गरुड़ ज्ञानचंद भाग -1 |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
गरुड़ ज्ञानचंद चंद वंश के सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली शासकों में से एक माना जाता है। चंद वंशावली के अनुसार वह चंद वंश का 29वाँ शासक था और लगभग 45–46 वर्षों तक शासन करने वाला शासक माना जाता है। उसके शासनकाल से संबंधित अनेक ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं, जिनसे उसके राजनीतिक प्रभाव, भूमि-दान तथा प्रशासनिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है। ज्ञानचंद को सोर का विजेता भी कहा जाता है। उसके समय चंद सत्ता का संपर्क दिल्ली सल्तनत से हुआ और परंपरा के अनुसार वह दिल्ली दरबार में जाने वाला पहला चंद शासक था। उसका राजचिह्न गरुड़ था और वह विष्णु का उपासक माना जाता है। उसके शासनकाल में चंद राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।
प्रमुख बिंदु
- गरुड़ ज्ञानचंद चंद वंश का 29वाँ शासक था।
- ज्ञानचंद का शासनकाल लगभग 45–46 वर्ष माना जाता है। इसे चंद वंश में सबसे लंबे शासनकालों में प्रमुख माना जाता है।
- 1378 ई. के ताम्रपत्र में अभयचंद के वार्षिक श्राद्ध का ज्ञानचंद द्वारा कराए जाने का उल्लेख मिलता है।
- दिल्ली सल्तनत से संबंध
- ज्ञानचंद को दिल्ली दरबार जाने वाला पहला चंद शासक माना जाता है।
- ज्ञानचंद के समय दिल्ली की सल्तनत में फिरोजशाह तुगलक का शासन था। हालांकि एटकिंसन ने इस संबंध में अलग मत प्रस्तुत किया है और सुल्तान के रूप में मुहम्मद बिन तुगलक अथवा दौलत खाँ लोदी की संभावना का उल्लेख किया है।
- परंपरा के अनुसार फिरोजशाह तुगलक ने ज्ञानचंद को ‘गरुड़’ की उपाधि प्रदान की तथा तराई क्षेत्र उसे सौंपा।
- ज्ञानचंद के समय तराई-भाबर क्षेत्र में कटेहरियों का प्रभाव/शासन था।
- ज्ञानचंद को सोर का विजेता कहा जाता है।
- सेरा खड़कोट (पिथौरागढ़) ताम्रपत्र में ज्ञानचंद और विजय बम द्वारा संयुक्त भूमि-संकल्प का उल्लेख मिलता है।
- सेरा खड़कोट ताम्रपत्र में ज्ञानचंद को ‘राजाधिराज महाराज’ की उपाधि से संबोधित किया गया है।
- इसी ताम्रपत्र में विजय बम के साथ कोई राजकीय विरुद नहीं मिलता। इससे उसके उस समय ज्ञानचंद के अधीन सामंत होने का अनुमान लगाया जाता है
- मझेड़ा ताम्रपत्र में विजय बम को ‘श्री राजा विजय बम’ कहा गया है। इन अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर सोर विजय का श्रेय ज्ञानचंद को दिया जाता है, न कि भारतीचंद को।
- मझेड़ा ताम्रपत्र से ज्ञानचंद के समय विजय बम की सामंती स्थिति का संकेत मिलता है।
- 1418 ई. के गोबासा ताम्रपत्र में ज्ञानचंद द्वारा पिथौरागढ़ के कुजौली गाँव को देवराज तिवाड़ी को संकल्प-वृत्ति के रूप में प्रदान किए जाने का उल्लेख है।
- ज्ञानचंद को ‘महाराजाधिराज’ उपाधि धारण करने वाला पहला चंद शासक माना जाता है।
- ज्ञानचंद का राजचिह्न गरुड़ था।
- गरुड़ ज्ञानचंद विष्णु उपासक माना जाता है।
- ज्ञानचंद का प्रमुख सेनापति नीलू कठायत था।
- नीलू कठायत मूलतः कपरौली गाँव का रहने वाला बताया जाता है और उसे ज्ञानचंद का वीर सेनापति माना जाता है।
- नीलू कठायत को ज्ञानचंद द्वारा ‘कुमय्या खिल्लत’ प्रदान किए जाने का उल्लेख मिलता है। कुमय्या खिल्लत एक प्रकार की विशेष पोशाक मानी जाती है।
- ज्ञानचंद का बख्शी नीलू कठायत को माना जाता है।
- नीलू कठायत के पुत्रों के नाम सुजु और वीरु बताए जाते हैं।
- दरबारी व्यक्ति जस्सा कमलेखी को नीलू कठायत का प्रतिद्वंद्वी बताया गया है। परंपरा के अनुसार वह नीलू कठायत की उन्नति से ईर्ष्या करता था।
- परंपरा के अनुसार जस्सा कमलेखी के प्रभाव में आकर नीलू कठायत के दोनों पुत्रों की आँखें निकलवा दी गईं।
- आगे चलकर परंपरा के अनुसार ज्ञानचंद ने अपने ही सेनापति नीलू कठायत को मरवा दिया।
- ज्ञानचंद के बाद क्रमशः हरिहरचंद और व्दानचंद के सिंहासन पर बैठने का उल्लेख मिलता है।
- ज्ञानचंद से संबंधित अभिलेखों में रेगाँव स्तम्भ लेख का उल्लेख किया जाता है।
- चामी गड्यूड़ा ताम्रपत्र (चंपावत) में राजा अभयचंद के वार्षिक श्राद्ध के उपरांत ज्ञानचंद द्वारा भूमि-दान किए जाने का उल्लेख मिलता है।
- ज्ञानचंद से संबंधित अन्य प्रमुख ताम्रपत्रों में गोबासा, किम्बाड़ी, मादली, मझेड़ा तथा सेरा खड़कोट ताम्रपत्र उल्लेखनीय हैं।
- ज्ञानचंद से संबंधित ये अभिलेख उसके शासनकाल के राजनीतिक, प्रशासनिक, धार्मिक एवं भूमि-दान संबंधी इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
- ज्ञानचंद का शासनकाल चंद सत्ता के राजनीतिक विस्तार और प्रतिष्ठा में वृद्धि के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है।