कुमाऊँ परिषद के अधिवेशन (1917–1926)

परिचय

कुमाऊँ परिषद ने अपने विभिन्न अधिवेशनों के माध्यम से उत्तराखंड की क्षेत्रीय समस्याओं को राजनीतिक मंच प्रदान किया। इसके अधिवेशनों में कुली बेगार प्रथा, जंगलात संबंधी समस्याओं, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय आंदोलन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। इन बैठकों ने स्थानीय नेताओं को संगठित होकर ब्रिटिश शासन के समक्ष जनता की माँगें रखने का अवसर दिया। 1917 से 1926 के बीच आयोजित छह अधिवेशन कुमाऊँ परिषद की गतिविधियों और क्षेत्र में बढ़ती राजनीतिक चेतना के महत्वपूर्ण पड़ाव थे। अंततः 1926 में परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हो गया।

1. प्रथम अधिवेशन — अल्मोड़ा (सितंबर 1917)

  • कुमाऊं परिषद का पहला अधिवेशन सितंबर 1917 में अल्मोड़ा में हुआ।
  • इसकी अध्यक्षता अवकाश प्राप्त डिप्टी कलैक्टर जयदत्त जोशी ने की।
  • कुमाऊं परिषद के पहला अधिवेशन में ही कुमाऊं परिषद दो भागों/ विचारधाराओं में बँट गया गरमपंथी व नरमपंथी।
  • इस अधिवेशन में परिषद ने प्रचार प्रसार की योजना बनाई और इस हेतु लक्ष्मीदत्त शास्त्री को नियुक्त किया।
  • शास्त्री ने कुमाऊं परिषद का प्रचार-प्रसार तथा संगठन कुमाऊं के गांव-गांव में किया उन्हीं के प्रयत्नों का परिणाम था कि कुमाऊं परिषद ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोकप्रिय हो सकी।

2. द्वितीय अधिवेशन — हल्द्वानी (दिसंबर 1918)

  • कुमाऊं परिषद का दूसरा अधिवेशन दिसंबर 1918 में हल्द्वानी में आयोजित किया गया।
  • इसकी अध्यक्षता राय बहादुर तारा दत्त गैरोला द्वारा की गई।
  • इस अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि सरकार को यह नोटिस दिया जाये कि यदि 2 साल के अंदर ब्रिटिश सरकार कुली बेगार को बंद नहीं करेगी तो कुमाऊं की जनता सत्याग्रह करने के लिए मजबूर हो जाएगी।
  • तारादत्त गैरोला इस प्रस्ताव के विरुद्ध थे किंतु गढ़वाल से आये 7 प्रतिनिधियों ने भी तारादत्त गैरोला का साथ नहीं दिया। अतः बहुमत से यही प्रस्ताव पारित हुआ कि दो वर्ष बाद सत्याग्रह होगा।
  • कुमाऊं परिषद के प्रयासों के फलस्वरुप ब्रिटिश शासन को दिसंबर 1918 में कुली बेगार प्रथा की जांच हेतु एक समिति नियुक्त करने के लिए विवश होना पड़ा। तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर विंढम विंढम समिति के अध्यक्ष थे।
  • विंढम समिति ने 1919 में कुली बेगार के संबंध में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

3. तृतीय अधिवेशन — कोटद्वार (अक्टूबर 1919)

  • कुमाऊं परिषद का तीसरा अधिवेशन अक्टूबर 1919 में कोटद्वार में संपन्न हुआ।
  • इसके अध्यक्ष राय बहादुर बद्री दत्त जोशी थे व स्वागताध्यक्ष तारादत्त गैरोला थे।
  • इस अधिवेशन में भाग लेने वालों की संख्या 500 से अधिक थी।
  • इस अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में दो प्रस्ताव जंगलात तथा कुली उतार से संबंधित सबसे ज्वलन्त है।
  • जंगलात संबंधी प्रस्ताव प्रेमबल्लभ पांडे द्वारा व कुली उतार संबंधित प्रस्ताव मथुरा दत्त नैथाणी ने प्रस्तुत किया।
  • इस अधिवेशन में जलियांवाला बाग हत्याकांड का विरोध किया गया।
  • कोटद्वार अधिवेशन गुरु परंपरा के साथ-साथ हिंदू मुस्लिम एकता के लिए भी याद किया जाता है।
  • बद्रीदत्त पांडे को हिंदू-मुस्लिम एकता के कुमाऊं में प्रणेता के रूप में जाना जाता है।
  • गढ़वाल में होने वाला एकमात्र अधिवेशन।

4. चतुर्थ अधिवेशन — काशीपुर (दिसंबर 1920)

  • दिसंबर 1920 में कुमाऊं परिषद का चौथा अधिवेशन काशीपुर में हुआ।
  • इस अधिवेशन की अध्यक्षता हरगोविंद पंत द्वारा की गई।
  • इस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन पर चर्चा की गई और इस पर प्रस्ताव पारित किया गया.
  • साथ ही साथ जंगलात समस्या एवं बेगार प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रस्ताव रखे गए।
  • इस अधिवेशन के बाद बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में एक शिष्ट मण्डल गांधी जी से मिलने नागपुर कांग्रेस के अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए रवाना हुआ। कुमाऊं के नेताओं का मुख्य उद्देश्य गांधी जी को आमंत्रित करना था.
  • नागपुर में ही शिष्ट मंडल की मुलाकात स्वामी सत्यदेव से हुई और उन्हें भी कुली बेगार आंदोलन के लिए बागेश्वर आमंत्रित किया गया।
  • नागपुर का कांग्रेस अधिवेशन- अध्यक्षता सी. विजयराघवाचार्य
  • काशीपुर के चौथे अधिवेशन के बाद बद्रीदत्त पांडे, गोविंद बल्लभ पंत,लाला चिरंजीलाल आदि नेता नागपुर अधिवेशन में गये और गांधी जी को कुली बेगार कलंक समाप्त करने के लिए अल्मोड़ा आने को कहा। गांधी जी जल्दी में थे उन्होंने कहा – “मेरे कुर्मांचल भाइयों से कहना कुली बेगार नहीं देना होता है”।

5. पंचम अधिवेशन — टनकपुर (1923)

  • कुमाऊ परिषद का पांचवा अधिवेशन 1923 में टनकपुर में आयोजित किया गया।
  • इस आंदोलन की अध्यक्षता बद्रीदत्त पांडे ने की।

6. छठा अधिवेशन— गनियाद्योली, रानीखेत (1926)

  • 1926 में कुमाऊं परिषद का छठा हुआ, यह कुमाऊं परिषद का अंतिम अधिवेशन था.
  • गनियाद्योली,रानीखेत में होता है।
  • यह बैरिस्टर मुकंदीलाल के अध्यक्षता में हुआ।
  • 1926 में कुमाऊँ परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय कर दिया गया।

निष्कर्ष

कुमाऊँ परिषद के अधिवेशनों ने कुली बेगार, जंगलात और अन्य क्षेत्रीय समस्याओं को व्यापक राजनीतिक मंच प्रदान किया। इन बैठकों के माध्यम से स्थानीय नेताओं ने जनता को संगठित किया और राष्ट्रीय आंदोलन के साथ क्षेत्र का जुड़ाव मजबूत किया। 1926 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय के साथ परिषद की स्वतंत्र संगठनात्मक यात्रा समाप्त हुई।

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