राजा फतेहपति शाह भाग -1 (1664–1716 ई.)|Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा फतेहपति शाह पंवार/परमार वंश के अत्यंत शक्तिशाली, महत्वाकांक्षी और प्रसिद्ध शासकों में गिने जाते हैं। वंशावलियों के अनुसार वे परमार वंश के 49वें राजा थे। 1667 और 1668 ई. के मंगसीर दानपत्रों से संकेत मिलता है कि उनका राज्यारोहण 1667 ई. से पहले हो चुका था, इसलिए उनका शासन लगभग 1664 ई. से 1716 ई. तक माना जाता है। प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने पृथ्वीपति की संरक्षिका के अधीन तथा बाद में राजमाता कटौची और राजमाता बर्त्वाली के संरक्षण में शासन किया। उनके समय गढ़वाल ने सिरमौर, सहारनपुर, तिब्बत और कुमाऊँ के साथ अनेक सैन्य संघर्ष किए। भंगाणी का युद्ध (1689), दुधौली का युद्ध (1703), दापा अभियान तथा कुमाऊँ अभियानों के कारण उनका शासन सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। साहित्य, चित्रकला और संगीत के संरक्षण के कारण उनके काल को गढ़वाल का स्वर्ण काल भी कहा जाता है।
प्रमुख बिंदु
- वंशावलियों के अनुसार फतेहपति शाह परमार वंश के 49वें शासक थे। 1667 एवं 1668 ई. के मंगसीर दानपत्रों से पता चलता है कि उनका राज्यारोहण 1667 ई. से पहले हो चुका था। इसलिए उनका राज्यारोहण लगभग 1664 ई. माना जाता है।
- 1664–1668 ई. के प्रारंभिक काल में राज्य-व्यवस्था संरक्षण में चलती रही। इसके बाद राज्याभिषेक तक राजमाता कटौची और राजमाता बर्त्वाली के संरक्षण का उल्लेख मिलता है। हरिकृष्ण रतूड़ी के अनुसार फतेहपति शाह की संरक्षिका राजमाता कटौची थीं।
- फतेहपति शाह के संबंध में जानकारी उनके समय के अभिलेखों, सिक्कों, मुस्लिम ऐतिहासिक ग्रंथों तथा दरबारी साहित्य से प्राप्त होती है। प्रमुख साहित्यिक स्रोतों में ‘फतेहशाह यशोवर्णनम्’, ‘फतेहप्रकाश’ तथा ‘फतेहशाह कर्ण’ आदि का उल्लेख मिलता है।
- फतेहपति शाह को संगीत से विशेष प्रेम था। मौलाराम ने उन्हें ‘प्रीतमशाह’ भी कहा है। उनके शासनकाल में कला और साहित्य को राजकीय संरक्षण मिलने का उल्लेख मिलता है।
- फतेहपति शाह को उनकी सैन्य शक्ति और विस्तारवादी नीति के कारण ‘गढ़वाल का शिवाजी’ कहा जाता है। उनके शासनकाल को कई विद्वानों ने गढ़वाल का स्वर्ण काल भी माना है।
- फतेहपति शाह के समय गढ़वाल में चित्रकला का विकास हुआ। इस काल की चित्रकला में मोटिफ शैली के प्रभाव का उल्लेख मिलता है, जिसे जहाँगीर कालीन चित्रों की शैली से जोड़ा जाता है।
- फतेहपति शाह के प्रमुख मंत्रियों में शंकरदत्त डोभाल और पुरिया नैथाणी (पूरनमल) का उल्लेख मिलता है। शंकरदत्त डोभाल ने अपनी पुत्री का विवाह पुरिया नैथाणी से किया था।
- पुरिया नैथाणी प्रारंभ में अस्तबल प्रमुख था, लेकिन अपनी बुद्धिमत्ता और योग्यता के कारण वह उच्च राजनीतिक पद तक पहुँचा। उसे ‘गढ़वाल का चाणक्य’ तथा ‘गढ़वाल का नाना फड़नवीस’ कहा जाता है।
- पुरिया नैथाणी की राजनीतिक बुद्धिमत्ता के कारण फतेहपति शाह और मुगलों के संबंधों को संतुलित रखने में सहायता मिली। परंपरागत विवरणों में यह भी कहा जाता है कि उसकी कूटनीति के कारण औरंगजेब ने गढ़वाल पर जजिया कर नहीं लगाया।
- 1685 ई. में फतेहपति शाह ने सिरमौर पर आक्रमण किया। उस समय सिरमौर का राजा रुद्र प्रकाश था। फतेहपति शाह ने बैराटगढ़ और कालसीगढ़ पर अधिकार कर लिया तथा बैराटगढ़ को गढ़वाल-सिरमौर सीमा के रूप में निर्धारित किया गया।
- 1689 ई. का भंगाणी युद्ध फतेहपति शाह के शासनकाल की प्रसिद्ध घटना है। यह युद्ध पांवटा के निकट फतेहपति शाह और गुरु गोविंद सिंह के बीच हुआ था। इसका उल्लेख गुरु गोविंद सिंह की रचना ‘विचित्र नाटक’ में मिलता है।
- दून क्षेत्र में समय-समय पर बाहरी समूहों द्वारा लूटपाट की जाती थी। इनमें पुण्डीर और गुर्जर प्रमुख बताए जाते हैं। इसी कारण फतेहपति शाह ने दून क्षेत्र से बाहर जाकर उनके विरुद्ध सैन्य अभियान चलाया।
- 1692 ई. में फतेहपति शाह ने सहारनपुर के पुण्डीरों और गुर्जरों पर आक्रमण किया। उस समय सहारनपुर क्षेत्र पुण्डीर सरदार जगत सिंह के अधीन था। पुण्डीरों की पराजय के बाद जगत सिंह दिल्ली भाग गया।
