पंवार वंश का प्रादेशिक प्रशासन

परिचय

गढ़ राज्य में पंवार शासकों ने प्रशासन को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए बहुस्तरीय प्रादेशिक प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की थी। प्रशासन मुख्यतः मण्डल/परगना, पट्टी और गाँव जैसी इकाइयों में संगठित था। समय के साथ इन प्रशासनिक इकाइयों तथा उनसे जुड़े अधिकारियों के नाम और कार्यों में परिवर्तन हुआ। पंवारकालीन ताम्रपत्रों, शिलालेखों एवं शासनादेशों से इस व्यवस्था की जानकारी प्राप्त होती है। बड़े प्रशासनिक क्षेत्रों में असैनिक तथा सैनिक अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी, जबकि पट्टी और ग्राम स्तर पर सयाणा, लेखवार, कारदार, पधान एवं पंचायत जैसी स्थानीय संस्थाएँ प्रशासन चलाती थीं।

प्रमुख विशेषताये

1. मण्डल/परगना

  • गढ़ राज्य में सबसे बड़ी प्रशासनिक इकाइयों को प्रारंभ में ‘मण्डल’ कहा जाता था। कालांतर में यही मण्डल ‘परगना’ कहलाने लगे।
  • गंगा के पूर्व स्थित प्रमुख मण्डल थे—
    • देवलगढ़ मण्डल
    • नागपुर मण्डल
    • दसौली मण्डल
    • कपिरि मण्डल
    • चाँदपुर मण्डल
    • सलाण मण्डल
  • गंगा के पश्चिम स्थित प्रमुख मण्डल थे—
    • बनगढ़ मण्डल
    • मलेथा मण्डल
    • भरदार मण्डल
    • रमोलि मण्डल
    • उदयपुर मण्डल
    • रवांई मण्डल
    • जाख मण्डल
    • कुईली-पालकोट मण्डलभरपुर मण्डल
    • दून (माल) मण्डल
  • मण्डलों के असैनिक पदाधिकारी ‘कमीण’ कहलाते थे। संवत् 1842 के उदयपुर शिलालेख में ‘उदयपुर की कमीणाई’ का उल्लेख मिलता है।
  • उत्तर-पंवार काल में मण्डलों के सैनिक पदाधिकारी ‘फौजदार’ कहलाने लगे।
  • प्रद्युम्न शाह के ताम्रपत्र में निम्न फौजदारों का उल्लेख मिलता है—
    • माल — राणा बहादुर सिंह
    • सलाण — चन्द्रमणि
    • रवांई — गजे सिंह नेगी
  • कालांतर में परगने के प्रशासक ‘थोकदार’ कहलाने लगे तथा कमीण भी आगे चलकर थोकदार कहे जाने लगे।
  • पालकोट शासनादेश में कुईली-पालकोट परगना के कमीण फेंचु सजवाण को थोकदार भी कहा गया है।

2. पट्टी

  • परगने से छोटी प्रशासनिक इकाई ‘पट्टी’ कहलाती थी।
  • पट्टी की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए ‘सयाणा’ नियुक्त किए जाते थे।
  • थोकदार के अधीन सयाणा, लेखवार, कारदार तथा पंच कार्य करते थे।
  • इन अधिकारियों का प्रमुख कार्य गाँवों के जमींदारों की व्यवस्था देखना तथा उनसे संबंधित राजस्व एवं प्रशासनिक कार्यों को संचालित करना था।
  • इन अधिकारियों को जमींदारों से ‘थोकदारी दस्तूर’ प्राप्त होता था।

3. गाँव

  • ग्राम प्रशासन प्रादेशिक प्रशासन की सबसे निचली इकाई था। गाँव के स्तर पर मुख्यतः राजस्व एवं न्याय की व्यवस्था की जाती थी।
  • राजस्व व्यवस्था के लिए गाँवों में ‘पधान’ नियुक्त किए जाते थे। उनका प्रमुख कार्य राजस्व की उगाही से संबंधित था।
  • न्याय व्यवस्था के लिए गाँवों में पंचायतें स्थापित थीं। स्थानीय विवादों एवं सामान्य न्यायिक मामलों का निपटारा पंचायत के माध्यम से किया जाता था।
  • महाराजा प्रदीपशाह के लेखों में ‘चकड़ैत’ तथा ‘रौलिया’ जैसे स्थानीय पदों का उल्लेख मिलता है।
  • रौलिया स्थानीय राजस्व एवं पुलिस अधिकारी के रूप में कार्य करते थे।

निष्कर्ष

पंवार वंश के गढ़ राज्य में प्रादेशिक प्रशासन मण्डल/परगना, पट्टी और गाँव की क्रमबद्ध संरचना पर आधारित था। प्रारंभिक समय में बड़े प्रशासनिक विभागों को मण्डल कहा जाता था, जो बाद में परगना कहलाने लगे। मण्डल स्तर पर कमीण तथा बाद में फौजदार एवं थोकदार, पट्टी स्तर पर सयाणा, लेखवार, कारदार एवं पंच, जबकि ग्राम स्तर पर पधान और पंचायत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। इस व्यवस्था में राजस्व संग्रह, सुरक्षा, न्याय तथा स्थानीय प्रशासन के कार्यों का स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। पंवारकालीन ताम्रपत्रों, शिलालेखों एवं शासनादेशों में उल्लिखित विभिन्न पदनाम इस स्थानीय एवं विकेन्द्रित प्रशासनिक व्यवस्था को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

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