गोरखों का गढ़वाल अभियान
परिचय
कुमाऊँ पर अधिकार करने के बाद गोरखों की विस्तारवादी नीति का अगला लक्ष्य गढ़वाल था। गढ़वाल की आंतरिक राजनीतिक स्थिति, राजपरिवार में संघर्ष, प्रशासनिक कमजोरी और प्राकृतिक आपदा से उत्पन्न संकट ने गोरखों को यहाँ हस्तक्षेप का अवसर दिया। 1791 ई. में गोरखों ने गढ़वाल पर पहला आक्रमण किया, लेकिन लंगूरगढ़ के वीर गढ़वाली सैनिकों के प्रतिरोध के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। बाद में गढ़वाल की राजनीतिक स्थिति और अधिक कमजोर होने पर 1803 ई. में गोरखों ने पुनः व्यापक आक्रमण किया। 1804 ई. के खुड़बुड़ा युद्ध में गढ़नरेश प्रद्युम्न शाह की मृत्यु के बाद गढ़वाल पर गोरखा आधिपत्य स्थापित हो गया और 1815 ई. तक यहाँ गोरखा शासन रहा।
गोरखों का गढ़वाल अभियान प्रमुख तथ्य
- गोरखों को गढ़वाल पर आक्रमण का आमंत्रण देने में भी हर्षदेव जोशी की भूमिका बताई जाती है।
- 1791 ई. में गोरखों ने गढ़वाल पर प्रथम आक्रमण किया। उस समय हर्षदेव जोशी अल्मोड़ा से गोरखों को सहायता पहुँचा रहे थे।
- गोरखों के प्रथम आक्रमण के दौरान लंगूरगढ़ में वीर गढ़वाली सेना ने लगभग एक वर्ष तक उनका सामना किया। इसके कारण गोरखा सेना लंगूरगढ़ से आगे नहीं बढ़ सकी और दुर्ग पर अधिकार करने में असफल रही।
- इसी बीच नेपाल पर चीनी आक्रमण की सूचना मिलने के बाद गोरखों ने 1792 ई. में लंगूरगढ़ का घेरा उठा लिया।
- 1792 ई. में लंगूरगढ़ की संधि हुई। इसके बाद गढ़नरेश प्रद्युम्न शाह ने नेपाली आक्रमण से बचने के लिए वार्षिक कर देना स्वीकार किया।
- 1792 ई. में लंगूरगढ़ का घेरा उठाने के बाद भी गोरखों के छोटे-छोटे दल सीमांत परगनों में लूटपाट करते रहे।
- गोरखों ने लंगूरगढ़ पर अधिकार करने के लिए कई बार असफल आक्रमण भी किए।
- इस बीच गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर एक भीषण भूकंप से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी और राजभवन भी रहने योग्य नहीं रहा था।
- कुँवर पराक्रम शाह ने सत्ता प्राप्त करने के लिए गृहयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी। मंत्रिमंडल में भी तीव्र विरोध और षड्यंत्र चल रहे थे। परिणामस्वरूप राज्य शासन अत्यंत कमजोर हो गया और गढ़वाल में अराजकता फैल गई।
- गढ़वाल की इस दयनीय राजनीतिक स्थिति का समाचार काठमांडू पहुँचने पर नेपाल ने इसका लाभ उठाया और 1803 ई. में गढ़वाल पर बड़े पैमाने पर आक्रमण किया।
- यह आक्रमण गीर्वाणयुद्ध विक्रम शाह के संरक्षण काल में हुआ। गोरखा सेना का नेतृत्व अमर सिंह थापा, हस्तीदल चौतरिया, बामशाह चौतरिया, भक्ति थापा तथा रणजोर थापा जैसे सेनापतियों ने किया।
- गोरखा सेना एक विशाल और प्रशिक्षित सेना थी। उसने गढ़वाल के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ते हुए गढ़वाली सेना पर दबाव बनाया।
- बाड़ाहाट तथा चमुवा (चम्बा) के युद्धों में गढ़नरेश प्रद्युम्न शाह को पराजय का सामना करना पड़ा।
- पराजित होने के बाद प्रद्युम्न शाह अपने परिवार के साथ दून की ओर चले गए। गोरखा सेना ने उनका पीछा किया।
- प्रद्युम्न शाह ने सहारनपुर में अपना राजसिंहासन और मूल्यवान आभूषण बेचकर तथा लंढौरा के गुर्जर राजा रामदयाल सिंह की सहायता से लगभग 12,000 सैनिकों की सेना एकत्र की और गोरखों के विरुद्ध अंतिम संघर्ष का प्रयास किया।
- 14 मई 1804 ई. को देहरादून के निकट खुड़बुड़ा के युद्ध में प्रद्युम्न शाह वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- प्रद्युम्न शाह की मृत्यु के बाद कुँवर पराक्रम शाह को गोरखों ने बंदी बनाकर काठमांडू भेज दिया, जबकि युवराज सुदर्शन शाह ज्वालापुर चले गए।
- इस प्रकार गढ़वाल राज्य पर गोरखा आधिपत्य स्थापित हो गया।
- गढ़वाल में 1804 ई. से 1815 ई. तक लगभग 11 वर्षों तक गोरखा शासन रहा।
- गोरखा शासन के काल को उत्तराखंड के इतिहास में “गोरख्याली” के नाम से जाना जाता है।
- गोरखा शासन के दौरान जब गढ़वाली जनता में व्यापक शोक और पीड़ा व्याप्त थी, तब लोकपरंपरा के अनुसार मौलाराम श्रीनगर में आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे।
निष्कर्ष
गोरखों का गढ़वाल अभियान उत्तराखंड के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। 1791 ई. का प्रथम आक्रमण लंगूरगढ़ के वीर प्रतिरोध के कारण सफल नहीं हो सका, लेकिन गढ़वाल की लगातार बिगड़ती राजनीतिक स्थिति ने गोरखों को पुनः आक्रमण का अवसर दिया। 1803 ई. के आक्रमण के बाद गढ़वाल की स्थिति निर्णायक रूप से बदल गई। बाड़ाहाट और चमुवा के युद्धों में पराजय के बाद 14 मई 1804 को खुड़बुड़ा के युद्ध में प्रद्युम्न शाह की वीरगति ने गोरखा आधिपत्य का मार्ग प्रशस्त किया। इसके बाद 1815 ई. तक गढ़वाल के बड़े भाग पर गोरखा शासन रहा। इस अवधि को “गोरख्याली” कहा जाता है और इसे गढ़वाल के इतिहास के अत्यंत कठिन कालों में गिना जाता है।