन अभिलेख 1317 ई. में राजा अभयचंद से संबंधित माना जाता है। इसके अतिरिक्त परवर्ती चंद शासकों के समय के भी अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनमें दानपत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
- मंदिर एवं धार्मिक स्मारकचंदकालीन मंदिर इस काल की धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थिति के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। मंदिरों की स्थापत्य शैली, मूर्तिकला तथा उनसे संबंधित अभिलेखों से चंद शासकों के धार्मिक संरक्षण, कला एवं स्थापत्य परंपरा की जानकारी प्राप्त होती है।
- किले एवं महलचंद काल से संबंधित किले एवं महल तत्कालीन राजनीतिक एवं सैन्य व्यवस्था के भौतिक प्रमाण हैं। इनसे राजकीय शक्ति, सुरक्षा व्यवस्था, स्थापत्य कला तथा तत्कालीन निर्माण तकनीक के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
- नौले एवं जल-संरचनाएँकुमाऊँ में स्थित नौले एवं अन्य प्राचीन जल-संरचनाएँ तत्कालीन जल-प्रबंधन एवं लोककल्याण की परंपरा को समझने में सहायक हैं। इनके माध्यम से तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं तथा स्थापत्य-कौशल का भी पता चलता है।
- अन्य पुरातात्त्विक अवशेषमूर्तियाँ, स्थापत्य अवशेष, दुर्ग, राजप्रासाद तथा अन्य पुरातात्त्विक सामग्री चंदकालीन समाज, संस्कृति, धर्म और कला के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। ये साहित्यिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी की पुष्टि करने में भी सहायक होते हैं।
निष्कर्ष
कुमाऊँ के चंद वंश के इतिहास के अध्ययन में साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक दोनों प्रकार के स्रोतों का महत्वपूर्ण स्थान है। साहित्यिक स्रोतों में चंद वंशावली, मुस्लिम लेखकों के विवरण तथा परमार एवं नेपाल के ऐतिहासिक स्रोत चंद शासकों की वंशपरंपरा, राजनीतिक गतिविधियों, युद्धों और बाहरी संबंधों की जानकारी प्रदान करते हैं। दूसरी ओर, अभिलेख, ताम्रपत्र, मंदिर, किले, महल, नौले और अन्य पुरातात्त्विक अवशेष चंदकालीन प्रशासन, धर्म, कला, स्थापत्य और सामाजिक-आर्थिक जीवन के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। किसी एक स्रोत पर पूर्णतः निर्भर रहने के बजाय इन सभी स्रोतों का तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक अध्ययन करने से चंद वंश के इतिहास का अधिक प्रमाणिक और व्यापक स्वरूप सामने आता है।