बैजनाथ का कत्यूरी/कुमाऊँ का कातियूर राजवंश : जानकारी के स्रोत एवं संस्थापक |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
बैजनाथ के कत्यूरी अथवा कुमाऊँ के कातियूर राजवंश के इतिहास के पुनर्निर्माण में अभिलेखीय, पुरातात्विक तथा लोक-साहित्यिक स्रोतों का महत्वपूर्ण योगदान है। इस वंश के इतिहास की जानकारी मुख्यतः मूर्ति-लेखों, मंदिरों से प्राप्त अभिलेखों तथा जागर-गाथाओं से मिलती है। इन स्रोतों के आधार पर कत्यूरी शासकों के नाम, धार्मिक मान्यताओं, मंदिर निर्माण तथा वंश परंपरा की जानकारी प्राप्त होती है। वंश के संस्थापक के संबंध में भी विभिन्न मत मिलते हैं, जिनमें बद्रीदत्त पांडे का मत तथा अशांतिदेव से संबंधित प्रमाण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
जानकारी के प्रमुख स्रोत
- कुलसारी मूर्ति-लेख (चमोली) बैजनाथ के कातियूर राजवंश की जानकारी का महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है। इसमें वंश के नाम के साथ महाराजा जतबालदेव का उल्लेख मिलता है।
- कुलसारी मूर्ति-लेख से ज्ञात होता है कि जतबालदेव वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उसने कुलसारी स्थित मंदिर में लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा स्थापित कराई थी।
- परंपरा के अनुसार जतबालदेव ने बद्रीनाथ यात्रा के दौरान कुलसारी में इस धार्मिक निर्माण/स्थापना का कार्य कराया था। इससे उसके धार्मिक झुकाव तथा क्षेत्र में वैष्णव परंपरा के प्रभाव की जानकारी मिलती है।
- कुलसारी मूर्ति-लेख में ‘कातियूर’ शब्द का उल्लेख मिलता है, जो इस राजवंश की पहचान और नाम-परंपरा के अध्ययन में महत्वपूर्ण माना जाता है।
- बड़ादित्य मंदिर (कटारमल मंदिर), अल्मोड़ा कातियूर राजवंश के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्रोत है। इसका निर्माण कातियूरवंशी शासक कटारमल देव से संबंधित माना जाता है।
- कटारमल मंदिर परिसर से तीन लघु अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये अभिलेख मंदिर तथा तत्कालीन राजवंश के इतिहास के अध्ययन में सहायक हैं।
- जागर गाथाएँ भी कुमाऊँ के कातियूर राजवंश के इतिहास की महत्वपूर्ण लोक-साहित्यिक स्रोत हैं। इनमें धामदेव, ब्रह्मदेव, जियारानी आदि से संबंधित कथाओं एवं घटनाओं का वर्णन मिलता है।
- जागर-गाथाएँ तत्कालीन राजाओं और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की लोकपरंपरागत स्मृति को सुरक्षित रखती हैं, किंतु इनमें ऐतिहासिक तथ्यों के साथ लोकविश्वास एवं किंवदंतियाँ भी मिश्रित हैं। इसलिए इनका उपयोग अन्य प्रमाणों के साथ सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।
कातियूर वंश का संस्थापक
- बद्रीदत्त पांडे ने शालिवाहन को कातियूर वंश का मूल पुरुष/आदि पुरुष माना है। यह मत कुमाऊँ के इतिहास की परंपरागत व्याख्याओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
- दूसरी ओर, उपलब्ध अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर अशांतिदेव को कातियूर वंश के संस्थापक के रूप में अधिक प्रमाणिक माना जाता है। इसलिए ऐतिहासिक प्रमाणों की दृष्टि से अशांतिदेव का मत अधिक महत्वपूर्ण है।
- इस प्रकार शालिवाहन से संबंधित मत को परंपरागत मत, जबकि अशांतिदेव से संबंधित मत को अधिक प्रमाण-आधारित मत के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
निष्कर्ष
बैजनाथ के कत्यूरी अथवा कुमाऊँ के कातियूर राजवंश के इतिहास के अध्ययन के लिए कुलसारी मूर्ति-लेख, कटारमल मंदिर के अभिलेख और जागर-गाथाएँ प्रमुख स्रोत हैं। कुलसारी लेख से जतबालदेव, उसके वैष्णव धर्म से संबंध तथा ‘कातियूर’ शब्द के प्रयोग की जानकारी मिलती है, जबकि कटारमल मंदिर कातियूर शासक कटारमल देव की स्थापत्य परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करता है। जागर-गाथाएँ धामदेव, ब्रह्मदेव और जियारानी जैसे पात्रों के माध्यम से इस वंश की लोकस्मृति को सुरक्षित रखती हैं, हालांकि इनके उपयोग में ऐतिहासिक और लोकपरंपरागत तत्वों का अंतर करना आवश्यक है। संस्थापक के संबंध में बद्रीदत्त पांडे द्वारा शालिवाहन को मूल पुरुष मानने का मत मिलता है, किंतु अभिलेखीय प्रमाणों की दृष्टि से अशांतिदेव का मत अधिक प्रमाणिक माना जाता है।