पृथ्वीपति शाह (1640–1664 ई.) भाग -2

  • पृथ्वीपति शाह के इस व्यवहार के कारण प्रो. अजय सिंह रावत ने उसकी तुलना राणा हम्मीर देव से की है। दोनों के संदर्भ में शरणागत की रक्षा और शक्तिशाली विरोधी के सामने दृढ़ रहने की भावना को रेखांकित किया गया है।
  • अंततः पृथ्वीपति शाह का पुत्र मेदिनीशाह और रामसिंह ने मिलकर सुलेमान शिकोह को पकड़कर मुगल दरबार में प्रस्तुत किया। इस प्रकार पृथ्वीपति शाह द्वारा दी गई शरण अंततः उसके अपने पारिवारिक और राजनीतिक संघर्ष का कारण बनी।
  • मेदिनीशाह को पराक्रमी पृथ्वीपति शाह का डरपोक पुत्र कहा गया है, क्योंकि वह औरंगजेब के भय से सुलेमान शिकोह को पकड़ने के पक्ष में था।
  • सुलेमान शिकोह की गिरफ्तारी के बाद पृथ्वीपति शाह ने अपने पुत्र मेदिनीशाह को देश निकाला दे दिया। इस घटना ने पिता-पुत्र के संबंधों में गंभीर तनाव उत्पन्न किया।
  • मेदिनीशाह को बाद में पंवार वंश का ‘औरंगजेब’ भी कहा गया है। यह उपमा उसके व्यक्तित्व और राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में दी जाती है।
  • 1662 ई. में मेदिनीशाह की दिल्ली में मृत्यु हुई। उसके निधन की सूचना स्वयं औरंगजेब ने पत्र द्वारा पृथ्वीपति शाह को दी थी।
  • पृथ्वीपति शाह ने देहरादून क्षेत्र में पृथ्वीपुर नामक नगर बसाया था। उसके नाम से जुड़ा यह नगर उसके निर्माण कार्यों का उल्लेखनीय उदाहरण माना जाता है।
  • उसने अपनी द्वितीय राजधानी गढ़वाली गढ़ी अथवा राजगढ़ी में स्थापित की तथा दिलीप शाह को वहाँ का राजा बनाया।
  • पृथ्वीपति शाह ने श्यामदास और हरदास को आश्रय दिया। इनके वंश से आगे चलकर प्रसिद्ध गढ़वाली चित्रकार मौलाराम के संबंध जोड़े जाते हैं।
  • पृथ्वीपति शाह के पश्चिमी अभियान का उल्लेख सर्वप्रथम कवि देवराज के श्लोकों में मिलता है। विजयराम शर्मा के अनुसार उसने कुल्लू तथा उसके आसपास के क्षेत्रों तक विजय प्राप्त की थी।
  • दूसरी ओर हर्षदेव रतूड़ी के अनुसार पृथ्वीपति शाह ने पश्चिम दिशा में हाटकोटी को अपनी सीमा निर्धारित किया था। हाटकोटी से संबंधित संधि पृथ्वीपति शाह और मांधाता प्रकाश के बीच होने का उल्लेख मिलता है।
  • पृथ्वीपति शाह के शासनकाल को गढ़वाली चित्रकला के प्रारंभिक विकास का काल माना जाता है। उसके द्वारा श्यामदास और हरदास जैसे कलाकारों को संरक्षण दिए जाने की परंपरा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
  • ‘रामायण प्रदीप’ के अनुसार पृथ्वीपति शाह ने स्वर्ण से तुलादान किया था। इससे उसके धार्मिक दान और राजकीय वैभव का संकेत मिलता है।

निष्कर्ष

पृथ्वीपति शाह का शासनकाल गढ़वाल के पंवार इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण था। उसके समय गढ़वाल को मुगल साम्राज्य, चंद राज्य और सिरमौर जैसी शक्तियों के साथ जटिल राजनीतिक संबंधों का सामना करना पड़ा। मुगलों के विरुद्ध संघर्ष के बाद उसकी राजनीतिक परिस्थितियों ने उसे मुगल अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया, किंतु सुलेमान शिकोह को शरण देना उसके शासनकाल की सबसे चर्चित घटना रही। इस प्रसंग में पृथ्वीपति शाह को शरणागत की रक्षा करने वाले साहसी शासक के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर, उसके पुत्र मेदिनीशाह की भूमिका इसके बिल्कुल विपरीत रही। इसके अतिरिक्त पृथ्वीपुर और राजगढ़ी का निर्माण, पश्चिमी अभियान, स्वर्ण तुलादान तथा चित्रकला को संरक्षण उसके शासनकाल के अन्य महत्वपूर्ण पक्ष हैं। इसलिए पृथ्वीपति शाह का काल राजनीतिक संघर्ष, मुगल संपर्क, सांस्कृतिक संरक्षण और राजवंशीय इतिहास—सभी दृष्टियों से विशेष महत्व रखता है।

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