सुभिक्षराज|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
पदमदेव के पश्चात उसका पुत्र सुभिक्षराज देव कार्तिकेयपुर राज्य की राजगद्दी पर बैठा। वह तृतीय परिवार अर्थात् सलोणादित्य वंश का अंतिम शासक तथा कार्तिकेयपुर राजवंश का भी अंतिम शासक माना जाता है। सुभिक्षराज एक दानी एवं धार्मिक शासक था। उसने राज्य की राजधानी कार्तिकेयपुर से हटाकर सुभिक्षपुर में स्थापित की। धार्मिक दृष्टि से वह विष्णु का परम भक्त था और उसके व्यक्तित्व में वैष्णव धर्म के प्रति विशेष निष्ठा दिखाई देती है।
सुभिक्षराज
- पदमदेव के पश्चात उसका पुत्र सुभिक्षराज देव कत्यूरी वंश का शासक बना।
- सुभिक्षराज ने ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी।
- वह एक दानशील शासक था तथा उसने अनेक मंदिरों को भूमि दान में प्रदान की।
- सुभिक्षराज ने कार्तिकेयपुर राज्य की राजधानी कार्तिकेयपुर से स्थानांतरित करके सुभिक्षपुर में स्थापित की।
- कालांतर में उसके वंशज नरसिंहदेव द्वारा राजधानी को पुनः बैजनाथ-कार्तिकेयपुर में स्थानांतरित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
- सुभिक्षराज को तृतीय परिवार अर्थात् सलोणादित्य वंश का अंतिम शासक माना जाता है।
- सुभिक्षराज को कार्तिकेयपुर राजवंश का अंतिम शासक भी माना जाता है।
- धार्मिक दृष्टि से सुभिक्षराज भगवान विष्णु का परम भक्त था।
- उसे ‘परम वैष्णव’ की उपाधि से विभूषित किया गया है, जो उसकी वैष्णव धार्मिक आस्था को स्पष्ट करती है।
- सुभिक्षराज को ‘परम ब्रह्मण’ भी कहा गया है, जिससे उसकी धार्मिक प्रतिष्ठा का संकेत मिलता है।
- उसके शासनकाल में दान एवं मंदिर संरक्षण की परंपरा जारी रही, जिससे धार्मिक संस्थाओं के प्रति उसके संरक्षण की भावना स्पष्ट होती है।
- सुभिक्षराज के शासन के साथ कार्तिकेयपुर राजवंश की पारंपरिक सत्ता का अंत माना जाता है और इसके बाद कत्यूरी सत्ता के इतिहास में एक नए चरण का विकास हुआ।
निष्कर्ष
सुभिक्षराज तृतीय कत्यूरी परिवार के अंतिम तथा महत्वपूर्ण शासकों में था। उसके शासनकाल में राजनीतिक सत्ता के साथ-साथ धार्मिक गतिविधियों को भी संरक्षण प्राप्त हुआ। उसने ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ जैसी उच्च राजकीय उपाधि धारण की तथा मंदिरों को भूमि दान देकर अपनी दानशीलता का परिचय दिया। उसकी सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि कार्तिकेयपुर से राजधानी को सुभिक्षपुर स्थानांतरित करना थी। धार्मिक रूप से वह भगवान विष्णु का परम भक्त था और ‘परम वैष्णव’ तथा ‘परम ब्रह्मण’ के रूप में वर्णित किया गया है। उसे सलोणादित्य वंश तथा कार्तिकेयपुर राजवंश का अंतिम शासक माना जाता है।