सिंहपुर का यदु/यादव राजवंश|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
सिंहपुर का यदु अथवा यादव राजवंश उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में यमुना घाटी की एक महत्वपूर्ण स्थानीय राजसत्ता थी। इस वंश की जानकारी मुख्यतः रानी ईश्वरा की लाखामण्डल-प्रशस्ति से प्राप्त होती है। प्रशस्ति में वंश की ग्यारह पीढ़ियों के बारह नृपतियों का उल्लेख मिलता है, जिससे इसकी दीर्घकालीन राजनीतिक परंपरा का संकेत मिलता है। सिंहपुर को इस वंश की राजधानी बताया गया है, जिसकी पहचान वर्तमान लाखामण्डल क्षेत्र से की जाती है। यह वंश उत्तराखण्ड के उत्तर-गुप्तकालीन राजनीतिक इतिहास को समझने में विशेष महत्व रखता है।
सिंहपुर का यदु/यादव राजवंश प्रमुख बिंदु
- सिंहपुर के यदुवंशीय राजाओं का ज्ञान मुख्यतः रानी ईश्वरा की लाखामण्डल-प्रशस्ति से प्राप्त होता है।
- प्रशस्ति की लिपि के आधार पर बूहलर ने इसे 7वीं शती ईस्वी का, जबकि कीलहॉर्न ने लगभग 7वीं शती ईस्वी के अंत का माना है। साहनी एवं जायसवाल इसे 6वीं शती ईस्वी में रखते हैं।
- प्रशस्ति में इस राजवंश की ग्यारह पीढ़ियों के बारह नृपतियों के नाम मिलते हैं।
- इन शासकों की राजनीतिक स्थिति प्राक्-गुप्तकाल से कम-से-कम हर्षवर्धन के काल तक बनी रहने की संभावना व्यक्त की जाती है।
- श्री-सेनवर्मन् को सिंहपुर के यदु राजवंश का संस्थापक माना जाता है। उसकी राजधानी यमुना प्रदेश का सिंहपुर थी।
- सेनवर्मन् के राज्यारोहण काल के संबंध में मतभेद हैं। बूहलर ने इसे चौथी शती ईस्वी के आरंभ में, जबकि जायसवाल ने लगभग 250 ईस्वी के आसपास माना है।
- लाखामण्डल-प्रशस्ति में सिंहपुर को यदुओं की राजधानी के रूप में बताया गया है।
- लाखामण्डल प्रशस्ति में उल्लिखित सिंहपुर की पहचान वर्तमान देहरादून जनपद के लाखामण्डल (पुराना मढ़) से की जाती है।
- उत्तर-गुप्तकाल में, लगभग 7वीं शती ईस्वी के अंत में, श्री-भास्करवर्मन् की पुत्री रानी ईश्वरा ने अपने पति जालन्धर के राजकुमार श्री-चन्द्रगुप्त की स्मृति में लाखामण्डल में शिव मंदिर का निर्माण कराया।
- इसी अवसर पर रानी ईश्वरा ने लाखामण्डल-प्रशस्ति खुदवाई, जो इस राजवंश के इतिहास का प्रमुख स्रोत है।
- प्रशस्ति में श्री-भास्करवर्मन् के लिए ‘रिपुघाघल’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका आशय शत्रुओं के लिए वीर योद्धा/शत्रु-संहारक से लिया जाता है।
- रानी ईश्वरा का अभिलेख केवल वंशावली ही नहीं, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक संबंधों, वैवाहिक संबंधों तथा धार्मिक गतिविधियों की भी जानकारी प्रदान करता है।
- लाखामण्डल का यह अभिलेख उत्तराखण्ड में स्थानीय राजवंशों के निरंतर विकास और उत्तर-गुप्तकालीन राजनीतिक संरचना को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है।
निष्कर्ष
सिंहपुर का यदु/यादव राजवंश उत्तराखण्ड के प्राचीन एवं उत्तर-गुप्तकालीन इतिहास की महत्वपूर्ण राजनीतिक कड़ी था। रानी ईश्वरा की लाखामण्डल-प्रशस्ति इस वंश की वंशावली, राजधानी तथा राजनीतिक परंपरा की जानकारी का प्रमुख आधार है। श्री-सेनवर्मन् को इसका संस्थापक तथा सिंहपुर को राजधानी माना जाता है। ग्यारह पीढ़ियों के बारह राजाओं का उल्लेख इस वंश की दीर्घकालीन सत्ता को दर्शाता है। लाखामण्डल से जुड़ी यह परंपरा यमुना घाटी के राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने में विशेष महत्व रखती है।