सर हेनरी रैम्जे (1856–1884 ई.)

परिचय

सर हेनरी रैम्जे ब्रिटिश कुमाऊँ के सबसे प्रसिद्ध एवं लंबे समय तक कार्य करने वाले कमिश्नरों में से एक थे। उन्होंने कुमाऊँ के विभिन्न प्रशासनिक पदों पर लगभग 44 वर्ष कार्य किया, जिनमें लगभग 28 वर्ष कमिश्नर के रूप में रहे। स्थानीय लोगों के साथ उनके व्यवहार, पहाड़ी बोली के ज्ञान तथा ग्रामीण जीवन से निकटता के कारण उन्हें “रामजी साहब”, “कुमाऊँ का बेताज बादशाह” तथा “मुकुटरहित राजा” कहा गया। उनके कार्यकाल में शिक्षा, तराई-भाबर विकास, वन संरक्षण, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य तथा प्रशासन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य हुए। 1857 के विद्रोह के समय भी वे कुमाऊँ के कमिश्नर थे।

सर हेनरी रैम्जे के प्रमुख कार्य एवं घटनाएँ

  • सर हेनरी रैम्जे ने कुमाऊँ के विभिन्न पदों पर लगभग 44 वर्ष तक कार्य किया, जिसमें लगभग 28 वर्ष कमिश्नर के रूप में रहे।
  • वे कुमाऊँ के सबसे लंबे समय तक कार्य करने वाले कमिश्नर माने जाते हैं।
  • रैम्जे कुमाऊँ के सबसे लोकप्रिय कमिश्नरों में से एक थे।
  • हेनरी रैम्जे मूल रूप से स्कॉटलैंड के निवासी थे तथा भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी (1848–1856) के चचेरे भाई थे।
  • रैम्जे का विवाह पूर्व कमिश्नर जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन की पुत्री से हुआ था।
  • 1884 ई. में सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे 1892 ई. तक अल्मोड़ा में रहे।
  • कुमाऊँ में उन्हें “रामजी साहब”, “कुमाऊँ का बेताज बादशाह” तथा “मुकुटरहित राजा” कहा जाता था।
  • तराई-भाबर क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के कारण उन्हें “तराई-भाबर का विश्वकर्मा/निर्माता” भी कहा जाता है।
  • रैम्जे पहाड़ी बोली बोलते थे और स्थानीय किसानों एवं मजदूरों के साथ घुल-मिलकर रहते थे। उनके संबंध में यह भी प्रसिद्ध है कि वे ग्रामीणों के साथ मंडवे की रोटी तक खा लेते थे।
  • रैम्जे ने नैनीताल को स्कूली शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • नैनीताल में उनके काल में विभिन्न शिक्षण संस्थाओं का विकास हुआ। इनमें मिशन स्कूल (1850), शेरवुड कॉलेज (1867), ऑल सेंट्स कॉलेज (1869), स्टोनले स्कूल (1877), सेंट मैरीज कॉन्वेंट (1878), वैलेजली हाईस्कूल (1884) तथा सेंट जोसेफ कॉलेज (1888) का उल्लेख किया जाता है।
  • तराई-भाबर के विकास के लिए रैम्जे ने नहरों का जाल विकसित कराया।
  • 1883 ई. में तराई इम्प्रूवमेंट फंड की स्थापना की गई। इस निधि से सड़कों एवं पुलों की मरम्मत आदि कार्य कराए गए।
  • रैम्जे के कार्यकाल में तराई क्षेत्र का व्यापक विकास हुआ।
  • 1867 ई. में हिल साइड सेफ्टी कमेटी का गठन किया गया। इसका उद्देश्य भूस्खलन के कारणों का अध्ययन करना तथा पर्वतीय क्षेत्रों को सुरक्षित रखने के उपाय करना था।
  • रैम्जे के कार्यकाल में 1867, 1869 और 1880 ई. में नैनीताल में भूस्खलन की घटनाएँ हुईं।
  • 18 सितंबर 1880 ई. का नैनीताल भूस्खलन अत्यंत विनाशकारी था। इसमें 151 लोगों की मृत्यु हुई तथा नैना देवी मंदिर भी क्षतिग्रस्त हुआ।
  • 1880 के भूस्खलन के बाद प्रशासन द्वारा निकासी नालियों (drainage system) के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया गया।
  • पर्वतीय आपदाओं से निपटने के प्रारंभिक प्रशासनिक प्रयासों का श्रेय हेनरी रैम्जे को दिया जाता है।
  • रैम्जे ने कुष्ठ रोगियों की स्थिति पर भी ध्यान दिया। उनके रहने की व्यवस्था के लिए गणेश की गैर नामक स्थान का उल्लेख मिलता है।