- कुछ समय बाद मुगल सेनापति सैयद अली की गतिविधियों के कारण फतेहपति शाह को वापस दून लौटना पड़ा।
- मेदिनी शाह के बाद दापा के तिब्बती शासक ने पूर्व निर्धारित कर देना बंद कर दिया था। फतेहपति शाह ने इसे स्वीकार नहीं किया और दापा पर अभियान चलाकर वहाँ के राजा को पुनः कर देने के लिए बाध्य किया।
- दापा विजय के बाद फतेहपति शाह ने अपनी टोपी, कोट और तलवार वहाँ के बौद्ध मंदिरों में रखवा दिए। यह घटना उसके तिब्बत अभियान से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में वर्णित की जाती है।
- फतेहपति शाह के समय कुमाऊँ के चंद शासकों से भी लंबे समय तक युद्ध चलता रहा। उसके प्रमुख समकालीन चंद शासकों में उद्योत चंद, ज्ञानचंद द्वितीय और जगत चंद शामिल थे।
- फतेहपति शाह और चंद राजाओं के बीच संघर्ष को 12 वर्षीय युद्ध के रूप में भी वर्णित किया जाता है।
- 1678 ई. में उद्योत चंद ने बधाणगढ़ पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में उसका सेनापति मैसी साहू मारा गया।
- 1679 ई. में उद्योत चंद ने पुनः गढ़वाल पर आक्रमण किया और श्रीनगर में लूटपाट की।
- 1680 ई. में फतेहपति शाह ने डोटी के राजा देवपाल से संधि की। इसके बाद डोटी और गढ़वाल की संयुक्त सेना ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया, लेकिन बाद में उद्योत चंद ने दोनों सेनाओं को पराजित कर दिया।
- 1698 ई. में उद्योत चंद के बीमार पड़ने पर उसकी खवासन रानी पार्वती ने फतेहपति शाह को कुमाऊँ पर आक्रमण का निमंत्रण दिया। फतेहपति शाह ने कुमाऊँ पर आक्रमण और लूटपाट की तथा वापस लौट आया।
- उसी वर्ष 1698 ई. में उद्योत चंद की मृत्यु हुई और उसके बाद ज्ञानचंद द्वितीय कुमाऊँ का राजा बना।
- 1699 ई. में ज्ञानचंद द्वितीय ने बधाणगढ़ पर आक्रमण किया और वहाँ से प्राप्त नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा को अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर में स्थापित किया। इससे संबंधित परंपरा में बाजबहादुर चंद द्वारा भी गढ़वाल से नंदा देवी की मूर्ति ले जाकर मल्ला महल में स्थापित करने का उल्लेख मिलता है।
- 1701 ई. में फतेहपति शाह ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया और वहाँ लूटपाट की।
- 1703 ई. का दुधौली युद्ध फतेहपति शाह और ज्ञानचंद द्वितीय के संघर्ष की महत्वपूर्ण घटना थी। इस युद्ध में ज्ञानचंद द्वितीय ने गढ़वाल पर आक्रमण कर फतेहपति शाह को पराजित किया।
- 1707 ई. में ज्ञानचंद द्वितीय ने पुनः गढ़वाल पर आक्रमण किया और जुनियागढ़ पर अधिकार कर लिया।
- 1710 ई. में फतेहपति शाह ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया और बैजनाथ तक का क्षेत्र जीत लिया। इस विजय के बाद उसने कत्यूर पट्टी का गड़सार गाँव बद्रीनाथ मंदिर को दान दिया। उस समय कुमाऊँ का राजा जगत चंद था।
- फतेहपति शाह के दरबार को साहित्यिक परंपरा में अकबर और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समान नवरत्नों वाला दरबार बताया गया है। इसी कारण उन्हें उपमा के रूप में ‘गढ़वाल का अकबर’ भी कहा जाता है।
- फतेहपति शाह के नवरत्नों में क्षेमराज/रत्न कवि, सुरेशानंद बर्थवाल, हरिदत्त नौटियाल, रूद्रीदत्त कमोठी, शशिधर डंगवाल, बासवानंद बहुगुणा, सहदेव चंदोला, हरिदत्त थपलियाल और कीर्तिराम कनठोला के नाम मिलते हैं।
- फतेहपति शाह ने अपनी पुत्री का विवाह बिलासपुर के राजा भीमचंद के पुत्र से किया था। इससे उसके व्यापक राजनीतिक संबंधों का संकेत मिलता है।
- जी. आर. सी. विलियम्स ‘Memoirs of Dehradun’ के लेखक बताए जाते हैं। इस ग्रंथ में फतेहशाह के सहारनपुर अभियान तथा फतेहपुर नगर बसाने का उल्लेख मिलता है।
- फतेहपति शाह के दरबार में रत्न कवि/क्षेमराज, जटाधर और मतिराम जैसे कवि थे। उनके दरबार में साहित्यिक गतिविधियों को पर्याप्त संरक्षण प्राप्त था।
- जटाधर अथवा जटाशंकर को ‘फतेहशाह कर्ण’ ग्रंथ का रचयिता बताया जाता है।
- रत्न कवि का हस्तलिखित ग्रंथ ‘फतेहप्रकाश’ है। उन्होंने इसमें फतेहशाह को हिन्दुओं का रक्षक, शील का सागर और उद्दंडों को दंड देने वाला बताया है।