चंदकालीन भूराजस्व व्यवस्था
परिचय
चंदकालीन अर्थव्यवस्था में भूराजस्व राजकोष की आय का प्रमुख स्रोत था। तत्कालीन कृषि व्यवस्था भूमि पर राजा के सर्वोच्च अधिकार की धारणा पर आधारित थी। राजा द्वारा विभिन्न व्यक्तियों को भूमि प्रदान की जाती थी तथा भूमि से जुड़े कृषकों एवं अन्य श्रमिक वर्गों की अलग-अलग भूमिकाएँ थीं। खायकर, सिरतान, थातवान और कैनी जैसे शब्द तत्कालीन भूमि एवं कृषक व्यवस्था को समझने में महत्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही भूराजस्व की निश्चित दर तथा भूमि और उत्पादन की माप के लिए नाली, बीसा, ज्यूला, मसा और अधाली जैसी विभिन्न इकाइयों का प्रयोग किया जाता था।
प्रमुख बिंदु
- चंदकाल में भूमि का स्वामित्व राजा में निहित माना जाता था।
- जनता राजा की इच्छा एवं अनुमति के अनुसार ही भूमि से अपनी आजीविका प्राप्त कर सकती थी।
- राजा द्वारा रौत, गूढ़ तथा विष्णुप्रीति के रूप में जिसे भूमि प्रदान की जाती थी, वह ‘थातवान’ कहलाता था।
- चंदकाल में दो प्रकार के कृषकों के होने का उल्लेख मिलता है। ‘खायकर’ अनाज एवं नगद दोनों रूपों में कर देता था, जबकि ‘सिरतान’ कर का भुगतान नगद रूप में करता था।
- सिरतान को थातवान कभी भी भूमि से हटा सकता था, जिससे उसके भूमि-अधिकार की स्थिति का पता चलता है।
- पहाड़ी क्षेत्रों में एक प्रकार के भूदास ‘कैनी’ होते थे, जो कृषि एवं अन्य कार्यों से जुड़े होते थे।
- राजा द्वारा बहादुरी प्रदर्शित करने वाले व्यक्ति को पुरस्कार के रूप में भूमि प्रदान की जाती थी, जिसे ‘रौत’ कहा जाता था।
- रौत के रूप में प्राप्त भूमि पर पहले से खेती करने वाले लोग थातवान के कैनी बन जाते थे और थातवान उनसे विभिन्न प्रकार के कार्य करवाता था।
- राजकोष में जमा किया जाने वाला अनाज कैनियों द्वारा ही पहुँचाया जाता था।
- खेत पर कार्य करने वाले दासों को ‘कैनी’, जबकि घर के कार्य करने वाले दास-दासियों को ‘छयौड़ा’ एवं ‘छयोड़ी’ कहा जाता था।
- भूराजस्व सामान्यतः उपज का छठवाँ भाग होता था, जिसे ‘गल्ला छहाड़’ कहा जाता था। इसे नगद एवं अनाज दोनों रूपों में लिया जाता था।
- बरम ताम्रपत्र से 6 बीसा भूमि से 30 पैसे कर के रूप में लिए जाने का उल्लेख मिलता है।
- सम्भवतः 20 नाली भूमि के लिए ‘बीसा’ शब्द का प्रयोग किया जाता था।
- भूमि की माप के लिए नाली, ज्यूला, बीसा, अधाली, पालो तथा मसा आदि इकाइयों का प्रयोग किया जाता था।
- 20 नाली भूमि को आधुनिक माप के अनुसार लगभग एक एकड़ के बराबर माना जाता था।
- मसा नाली से छोटी भूमि-माप की इकाई थी, जबकि एक ज्यूला लगभग 10 कुंतल के बराबर माना जाता था।
- अधाली से लगभग 15 किलोग्राम का बोध होता था।
निष्कर्ष
चंदकालीन भूराजस्व व्यवस्था तत्कालीन कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और राजकीय भूमि-अधिकार पर आधारित थी। राजा भूमि का सर्वोच्च स्वामी माना जाता था तथा थातवान, खायकर, सिरतान और कैनी जैसे वर्ग भूमि एवं कृषि व्यवस्था से जुड़े हुए थे। बहादुरी के बदले भूमि प्रदान करने की रौत व्यवस्था तथा कैनियों से कृषि एवं अन्य कार्य करवाने की परंपरा तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक संरचना को दर्शाती है। सामान्यतः उपज का छठवाँ भाग ‘गल्ला छहाड़’ के रूप में लिया जाता था। नाली, बीसा, ज्यूला, मसा और अधाली जैसी माप-इकाइयाँ तत्कालीन भूमि एवं उत्पादन व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषताएँ थीं। इस प्रकार भूराजस्व चंदकालीन राजकोष और प्रशासन की आर्थिक आधारशिला था।