1884–1948 ई. के प्रमुख कमिश्नर एवं समकालीन घटनाएँ
परिचय
हेनरी रैम्जे के बाद भी कुमाऊँ कमिश्नरी में ब्रिटिश अधिकारियों की नियुक्ति जारी रही। 1884 ई. से 1947 ई. तक विभिन्न अंग्रेज कमिश्नरों ने कुमाऊँ तथा संबंधित पर्वतीय क्षेत्रों का प्रशासन संभाला। इस अवधि में उत्तराखण्ड के इतिहास में अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं, जैसे नैनीताल जनपद का गठन, गढ़वाल राइफल्स की स्थापना, कांग्रेस आंदोलन का प्रभाव, कुमाऊँ परिषद का गठन, कुली-बेगार प्रथा का अंत, वन आंदोलनों का विकास, पेशावर एवं रवाई कांड तथा स्वतंत्रता आंदोलन। 1947 के बाद प्रशासन की कमान भारतीय अधिकारियों के हाथों में आई।
प्रमुख कमिश्नर एवं उनके समय की महत्वपूर्ण घटनाएँ
फिशर (1884–1885 ई.)
- फिशर हेनरी रैम्जे के बाद कुमाऊँ के कमिश्नर बने।
- उनका कार्यकाल 1884–1885 ई. तक रहा।
एच. जी. रोस (1885–1887 ई.)
- एच. जी. रोस का कार्यकाल 1885–1887 ई. रहा।
- 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना हुई।
- 1887 ई. में गढ़वाल राइफल्स की स्थापना हुई।
जे. आर. ग्रिग (1887–1889 ई.)
- जे. आर. ग्रिग ने 1887–1889 ई. तक कमिश्नर के रूप में कार्य किया।
- 1889 ई. में हथियार रखने के लिए लाइसेंस नीति लागू की गई।
जी. ई. आर्सकिन (1889–1892 ई.)
- जी. ई. आर्सकिन का कार्यकाल 1889–1892 ई. रहा।
- 1891 ई. में नैनीताल जनपद का गठन किया गया।5. डी. टी. रॉबर्ट्स (1892–1894 ई.)
- डी. टी. रॉबर्ट्स ने 1892–1894 ई. तक कार्य किया।
- 1893 ई. में मुक्तेश्वर में पशु अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई।
- 1894 ई. में वन नीति लागू की गई।
ई. ई. ग्रिज
- ई. ई. ग्रिज के समय 1897 ई. में पहली बार पृथक उत्तराखण्ड प्रांत की मांग महारानी विक्टोरिया के समक्ष रखे जाने का उल्लेख मिलता है।
आर. ई. हैंम्बलिन (1899–1902 ई.)
- आर. ई. हैंम्बलिन का कार्यकाल 1899–1902 ई. रहा।
- 1899–1900 ई. में दून घाटी में रेल का आगमन हुआ।
- 1901 ई. में गढ़वाल यूनियन की स्थापना हुई।
- 1902–03 ई. में नैनीताल जेल की स्थापना हुई।
ए. एम. डब्ल्यू. शैक्सपियर (1903–1905 ई)
- ए. एम. डब्ल्यू. शैक्सपियर ने 1903–1905 ई. तक कार्य किया।
- 1905 ई. में प्रथम गढ़वाली समाचार-पत्र के प्रकाशन का उल्लेख मिलता है।
जे. एम. कैम्पबेल (1906–1913 ई.)
- जे. एम. कैम्पबेल का कार्यकाल 1906–1913 ई. रहा।
- 1906 ई. में ग्लोगी परियोजना का कार्य पूरा हुआ। इसे देश की प्रारंभिक जलविद्युत परियोजनाओं में माना जाता है।
- 1908 ई. में कुली एजेंसी की स्थापना जोध सिंह नेगी द्वारा की गई।
- 1909 ई. में कुमाऊँ गवर्नमेंट गार्डन की स्थापना हुई।
- 1912 ई. में अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना का उल्लेख मिलता है।
पी. विंढम (1914–1924 ई.)
- पी. विंढम का कार्यकाल 1914–1924 ई. रहा।26. 1915 ई. में महात्मा गांधी ने पहली बार हरिद्वार की यात्रा की।
- 1916 ई. में गांधीजी ने देहरादून की यात्रा की।
- 30 सितंबर 1916 ई. को कुमाऊँ परिषद की स्थापना हुई।
- 1917 ई. में पहला वाटर रूल्स जारी किया गया।
- 1921 ई. में कुली-बेगार प्रथा का अंत हुआ।
- 1921 ई. में फॉरेस्ट ग्रीवेंस कमेटी का गठन किया गया।
- 1923 ई. में कुली एजेंसी समाप्त कर दी गई।
एन. सी. स्टिफ (1925–1931 ई.)
- एन. सी. स्टिफ ने 1925–1931 ई. तक कार्य किया।
- 1929 ई. में महात्मा गांधी ने कुमाऊँ की यात्रा की।
- इस यात्रा के दौरान उन्होंने हल्द्वानी, अल्मोड़ा, बागेश्वर और कौसानी आदि स्थानों पर सभाएँ कीं।
- 23 अप्रैल 1930 ई. को पेशावर कांड हुआ।
- 30 मई 1930 ई. को टिहरी रियासत में रवाई कांड हुआ।
ए. डब्ल्यू. इवटसन (1935–1939 ई.)
- ए. डब्ल्यू. इवटसन का कार्यकाल 1935–1939 ई. रहा।
- 1937 ई. में चनौदा में शांतिलाल त्रिवेदी ने गांधी आश्रम की स्थापना की।
एक्टन (1941–1943 ई.)
- एक्टन ने 1941–1943 ई. तक कार्य किया।
- उसके कार्यकाल के दौरान 1942 ई. का भारत छोड़ो आंदोलन हुआ।
डब्ल्यू. डब्ल्यू. फिनले (1943–1947 ई.)
- डब्ल्यू. डब्ल्यू. फिनले का कार्यकाल 1943–1947 ई. रहा।
- उन्हें कुमाऊँ का अंतिम अंग्रेज कमिश्नर माना जाता है।
के. एल. मेहता (1947–1948 ई.)
- स्वतंत्रता के बाद के. एल. मेहता कुमाऊँ के कमिश्नर बने।
- उन्हें कुमाऊँ का प्रथम भारतीय कमिश्नर माना जाता है।
निष्कर्ष
1884 ई. के बाद कुमाऊँ कमिश्नरी का प्रशासन लगातार अंग्रेज अधिकारियों के हाथों में रहा और इस दौरान उत्तराखण्ड के सामाजिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक इतिहास में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। 1891 में नैनीताल जनपद का गठन, 1887 में गढ़वाल राइफल्स की स्थापना, 1916 में कुमाऊँ परिषद का गठन, 1921 में कुली-बेगार प्रथा का अंत तथा 1930 में पेशावर एवं रवाई कांड जैसी घटनाओं ने क्षेत्र की राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया। 1920–40 के दशक में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव उत्तराखण्ड में भी बढ़ा। अंततः 1947 में स्वतंत्रता के बाद के. एल. मेहता प्रथम भारतीय कमिश्नर बने और ब्रिटिश कमिश्नरी व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण चरण का अंत हुआ।