  • 1854 ई. में अल्मोड़ा में कुष्ठ आश्रम स्थापित किया गया।
  • 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय हेनरी रैम्जे कुमाऊँ के कमिश्नर थे।
  • 1857 के विद्रोह के दौरान कुमाऊँ में मार्शल लॉ न्यायालयों की स्थापना की गई।
  • 1857 के विद्रोह के समय नैनीताल के फाँसी गधेरे में क्रांतिकारियों को फाँसी दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • विद्रोह के समय रैम्जे ने नेपाल से रनवीर सेवा के रूप में सैनिक सहयोग प्राप्त किया, जिससे कुमाऊँ में ब्रिटिश शासन को बनाए रखने में सहायता मिली।
  • रैम्जे की कार्यकुशलता को देखते हुए एटकिंसन ने उन्हें कुमाऊँ का प्रथम कंजरवेटर (वन संरक्षक) कहा है।
  • रैम्जे ने 1858 ई. में ठेकेदारी प्रथा समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया।
  • 1861 ई. में जंगलात बंदोबस्त कराया गया।
  • रैम्जे 1868 ई. तक कुमाऊँ के वन संरक्षक भी रहे।30. कुमाऊँ में वन संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का श्रेय रैम्जे को दिया जाता है।
  • वृक्षों की कटाई से पहले उन पर मार्किंग/निशान लगाने की व्यवस्था रैम्जे ने प्रारंभ की।
  • रैम्जे ने वन क्षेत्रों के भीतर कृषि करने पर रोक लगाने के प्रयास किए।
  • वनों को आग से बचाने के लिए भी रैम्जे ने प्रारंभिक स्तर पर आवश्यक कदम उठाए।
  • रैम्जे के कार्यकाल में पादरी विलियम बटलर ने 1858 ई. में नैनीताल में भारत का पहला मैथोडिस्ट चर्च स्थापित किया।
  • 1874 ई. में उत्तराखण्ड में राजस्व पुलिस व्यवस्था को व्यवस्थित रूप मिला। इसे स्थानीय संदर्भ में “गांधी पुलिस” भी कहा जाता है।
  • जसुली दताल/जसुली सौक्याणी ने रैम्जे के सहयोग से दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में धर्मशालाओं के निर्माण का कार्य प्रारंभ कराया।
  • जसुली देवी को उनके दान एवं जनसेवा के कारण “दानवीर जसुली देवी” के नाम से जाना जाता है।
  • तीर्थयात्रा मार्गों पर धर्मशालाओं का निर्माण कराने वाली प्रसिद्ध उत्तराखण्डी महिला के रूप में जसुली देवी का नाम लिया जाता है।
  • पादरी डॉ. जॉर्ज स्मिथ ने रैम्जे को भारत के प्रमुख राजनीतिज्ञों में स्थान दिया था। रैम्जे की ईसाई मिशनरियों के प्रति सहानुभूति तथा धर्म-प्रचार संबंधी गतिविधियों का उल्लेख कुछ लेखकों ने किया है।
  • ब्रिटिश लेखकों द्वारा रैम्जे को “कुमाऊँ का राजा” कहा गया, जबकि बद्रीदत्त पांडे ने उनकी नीतियों की आलोचना करते हुए उन्हें “कुमाऊँ का कैंसर” कहा।
  • 1874 ई. का अधिसूचित जिला अधिनियम (Scheduled Districts Act) रैम्जे के कार्यकाल की महत्वपूर्ण प्रशासनिक पृष्ठभूमि से संबंधित था।

निष्कर्ष

सर हेनरी रैम्जे का कार्यकाल ब्रिटिश कुमाऊँ के इतिहास का एक महत्वपूर्ण एवं दीर्घकालीन चरण था। उन्होंने प्रशासन के साथ-साथ शिक्षा, चिकित्सा, वन संरक्षण, तराई-भाबर विकास, सड़क एवं सिंचाई तथा आपदा प्रबंधन के क्षेत्रों में कार्य किया। स्थानीय समाज के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों और पहाड़ी भाषा के ज्ञान के कारण वे अत्यंत लोकप्रिय हुए तथा उन्हें “रामजी साहब”, “कुमाऊँ का बेताज बादशाह” और “मुकुटरहित राजा” कहा गया। दूसरी ओर, उनकी नीतियों की आलोचना भी हुई और कुछ राष्ट्रवादी लेखकों ने उनके शासन को कठोर एवं औपनिवेशिक हितों वाला माना। इसलिए रैम्जे का प्रशासन विकासात्मक कार्यों और औपनिवेशिक नियंत्रण—दोनों का मिश्रित रूप प्रस्तुत करता है।

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