चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति (PGW)|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति (Painted Grey Ware Culture—PGW) उत्तर भारत की एक महत्वपूर्ण आद्य-ऐतिहासिक संस्कृति है। इसकी पहचान मुख्यतः महीन, पतले एवं धूसर रंग के मृद्भाण्डों पर काले रंग से किए गए चित्रांकन से होती है। इसका प्रमुख प्रसार ऊपरी गंगा-यमुना घाटी और उससे जुड़े उत्तर भारतीय क्षेत्रों में रहा। इसे उत्तर भारत में प्रारंभिक लौह-प्रयोग के विकास से भी जोड़ा जाता है। इतिहासविद् बी. बी. लाल ने PGW संस्कृति का संबंध महाभारतकालीन संस्कृति से स्थापित करने का प्रयास किया है।

प्रमुख तथ्य

  • चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति का विकास ताम्र संस्कृति के पश्चात् उत्तर भारत में हुआ माना जाता है।
  • इसके मृद्भाण्ड सामान्यतः धूसर रंग के, महीन एवं पतले होते हैं।
  • इन मृद्भाण्डों पर मुख्यतः काले रंग से चित्रांकन किया गया है।
  • मृद्भाण्डों पर क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर रेखाएँ, बिन्दु, वृत्त, तरंगें तथा विभिन्न ज्यामितीय आकृतियाँ प्रमुख हैं
  • चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति के प्रमुख मृद्भाण्डों में कटोरे, तस्तरियाँ एवं अन्य घरेलू पात्र शामिल हैं।
  • चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति का प्रमुख क्षेत्र ऊपरी गंगा-यमुना घाटी रहा है।
  • इस संस्कृति को उत्तर भारत में प्रारंभिक लौह युग एवं लौह-प्रयोग के प्रसार से संबंधित माना जाता है।
  • चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति के अनेक स्थलों से घोड़े के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • इतिहासविद् बी. बी. लाल ने चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति का साम्य महाभारतकालीन संस्कृति से स्थापित किया है।
  • चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति उत्तर भारत में मृद्भाण्ड तकनीक, लौह-प्रयोग तथा तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक विकास को समझने का महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्रोत है।

उत्तराखण्ड में चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति

उत्तराखण्ड में चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (PGW) संस्कृति के साक्ष्य परवर्ती आद्य-ऐतिहासिक काल में यहाँ की नदी घाटियों में विकसित व्यापक सांस्कृतिक संपर्कों को दर्शाते हैं। इसके प्रमाण मुख्यतः अलकनन्दा, यमुना-कमल तथा पश्चिमी रामगंगा घाटियों से प्राप्त हुए हैं। उत्तराखण्ड में PGW संस्कृति का महत्व विशेष रूप से मृद्भाण्ड परंपरा, कृषि, पशुपालन तथा लौह-युगीन सांस्कृतिक संक्रमण को समझने के संदर्भ में है।

मुख्य तथ्य व विशेषताये

  • ऊपरी गंगा घाटी में ताम्र संस्कृति के पश्चात् चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (PGW) संस्कृति का उद्भव हुआ। उत्तराखण्ड के परवर्ती आध्य-ऐतिहासिक काल के लोग पी०जी०डब्ल्यू० का प्रयोग करते थे।
  • इसके साक्ष्य क्रमशः अलकनन्दा घाटी में थापली(खोज -केपी नौटियाल ), कमल-यमुना घाटी में पुरोला(खोज – के पी नौटियाल एवं बी एम खंडूरी ) एवं पश्चिमी रामगंगा घाटी से प्राप्त हुए हैं। अतः स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में भी लौह के प्रयोग का श्रेय चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति के लोगों को जाता है।
  • अलकनंदा घाटी,श्रीनगर, टिहरी गढ़वाल के निकट थापली नामक स्थान से मिली तस्तरियाँ, कटोरे, जार इत्यादि मिले हैं जिन पर काले रंग से क्षैतिज एवं अनुलम्ब रेखाएँ, सूर्य प्रतीक, बिन्दु, तरंगें, पत्ते एवं वानस्पतिक आकृतियों आदि का चित्रांकन है। भूसी-चिह्नित (Husk Marked) टीकरों की प्राप्ति यहाँ धान की खेती के प्रमाण प्रस्तुत करती है। यद्यपि यहाँ से कोई लौह का उपकरण नहीं मिला है। यहाँ से पी०जी०डब्ल्यू० के साथ टेराकोटा, चित्रित पक्षी, सूअर, अश्व जैसे पशुओं के दन्त अवशेष, ताम्र के कुड़े, छलाकार एवं नखवर्तकी भी प्राप्त हुए हैं।
  • जबकि पुरोला से लोहित एवं कृष्णलेपित भाण्ड, साधारण धूसर एवं लोहित भाण्ड, टेराकोटा सिंह, वृषभ, चक्र, चकती, घट आकार का मनका आदि प्रमुख हैं। यद्यपि यहाँ धातु उपकरणों का नितान्त अभाव मिलता है।
  • इतिहासविद् बी०बी० लाल महोदय ने इस चित्रित धूसर संस्कृति का साम्य महाभारत काल से स्थापित किया है।
  • भारत मे चित्रित धूसर संस्कृतियों वाले स्थानों मे घोड़े के अवशेष प्रमुख रूप से पाये जाते है।
  • उत्तर भारत की तरह उत्तराखंड क्षेत्र मे भी चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति को लौह युग प्रचलन का श्रेय जाता है।

निष्कर्ष

उत्तराखंड में चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति के साक्ष्य इस बात को स्पष्ट करते हैं कि हिमालयी क्षेत्र प्राचीन काल में उत्तर भारत की व्यापक सांस्कृतिक एवं तकनीकी गतिविधियों से अलग-थलग नहीं था। थापली, पुरोला तथा पश्चिमी रामगंगा घाटी जैसे स्थलों से प्राप्त मृद्भाण्ड, टेराकोटा, पशु-अवशेष तथा अन्य पुरातात्त्विक सामग्री तत्कालीन जीवन-शैली, कृषि एवं पशुपालन तथा सांस्कृतिक संपर्कों की जानकारी प्रदान करती है। विशेष रूप से PGW परंपरा को लौह-युगीन परिवर्तन और तकनीकी विकास के व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। यद्यपि उत्तराखण्ड के सभी PGW स्थलों से लौह उपकरण प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त नहीं हुए हैं, फिर भी इन साक्ष्यों का व्यापक उत्तर भारतीय संदर्भ में अध्ययन महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, उत्तराखण्ड में PGW संस्कृति केवल विशिष्ट मृद्भाण्डों की परंपरा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सांस्कृतिक संपर्क, आर्थिक गतिविधियों और आद्य-ऐतिहासिक समाज में हो रहे व्यापक परिवर्तनों को समझने का महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्रोत है।

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