गोरखों का कुमाऊँ अभियान
परिचय
18वीं शताब्दी के अंतिम चरण में कुमाऊँ राज्य राजनीतिक अस्थिरता, आंतरिक कलह और आर्थिक कमजोरी से जूझ रहा था। दूसरी ओर, नेपाल का गोरखा राज्य पश्चिम की ओर अपने विस्तार की नीति पर आगे बढ़ रहा था। कुमाऊँ के शासकों की निर्बलता और राज्य में व्याप्त पारस्परिक फूट ने गोरखों को आक्रमण का अवसर प्रदान किया। इस परिस्थिति में हर्षदेव जोशी की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही, जिन्होंने गोरखों को कुमाऊँ की आंतरिक परिस्थितियों की जानकारी देने तथा सहयोग का आश्वासन देने की बात कही जाती है। अंततः 1790 ई. में गोरखों ने कुमाऊँ पर विजय प्राप्त की और लगभग 25 वर्षों तक यहाँ अपना शासन स्थापित रखा।
गोरखों का कुमाऊँ अभियान प्रमुख तथ्य
- नेपाली दरबार काली नदी के पश्चिम में स्थित कुमाऊँ के शासकों की राजनीतिक निर्बलता से परिचित था और इस क्षेत्र पर अधिकार करने का अवसर तलाश रहा था।
- उस समय कुमाऊँ राज्य में पारस्परिक फूट व्याप्त थी तथा राजकोष भी आर्थिक संकट से जूझ रहा था।
- कुमाऊँ की आंतरिक कमजोरी को देखते हुए गोरखा शासक कुमाऊँ पर विजय प्राप्त करने का अवसर तलाश रहे थे।
- हर्षदेव जोशी ने अपनी चिट्ठियों के माध्यम से गोरखों को कुमाऊँ की आंतरिक परिस्थितियों की जानकारी दी तथा उन्हें सहयोग देने का आश्वासन दिया।
- इतिहासकार एटकिंसन ने हर्षदेव जोशी के इस आचरण को “स्वार्थपूर्ण” तथा “देशद्रोह” की संज्ञा दी है।
- राहुल सांकृत्यायन ने हर्षदेव जोशी की तुलना विभीषण से की है, जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गोरखों की सहायता करने को तैयार था।
- जनवरी 1790 ई. में गोरखों ने अमर सिंह थापा, हस्तीदल चौतरिया, शूरवीर थापा तथा काजी जगजीत पांडे के नेतृत्व में कुमाऊँ पर आक्रमण किया।
- गोरखों ने कुमाऊँ पर दो दिशाओं से आक्रमण किया। एक सेना काली नदी पार करके झूलाघाट से सोर क्षेत्र होते हुए गंगोलीहाट और सेराघाट की ओर बढ़ी, जबकि दूसरी सेना बिसुंग के मार्ग से अल्मोड़ा की ओर बढ़ी।
- प्रारंभिक संघर्ष में महेन्द्र चंद की सेना ने अमर सिंह थापा की सेना को पराजित कर उसे काली कुमाऊँ की ओर पीछे हटने के लिए विवश कर दिया।
- गैतोड़ा के युद्ध में लाल सिंह की पराजय हुई और वह युद्धक्षेत्र से भाग गया।
- वर्ष 1790 ई. में हवालबाग की पहाड़ी पर राजा महेन्द्र चंद और गोरखों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ, जिसमें महेन्द्र चंद पराजित हुआ।
- कुमाऊँ पर गोरखों के आक्रमण का निमंत्रण देने में हर्षदेव जोशी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
- कुमाऊँ पर विजय प्राप्त करने के बाद गोरखों ने 1790 ई. से 1815 ई. तक लगभग 25 वर्षों तक शासन किया।
- कुमाऊँ विजय के बाद गोरखों ने 1791 ई. में गढ़वाल पर भी आक्रमण किया, लेकिन गढ़वाल को जीतने में वे सफल नहीं हो सके।
- गोरखों की कुमाऊँ विजय के समय नेपाल के शासक रणबहादुर शाह थे।
- इतिहासकार अजय रावत ने गोरखों के कुमाऊँ आगमन को “यमराज के आगमन” के समान बताया है, जो गोरखा शासन की कठोरता और उसके प्रभाव को दर्शाता है।
निष्कर्ष
1790 ई. की कुमाऊँ विजय उत्तराखंड के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन थी। कुमाऊँ की आंतरिक फूट, आर्थिक कमजोरी और शासकीय निर्बलता ने गोरखों के लिए विजय का मार्ग आसान किया। हर्षदेव जोशी की भूमिका को लेकर इतिहासकारों और लोकपरंपराओं में विशेष चर्चा मिलती है। गोरखों ने कुमाऊँ पर लगभग 25 वर्षों तक, 1790 से 1815 ई. तक, शासन किया। इस अवधि में कुमाऊँ की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था पर गोरखा शासन का गहरा प्रभाव पड़ा। बाद में 1815 ई. के एंग्लो-गोरखा युद्ध के परिणामस्वरूप कुमाऊँ से गोरखा शासन समाप्त हुआ और ब्रिटिश सत्ता स्थापित हुई। इस प्रकार गोरखों का कुमाऊँ अभियान उत्तराखंड के मध्यकालीन से आधुनिक राजनीतिक संक्रमण की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।