अस्कोट शाखा |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
वर्तमान पिथौरागढ़ जनपद का अस्कोट परवर्ती कात्यूरी काल की एक महत्वपूर्ण शाखा का केंद्र था। यहाँ के शासक ‘रजबार’ की उपाधि धारण करते थे और आगे चलकर पाल शासकों के रूप में प्रसिद्ध हुए। अस्कोट शाखा के संस्थापक को लेकर इतिहासकारों में मतभेद मिलता है। अस्कोट राजावली अभयपाल को संस्थापक मानती है, जबकि उपलब्ध अभिलेखीय प्रमाण नागमल्ल को अधिक प्राचीन शासक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
प्रमुख तथ्य
- वर्तमान पिथौरागढ़ जनपद के अस्कोट के शासक कातियूर शाखा से संबंधित माने जाते हैं और वे ‘रजबार’ कहलाते थे।
- अस्कोट राजावली के अनुसार, त्रिलोकपाल के पुत्र अभयपाल ने 1276 ई. में कत्यूर से आकर अस्कोट राज्य की स्थापना की।
- इसके विपरीत, अस्कोट पालवंश के शोधकर्ता डॉ. दीपचन्द चौधरी के अनुसार राज्य की स्थापना नागमल्ल (पाल) ने की थी।
- नागमल्ल के पक्ष में शाके 1160 (1238 ई.) का अकु-शिलालेख महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
- भारतीपाल के घुनसेरा ताम्रपत्र, शाके 1316 (1394 ई.) में नागमल्ल तथा विक्रमपाल को पूर्ववर्ती शासकों के रूप में स्वीकार किया गया है।
- 1238 से 1623 ई. तक के आठ अभिलेखों में नागमल्ल, निर्भयपाल/निरैपाल, भारतीपाल, तिलकपाल, कल्याणपाल तथा महेन्द्रपाल आदि रजबारों के नाम मिलते हैं।
- रुद्रचन्द की सीरा विजय के बाद अस्कोट उसके अधीन एक माण्डलिक राज्य बन गया।
- 1624 ई. के बाद अस्कोट के पाल शासक चन्दों के अधीन हो गए।
निष्कर्ष
अस्कोट शाखा का इतिहास परवर्ती कात्यूरी सत्ता की दीर्घकालीन क्षेत्रीय निरंतरता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसके संस्थापक के संबंध में अभयपाल और नागमल्ल से जुड़े दो प्रमुख मत मिलते हैं, किंतु 1238 ई. का नागमल्ल का अभिलेखीय प्रमाण विशेष महत्व रखता है। विभिन्न ताम्रपत्रों में रजबारों के नाम मिलने से इस शाखा की दीर्घ राजनीतिक परंपरा प्रमाणित होती है। अंततः रुद्रचन्द के विस्तार के बाद अस्कोट चन्दों का माण्डलिक राज्य बना और उसकी स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति समाप्त हो गई।